वैदिक सम्पत्ति : चतुर्थ खण्ड:- वेद मंत्रों के उपदेश

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गतांक से आगे…..

वेदों का यह हाल नहीं है। वेद किन्हीं रिवाजों के बाद नहीं बने, प्रत्युत उन्होंने ही आवश्यक रिवाजों को जन्म दिया है। यज्ञोपवीत के लिए वेद इतना ही आवश्यक समझते हैं कि दूसरे कुल में जाने पर विद्या प्रारम्भ करने पर ओर मनुष्य पशरीर के अन्तिम धेय के प्राप्त करनेवाले व्रत को धारण करने पर आवश्यक है कि उसे कोई ऐसा चिन्ह दिया जाय, जिससे वह पहिचाना जा सके। समाज उसे उस चिह्न से पहिचाने, जिससे शिक्षा, सत्कार और सहायता आदि देने में सुविधा हो। यह चिह्न चाहे जैसा हो, पर शरीर में सदैव रह सकनेवाला हो । वह एक माला अर्वात् मेखला के ही रूप में अधिक उपयोगी हो सकता है और कमर में, गले में या कन्धों में ही उसका रहना अधिक उचित मालूम पड़ता है । यही कारण है कि पारसी लोग इसे कमर में बाँधते है । पहिले जमाने में बहुत से वैदिक आर्य भी परिकर बन्धन की तरह उसे पहिनते थे । परन्तु शाखाभेद से जैसे-जैसे पढ़ाई के तरीके बदलते गये और गोत्र बढ़ते गये, वैसे- वैसे उपवीत का ढंग भी बदलता गया और भिन्न – भिन्न होता गया। यज्ञोपवीत आजकल जिस अवस्था में पहुँचा है, यदि वह सारी दशा आप वेदों में ढूँढना चाहें, तो नहीं मिल सकती। लड़का पढ़ने जाने लगे और मामा उसे शादी का लोभ देकर वापस कर ले, इस विधि पर न कोई संहिता की श्रुति है, न ब्राह्मणग्रन्थों की गाथा है, न सूत्रों का सूत्र है और न निर्णयसिन्धु की कोई नदी है। इसके लिए तो आल्हखण्ड में भी कोई प्रमाण न मिलेगा। कहने का मतलब यह कि वेदों को अपने रिवाजों का गुलाम बनाना उचित नहीं है। वेदों में जो शिक्षा बीजरूप से है, उसको ऋषियों ने सुविधा के लिए विस्तारपूर्वक लिखकर अपने जमाने में हमेशा प्रचलित किया है। ब्राह्मणग्रन्थों के पूर्व भी एक महान् साहित्य था, उसमें भी कुछ था, अब भी कुछ और आगे भी कुछ होगा, पर वेद इस सबके जवाबदार नहीं हैं। उनमें तो कुछ है वह इतना ही है कि वह मनुष्य की बुद्धि को सोचने, विचारने लायक कर देता है और इस योग्य बना देता है कि मनुष्य अपनी भलाई के नियम उस बीज के अनुसार बना ले।

इस प्रकार से मूल और माध्य सदैव एक साथ ही बनता रहता है, पर माध्य मूल नहीं हो जाता। मनु वैवस्वत केही समय में वेदों का प्रादुर्भाव हुआ था, किन्तु उसी समय में ब्राह्मण भी बनाने पड़े थे। हम देखते हैं कि वेदों में कहीं नहीं लिखा कि अमुक काम करते समय अमुक मन्त्र पढ़ो, पर ब्राह्मणग्रन्थों में है। इससे पाया गया कि ब्राह्मण- ग्रन्थों ने एक नया ढंग यह पैदा किया कि कोई कार्य मौन होकर न किया जाय, प्रत्युत मन्त्र कहकर ही किया जाय। इसमें कोई पाप नहीं था, इसीसे इस पर कोई आपत्ति भी नहीं हुई। पर यदि कोई मार्जन करते समय ‘आपोहिष्ठा’ न पढ़े, तो उसका मार्जन बिगड़ नहीं सकता और स्नान के समय यदि कोई गंगाष्टक न पड़े, तो उसके स्नान में कोई त्रुटि नही हो सकती। क्योंकि स्नान अलग चीज है और मन्त्र पढ़कर स्नान करना अलग चीज है। न पहिले में कोई पाप है, न दूसरे में कोई पुण्य है। किन्तु प्रश्न तो यह है कि आज्ञा और विधि का पालन कैसे किया जाय ? इस प्रश्न का उत्तर सदैव यही रहा है कि वेदों की बीजरूप सूचना पर विद्वानों के विचारों से जो विधि निर्धारित हो, वही कर्त्तव्य समझा जाय । पर स्मरण रखना चाहिये कि वेदों की सूचना अपरिवर्तनशील है और दूसरे विद्वानों के विचार परिवर्तनशील हैं। पहिले में किसी का मतभेद नहीं हो सकता, पर दूसरे में हो सकता है। यज्ञोपवीत करना पहिला पक्ष है, इसमें मतभेद नहीं हो सकता । पर कब करना चाहिये, इसमें मतभेद हो सकता है। इसीलिए गृह्यसूत्रों में कोई कहता है कि ब्राह्मण का यज्ञोपवीत वसन्त में करना चाहिये और कोई कहता है कि सब ऋतुओं में करना चाहिये । वेद की आज्ञा और विद्वानों की विधियों में पहिली बात दूसरी की मोहताज नहीं है, पर दूसरी बात पहिली की मोहताज है । यज्ञोपवीत माघ में न होकर चाहे पौष में हो, पर हो जरूर यही मतलब है ।


लोकमान्य तिलक महोदय ने इस बात को ‘ओरायन’ ग्रन्थ में सप्रमाण लिखा है।


इस पर प्रश्न हो सकता है कि वेदों ने माघ और पौष का भी निर्णय क्यों नहीं कर दिया ? और रेशम तथा सूत की विधि भी क्यों नहीं बतला दी ? इस पर हमारा नम्र निवेदन यह है कि जो वैदिक शिक्षा समस्त पृथिवी पर बसे हुए मनुष्यों के लिए है, उसमें इस प्रकार का वर्णन हो ही नहीं सकता। क्योंकि जिले- जिले की परिस्थिति अलग- अलग है, पदार्थों की उपज भिन्न-भिन्न है और ऋतुओं के प्रभाव अलग-अलग हैं। ऐसी दशा में यदि सभी कुछ वेद ही लिखने बैठें, तो वेदों के पुस्तक तो एशियाटिक सोसाइटी का पुस्तकालय बन जाय, वेदों के गौरव और मनुष्य की स्वाधीनचिन्ता में विघ्न उपस्थित हो जाय, धर्म और आपद्धर्म में कोई फर्क ही न रहे और संकट के समय मनुष्य अपना त्राण ही न सोच सके। इसलिए क्रियाकलाप, आपद्धर्म और मनुष्यों की सामयिक उपयोगिता का विस्तृत वर्णन न करने से वेद अधूरे नहीं समझे जा सकते। वे पूर्ण है। वेद परलोक की पूर्ण और विस्तृत शिक्षा देते हैं, तथा लोक की शिक्षा में मनुष्य की इस योग्य बना देते हैं कि उसका एक भी आवश्यक कार्य कभी रुक ही न सके।
क्रमशः

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