Categories
आओ कुछ जाने डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से देश विदेश स्वर्णिम इतिहास

क्या है ‘गणराज्य’ या गणतंत्र?

संविधान के अधीन सभी प्राधिकारों का स्त्रोत भारत के लोग हैं। भारत एक स्वाधीन राज्य है और अब वह किसी बाहरी प्राधिकारी के प्रति निष्ठावान नहीं है। हमारे देश का राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित राष्ट्रपति है। अब इस पद सहित किसी भी पद पर भारत के नागरिक की नियुक्ति होना संभव है। इसकी व्याख्या को थोड़ा विस्तार दिया जाना चाहिए था। राष्ट्रपति को राजा के स्थान पर निर्वाचित प्राधिकारी माना जाता। जिसका मुख्य कार्य ऋग्वेद (2/51/5) के अनुसार कुछ-कुछ ऐसा होता-‘हे राजन आप प्रकृष्ट बुद्घिवाले, छल-कपटयुक्त अयज्वा और अक्रती लोगों को (दस्युओं को) कम्पायमान कीजिए और जो यज्ञ न करके अपने पेट भरते हैं उन दुष्टों को दूर कीजिए, और इन उपद्रव, अशांति, अज्ञानता और नास्तिकता फैलाने वाले जनों के नगरों को भग्न कर दीजिए।’
पूरे संविधान को आप पलट लें। इस देश के मुखिया को आपातकालीन परिस्थितियों में भी दस्यु-दलन का अधिकार नहीं दिया गया है। जबकि गणराज्य में जनहित सर्वोपरि होता है। इसलिए जनहित में दस्यु-दलन का विशेषाधिकार राष्ट्रपति के लिए रखना अपेक्षित था। इसके लिए भारत के प्राचीन साहित्य और धर्मग्रंथों का अनुशीलन करके निष्कर्ष स्थापित किये जाने चाहिए थे। दस्यु से हमारा अभिप्राय समाज के प्रत्येक ऐसे व्यक्ति से है जो राष्ट्र की एकता और अखण्डता को तथा सामाजिक व्यवस्था को क्षत-विक्षत करने की गतिविधियों में संलिप्त है अथवा संलिप्त पाया जाता है।
दस्यु किसी वर्ग का नाम नहीं है। दस्यु एक व्यक्ति है, एक विचार है, जो मानव समाज के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है। उसे समाज के लिए उपयोगी बनाने के लिए विशेष उपायों की आवश्यकता होती है। इन उपायों में दस्यु दलन अथवा दस्यु वर्ग की पूर्ण समाप्ति भी एक उपाय है। संविधान ने इन दस्युओं को चिन्हित नहीं किया कि कौन-कौन से लोग ‘दस्यु’ कहे जायेंगे? और उनके साथ किस प्रकार निपटा जायेगा।
ऐसी व्यवस्था के अभाव में ‘दस्यु’ सांसद बन रहे हैें, विधायक बन रहे हैं और अपने अधीनस्थ और कनिष्ठ दस्युओं का हित संरक्षण कर रहे हैं। गणराज्य का चेहरा विद्रूपित हो चुका है। संविधान मौन है।

‘आरक्षण और गणराज्य’
गणराज्य में लोकतन्त्र की प्रथम सीढ़ी ग्राम को माना जाता है भारत में ऐसा ही किया गया है। किन्तु आप देखेंगे कि भारत का राष्ट्रपति तो अप्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित है जबकि ग्राम का प्रधान (गणपति) सीधे जनता द्वारा चुना जाता है। यह एक भयंकर विरोधाभास हमारे संविधान में है। हमें अपने देश का प्रधनमंत्री भी ग्राम प्रधान की तरह ही चुनना चाहिए। प्रधनमंत्री के लिए सारा देश ‘वोट’ डाले। या फि र यह होना चाहिए कि ग्राम का गणपति (प्रधान) भी जनता के वोट द्वारा निर्वाचित ग्राम पंचायत सदस्यों में से ही चुना जाए। यह बिल्कुल वैसे ही चुना जाये जैसे प्रधनमंत्री को हमारे सांसद चुनते हैं, अथवा मुख्यमंत्री को हमारे विधायक चुनते है।
ये ग्राम पंचायत सदस्य अपने द्वारा मतदान करके क्षेत्र पंचायत का सदस्य भेज सकते हैं। यह क्षेत्र पंचायत सदस्य गणपति कहा जा सकता है। फि र ये गणपति मिलकर जिला पंचायत सदस्य का निर्वाचन करें जिसे क्षेत्रपति कहा जाये, और अंत में क्षेत्रपति अपने मध्य से एक जिला पंचायत के सभापति का निर्वाचन करें। जिला पंचायतों के इन सभापतियों को भी राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में सम्मिलित किया जाये। जिससे कि गणतन्त्र का सही स्वरूप मुखरित हो सके। यह होगा-गणराज्य का सही स्वरूप। साथ ही आज की खर्चीली चुनाव प्रणाली पर होने वाले धन के अपव्यय और राजकोष पर पडऩे वाले अनावश्यक बोझ से भी बचा जा सकेगा।
‘भारत का समाजवादी स्वरूप’
भारत के संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द भी विशेष महत्व रखता है। समाजवाद की सीधी-सादी व्याख्या समाज के प्रत्येक वर्ग और व्यक्ति तक शासन की नीतियों का सही लाभ पहँुचाने से है। महल और झोंपड़ी के अन्तर को समाप्त करते-करते धीरे-धीरे पूर्णत: समाप्त करना इस व्यवस्था का उद्देश्य है। इस ‘समाजवाद’ शब्द की लोगों ने मनमानी व्याख्याएं की हैं। ये लोग समाजवाद की अपनी-अपनी व्याख्याओं के  जंजाल में इस प्रकार उलझे कि समाजवाद की चादर को ही फ ाड़ बैठे। फ लस्वरूप आज समाजवाद के चीथड़े उड़ गये हैं। जो समाजवाद हमें दीख रहा है वह समाजवाद नहीं है, अपितु समाजवाद की विकृतावस्था है। उसके चीथड़े हैं, टुकड़े हैं।
दुर्भाग्य से भारत ने समाजवाद की जिस व्यवस्था को अंगीकृत किया वह कोई सुन्दर परिणाम नहीं दे पायी।
भारत को समाजवाद को अपने ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ से जोडक़र देखना चाहिए था। उसे संसार में जनोपयोगी बनाने के लिए भारत को समाजवाद की सही व्याख्या और परिभाषा प्रस्तुत करनी चाहिए थी। किन्तु हमने अपने स्वभाव के अनुसार पुरुषार्थहीनता का परिचय देकर पश्चिमी जगत के कुछ विद्वानों के उच्छिष्ट भोजन को ग्रहण करने में ही कत्र्तव्य की इतिश्री मान ली। इसलिए समाजवाद की प्रचलित व्याख्या, व्यवस्था ओर परिभाषा को गले लगाये चले जा रहे हैं। परिणामस्वरूप भारतीय समाज का अधिकांश भाग आज भी ऐसा है जो झोंपड़ी से भी वंचित है। फु टपाथ पर खुले आकाश के नीचे सोते लोग महानगरों की निर्मम जनता और निर्दयी शासन का ध्यान भंग नहीं करा पाये। मनुष्य, मनुष्य के प्रति कठोर हो गया।
हमें ऐसे प्रयास करने चाहिए थे कि मनुष्य की मनुष्य के प्रति कठोरता पिघलती। यह ऐसा प्रयास हमें सुसंस्कृत करता, संस्कारित और परिमार्जित करता।
‘संस्कारोतीति य: संस्कृति।’ अर्थात संस्कृति वही है जो हमारा संस्करण करे, परिमार्जन करे। हमें मांजे, भीतर से स्वच्छ कर दे। व्यक्ति का परिमार्जन कर उसे मानव बनाना संस्कृति का परम उद्देश्य है। यह परिमार्जन ही भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। यदि हम भारतीय लोग इस ‘परिमार्जनवादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को अपनाते तो समाजवाद का सही स्वरूप संसार को मिल सकता था। हमारा समाज सीख जाता- खुले आकाश वालों को और झोंपड़ी वालों को भवन उपलब्ध् कराना।
दुर्भाग्य से हमारी उधरी मनीषा जनित भिक्षावृत्ति ने हमें अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जुडऩे नहीं दिया। उल्टे जिन लोगों ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात देश में की उन्हें साम्प्रदायिक कहकर चिढ़ाने का प्रयास और किया गया। परिणामस्वरूप देश में एक ऐसा माहौल बना कि यहाँ रहकर अपने देश की बात नहीं करनी है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के समाजवाद को कुछ लोगो ने मुस्लिमों के प्रति एक सुनियोजित षड्यंत्र सिद्घ करने का अनुचित प्रयास किया। फ लस्वरूप यह पावन शब्द हमारे समाज में भी गले की हड़्डी बनकर रह गया है। हमें समझ नहीं आता कि इसे किन अर्थों व सन्दर्भो में अपनायें? कितना अच्छा होता कि समाजवाद के शब्द के साथ हमारी संविधान सभा या संसद, ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवादी समाजवाद’ का प्रयोग करते। यदि ऐसा हो जाता तो आगे तक की समस्याऐं समाप्त हो जातीं। तब हमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर आज मिलने वाले अपशब्द नहीं सुनने पड़ते। इस शब्द के जुडऩे से ही देश में ऐसा माहौल बनता कि सभी लोग अपनी मानवीय गुणों से आपूरित वैदिक संस्कृति की ओर स्वयं ही झुक जाते। हिंदू-मुस्लिम की समस्या राष्ट्र में ना होती। तुष्टिकरण ना होता। बस होता तो हिंदू-मुस्लिम के स्थान पर नागरिक और तुष्टिकरण के स्थान पर ‘पुष्टिकरण’ (धर्मसम्मत और लोकसम्मत सिद्घांतों और व्यवस्थाओं की पुष्टि) होता।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
jojobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
vaycasino giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
onwin giriş
onwin giriş
onwin giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
betsat giriş
betsat giriş
betsat giriş
betsat giriş
Kolaybet Giriş
onwin
onwin
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
onwin
onwin
holiganbet
sahabet
bets10
casinolevant
ngsbahis giriş
artemisbet güncel
grandpashabet giriş