डिजिटल अर्थव्यवस्था की सीमाएं

वर्तमान में यह एक खुला प्रश्न है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था से कर वसूली बढ़ेगी या नहीं। कहावत है कि ताले शरीफों के लिए लगाए जाते हैं। चोर तो ताले को खोलना जानता ही है। इसी प्रकार कच्चे पर्चे कारोबार करने वाले व्यापारियों के लिए डिजिटल अर्थव्यवस्था के प्रभावी होने में मुझे संशय है। उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि डिजिटल भुगतान छोटे रकम के लिए हानिप्रद और बड़ी रकम के लिए लाभप्रद है। यही कारण है कि इंग्लैंड में सामान्य उपभोक्ताओं द्वारा 48 प्रतिशत लेन-देन नकद में किया जा रहा है।
हमारी अर्थव्यवस्था को सरकार शीघ्रातिशीघ्र डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर ले जाना चाहती है। नकद लेन-देन पर कर आरोपित करने की योजना है। सरकार की सोच है कि नकद लेन-देन कम होने से समानांतर यानी ब्लैक इकोनॉमी पर बंदिश लगेगी। परंतु तमाम विकसित देश डिजिटल इकोनॉमी को कई दशक पूर्व अपना चुके हैं। वहां भी नकद का उपयोग ब्लैक इकोनॉमी में जारी है। बैंक ऑफ इंग्लैंड की 2015 की त्रैमासिक समीक्षा में छपे एक पर्चे में कहा गया है कि बैंक द्वारा छापे गए कुल नोटों में से आधे ही लेन-देन के लिए उपयोग किए जाते हैं। शेष या तो विदेशों में हैं अथवा शैडो यानी काली इकोनॉमी द्वारा उपयोग में लाए जा रहे हैं। इस अध्ययन से स्पष्ट है कि विकसित देशों में काले धन के संग्रह एवं लेन-देन के लिए नकद का उपयोग जारी रहता है। संभव है कि छोटे दुकानदारों द्वारा कच्चे पर्चे पर बिक्री करने में कुछ कमी आए, परंतु मुझे इसमें भी संदेह है। कच्चे पर्चे में खरीद करने में टैक्स की भारी बचत होती है। इस बचत को हासिल करने को व्यापारी नकद कारोबार को जारी रखेंगे। इस संभावना के फलीभूत होने का संकेत भी इंग्लैंड से मिलता है। पेमेंट डॉट काम द्वारा जारी किए गए वैश्विक नकदी सूचकांक के अनुसार वर्ष 2014 में इंग्लैंड के उपभोक्ताओं द्वारा 48 प्रतिशत लेन-देन नकद में किए गए। 24 प्रतिशत डेबिट कार्ड द्वारा किए गए। शेष ऑनलाइन अथवा अन्य डिजिटल माध्यम से किए गए। इस अध्ययन से पता चलता है कि विकसित देशों में नकद लेन-देन जीवित तथा सुदृढ़ हैं तथा छोटी रकम के लेन-देन के लिए लोग नकद को ही पसंद करते हैं।
यदि विकसित देशों में लगभग आधे लेन-देन नकद में किए जा रहे हैं तो भारत में इससे ज्यादा ही होंगे, चूंकि एक पहलू यह भी है कि अपने देश में नकद कारोबार से टैक्स की बचत होती है। टैक्स की चोरी को छोड़ दें, तो भी लोगों द्वारा नकद लेन-देन कम ही किए जाते हैं। ब्रिटिश सरकार द्वरा कराए गए दूसरे अध्ययन में नकद के पसंद किए जाने का पहला कारण बताया गया है कि यह सस्ता पड़ता है। बैंक को डेबिट कार्ड जारी करने के लिए वार्षिक फीस नहीं देनी होती है। दूसरा कारण है कि छोटी रकम के लेन-देन को नकद में करना आसान होता है। तीसरा कारण यह कि नकद के लेन-देन से लोगों के लिए अपने बजट को मैनेज करना आसान रहता है। पर्स में देखकर तुरंत समझ आ जाता है कि अभी और कितनी गुंजाइश है। डिजिटल इकोनॉमी में अपने बजट को मैनेज करने के लिए अलग से रिकार्ड रखना होगा कि कब कितना पेमेंट किया है और आगे कितना किया जा सकता है। यही बात अपने देश में भी लागू होती है। आम आदमी द्वारा किए गए छोटे-छोटे लेन-देन को नकद में करना सस्ता पड़ता है। डिजिटल भुगतान में तीन छिपे हुए खर्च होते हैं। उपभोक्ता को मोबाइल फोन खरीदना होता है। फोन का उपयोग बात करने के लिए किया जाए तो भी खर्च का एक अंश डिजिटल भुगतान के लिए किया गया माना जाएगा। दूसरा खर्च पेमेंट पोर्टल के पास जमा कराई गई रकम पर ब्याज के नुकसान का है। आप पोर्टल के पास 5,000 रुपए जमा कराते हैं, जिससे आप जरूरत पर पेमेंट कर सकें। इस रकम पर पोर्टल द्वारा ब्याज कमाया जाता है। यदि यह रकम आपके बैंक खाते में रहती तो ब्याज आपको मिलता। तीसरा खर्च आपके समय का होता है। डिजिटल पेमेंट में सामने वाले से पूछकर उसका नंबर अपने मोबाइल में डालना होता है। पेमेंट करने के बाद रुककर दुकानदार से पूछना होता है कि उसके खाते में रकम पहुंची या नहीं। ग्राहक तथा दुकानदार दोनों का समय इसमें जाया होता है। कभी कभी गलत नंबर पर पैसा ट्रांसफर हो जाए तो मुसीबत होती है।
मेरी गणित के अनुसार एक सामान्य उपभोक्ता द्वारा साल में एक लाख का भुगतान करने में इन मदों पर कुल 500 रुपए का खर्च वहन किया जाएगा। अत: छोटे उपभोक्ता के लिए डिजिटल भुगतान हानिप्रद है, लेकिन रिजर्व बैंक को नकदी नोट उपलब्ध कराने की बचत हो जाती है। इसी एक लाख के लेन-देन को नोट उपलब्ध कराने का खर्च रिजर्व बैंक को वहन करना होगा। मेरी गणित के अनुसार इस नकदी नोट उपलब्ध कराने का खर्च तीन रुपए आता है। अत: छोटी रकम के लेन-देन करने में डिजिटल भुगतान में सामान्य उपभोक्ता को 500 रुपए का नुकसान और रिजर्व बैंक को तीन रुपए का लाभ होता है। अर्थव्यवस्था को 497 रुपए का नुकसान होता है। बड़े कारोबारी द्वारा डिजिटल भुगतान करने में परिस्थिति बदल जाती है। इनके द्वारा 10 करोड़ रुपए का डिजिटल भुगतान किया जाए, तो भी मोबाइल आदि का खर्च 500 रुपए ही आएगा, चूंकि डिजिटल भुगतान में 10 रुपए अथवा 10 करोड़ रुपए ट्रांसफर करने में खर्च बराबर आता है। लेकिन 10 करोड़ के नकदी नोट उपलब्ध कराने में रिजर्व बैंक को 3,000 रुपए का खर्च वहन करना होगा, चूंकि इस लेन-देन के लिए ज्यादा संख्या में नोट उपलब्ध कराने होंगे। अत: डिजिटल भुगतान से बड़े कारोबारी को 500 रुपए का नुकसान और रिजर्व बैंक को 3,000 रुपए का लाभ होगा। अर्थव्यवस्था को 2,500 रुपए का लाभ होगा। लेन-देन के डिजिटल होने से यदि टैक्स की वसूली बढ़ गई तो यह हानि कुछ कम हो जाएगी। वर्तमान में यह एक खुला प्रश्न है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था से कर वसूली बढ़ेगी या नहीं।
कहावत है कि ताले शरीफों के लिए लगाए जाते हैं। चोर तो ताले को खोलना जानता ही है। इसी प्रकार कच्चे पर्चे कारोबार करने वाले व्यापारियों के लिए डिजिटल अर्थव्यवस्था के प्रभावी होने में मुझे संशय है। उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि डिजिटल भुगतान छोटे रकम के लिए हानिप्रद और बड़ी रकम के लिए लाभप्रद है। यही कारण है कि इंग्लैंड में सामान्य उपभोक्ताओं द्वारा 48 प्रतिशत लेन-देन नकद में किया जा रहा है। इस पृष्ठभूमि में हम डिजिटल इकोनॉमी की उपयुक्तता को समझ सकते हैं। बड़े तथा सफेद धन के लेन-देन के लिए डिजिटल अर्थव्यवस्था उपयुक्त है, जैसा कि ऊपर बड़े कारोबारी के संबंध में बताया गया है। 
छोटे लेन-देन के लिए डिजिटल अर्थव्यवस्था हानिप्रद है। डिजिटल लेन-देन अपनाने के बावजूद काले धन के लिए नकद का उपयोग जारी रहता है। अत: सामान्य लेन-देन के लिए हम डिजिटल अर्थव्यवस्था अपना कर अपने को गड्ढे में डालेंगे। एक लाख का जो लेन-देन मात्र 3 रुपए में किया जा सकता है, उसे संपन्न करने के लिए हम 500 रुपए खर्च करेंगे। काले धंधे के लिए नकदी का उपयोग भी जारी रहेगा। भविष्य में विद्वान उपभोक्ता को अपने विवेक से समझ आ जाएगा कि छोटी रकम के लिए डिजिटल लेन-देन उसके लिए घाटे का सौदा है और डिजिटल डिजिटल इकोनॉमी स्वत: सिमट जाएगी।

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