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अन्य राजनीति संपादकीय

ये तो चुनावी वायदे नही हैं

पांच राज्यों में चुनावी प्रक्रिया अपने सबाब पर है। ज्यों-ज्यों चुनावी तारीखें निकट आ रही हैं, त्यों-त्यों राजनीतिक दल अगले पांच वर्ष के लिए पांचों राज्यों को अपने लिए कब्जाने के प्रयासों में तेजी लाते जा रहे हैं। हर प्रत्याशी अपने लिए वोटों के गुणाभाग लगाने में व्यस्त है। इसी समय भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस में भीतरीघात की भी सूचनाएं मिल रही हैं। जहां जिस प्रत्याशी को पार्टी हाईकमान ने अपनी मर्जी से कार्यकर्ताओं पर लाद दिया है वहां ऐसे थोपे गये प्रत्याशी के विरूद्घ कार्यकर्ता अनमने मन से कार्य कर रहे हैं और कई स्थानों पर तो ऐसे प्रत्याशियों को हराने का भी कार्य उसी की पार्टी के लोग कर रहे हैं। भाजपा ने ऐसे कई प्रत्याशी जबरन अपने पार्टी कार्यकर्ताओं पर थोप दिये हैं, जिन्हें स्थानीय कार्यकर्ताओं का भरपूर और अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है। निश्चित रूप से भाजपा ऐसी कई सीटों पर ‘हार’ का मुंह देख सकती है जहां उसे अपने ही लोगों का असहयोग झेलना पड़ रहा है। भाजपा सहित सपा, बसपा और कांग्रेस की भी कई सीटों पर ऐसी ही स्थिति है। 
हमारा मानना है कि राजनीतिक दलों की इस प्रकार की समस्या से बचने के लिए चुनाव सुधारों की आवश्यकता है, जिसके लिए उचित होगा कि हर पार्टी अपने लिए यह सुनिश्चित कर ले कि उसके ऐसे कार्यकर्ता को ही चुनाव में पार्टी का प्रत्याशी घोषित किया जा सकेगा, जिसकी निष्ठा पार्टी के साथ कम से कम पिछले दस वर्ष से निरंतर रही हो और जिसने पार्टी में विभिन्न पदों पर रहते हुए पार्टी की सेवा की हो, अथवा जिसने लोगों की समस्याओं के समाधान में विशेष रूचि दिखायी हो। यदि पार्टी की स्थापना 10 वर्ष से अधिक की नहीं है, तो कोई भी प्रत्याशी पार्टी का संस्थापक सदस्य या जिले में या प्रांत में पार्टी की दस्तक होने पर पहले दिन से पार्टी का झण्डा उठाने वाला रहा हो। देखने में आया है कि जब ऐसे निष्ठावान लोगों की उपेक्षा करके राजनैतिक दल किसी ऐसे नवागन्तुक को पार्टी प्रत्याशी घोषित कर देते हैं,  जो अभी कल परसों किसी पार्टी को लात मारकर आया होता है, तो पार्टी के समर्पित लोगों को हाईकमान के ऐसे निर्णयों से कष्ट होना स्वाभाविक है। वास्तव में इस प्रकार किसी दूसरी पार्टी में छलांग लगाकर गये ऐसे व्यक्ति का अवसरवादी होने का प्रमाण होता है। ऐसे अवसरवादी लोगों का उद्देश्य सत्ता की मलाई चाटते रहना होता है। उन्हें जीतते हुए पक्ष से हाथ मिलाने की चिंता रहती है। पार्टी के सिद्घांत और देशहित उनके लिए सदा ही गौण रहते हैं। भाजपा ने ऐसे स्वार्थी, पदलोलुप और अवसरवादी लोगों को अपने यहां स्थान देकर देश में चुनाव सुधारों की अपनी मांग को ही धता बताने का कार्य किया है। अब समय आ गया है कि इस दिशा में सचमुच कार्य करने की आवश्यकता है।
अब आते हैं एक दूसरे चिंतनीय पहलू पर। हमारे देश में स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाने की बात नेता लोग ही अक्सर करते हैं। जब ऐसी बातें की जाती हैं तो ऐसा संकेत दिया जाता है कि जैसे हमारे मतदाता को वोट डालते समय अपना प्रत्याशी चुनने के लिए पूर्णत: स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है और उस पर कोई बाहरी दबाव या लालच या भय उस समय काम नहीं करते। जिससे उसका मानसिक संतुलन पूर्णत: ठीक रहता है और वह अपने विवेक से सही निर्णय लेकर अपने प्रतिनिधि का चयन करता है। चुनाव के इस उच्चादर्श को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए हमारा चुनाव आयोग भी सक्रिय रहता है परंतु हम व्यवहार में देखते हैं कि वहां कुछ और ही स्थिति होती है। व्यवहार में तो हर राजनीतिक दल देश के मतदाताओं को उपहारों की या ‘सब्सिडी’ की या चुनावी प्रलोभनों की रिश्वत या घूस देकर उसे अपने पक्ष में करता दिखाई पड़ता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि यदि देश के खजाने को देश के राजनीतिक दल सत्ता खरीदने के लिए जनता से लिये गये ऋण (मत) की एवज में ब्याज में ही चुकता कर देंगे, तो देश का विकास कैसे होगा? वैसे भी देश का खजाना जिस प्रकार के करों से भरा जाता है वे कर इसीलिए लगाये जाते हैं कि उससे प्राप्त राजस्व को कहीं सही स्थान पर ही (अर्थात जनहित में) लगाया जाएगा। उनकी वसूली का उद्देश्य राजकीय कोष को खैरात के रूप में बांटने के लिए नहीं होता।
हमारे देश के जागरूक मतदाताओं को सावधान होना होगा। चुनावी प्रलोभनों के माध्यम से जनता को जिस प्रकार हमारे राजनीतिक दल ‘घूस’ देकर ‘अपना उल्लू सीधा करने’ में लगे हैं उससे जनता को सावधान करना होगा कि सत्ता खरीदकर सुख भोगने वाले इन स्वार्थी राजनीतिज्ञों की सच्चाई को देश समझे।
जिस वर्ग के मतदाताओं को चुनावी प्रलोभन दिये जाते हैं वे चुनाव के दिन राष्ट्रहित में या जनहित में अपना मत नहीं दे पाते। उन पर उस समय स्वहित हावी रहता है और वे उस प्रत्याशी को अपना वोट दे आते हैं जो उन्हें सर्वाधिक प्रलोभन देता दिखाई  पड़ता है, इस प्रकार के परिवेश में स्वतंत्र चुनावों की भारत में कल्पना तक करना भी  असंभव होता जा रहा है। चुनावी वायदों के प्रलोभनों को पूरा कराने में हमारे देश का कोष यदि खर्च किया जाता है तो मानना पड़ेगा कि सारी चुनावी प्रक्रिया पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया है। जिन राजनीतिक दलों ने इस समय देश के पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में मतदाताओं को प्रलोभन देने के लिए आश्वासनों के बोरे खोल रखे हैं, उन पर कड़ी कार्यवाही होनी भी चाहिए। साथ ही यह भी कि जिन लोगों ने अपने चुनावी वायदों को पूरा करने के लिए सत्ता में रहते हुए सरकारी धन का दुरूपयोग किया, उन पर भी कानूनी शिकंजा कसा जाना चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यदि कोई राजनीतिक दल बड़े-बड़े चुनावी वायदे पूरे करके सत्ता में आया है, तो उसे अपने ऐसे चुनावी वायदे स्वयं के बजट से ही पूर्ण करने चाहिए जिनका राष्ट्रहित से कोई लेना-देना नहीं है, और जो किसी एक वर्ग का या संप्रदाय के हितों को ही पूरा करते हैं। सचमुच  चुनाव सुधार समय की आवश्यकता हैं।

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