अनन्य भाव से सिमर ले, पुराण-पुरूष का नाम

बिखरे मोती-भाग 181

अर्जित की हुई संपत्ति बंटवारे के समय विपत्ति बन जाती है। जिस संपत्ति के कारण वह अपने बुढ़ापे को सुरक्षित समझ रहा था, वही विवाद और विनाश का चक्रवात बन जाती है। जिनको वह सहारे समझ रहा था, वही किनारे बन जाते हैं। उसके सुनहले सपने यथार्थ के धरातल से कोसों दूर होते हैं, दिवा स्वप्न होते हैं, मृगतृष्णा मात्र होते हैं। तब उसे जीवन की सच्चाई समझ में आती है किंतु तब तक बहुत देर हो गयी होती है क्योंकि काल चिरैया आयु का खेत चुुग चुकी होती है। इसलिए हे मनुष्य! धन, कमा किंतु धन से पुण्य कमा। यह पुण्य की मुद्रा इहिलोक और परलोक दोनों में तेरा साथ निभाएगी।
अनन्य भाव से सिमर ले,
पुराण-पुरूष का नाम।
योग-क्षेम संवरै तेरे,
पावै भगवद् धाम ।। 1112 ।।
व्याख्या :-
इस सृष्टि का मूल कारण परमपिता परमात्मा है, वह जितना पुराना है, सनातन है उतना कोई अन्य नहीं, वह सदा से था और सदा रहेगा अर्थात वह सृष्टि का आदि भी है और अंत भी, इसीलिए परमात्मा को वेद और उपनिषदों में ‘पुराण-पुरूष’ कहा गया है। जो भक्त भगवान का सिमरन अनन्य भाव से करते हैं अर्थात निरंतर उसके दिव्यस्वरूप का ध्यान करते हैं, पूजा करते हैं अथवा ऐसे कार्य करते हैं जिनसे परमात्मा प्रसन्न होता है। कहने का अभिप्राय यह है कि ऐसे भक्त का साधन और साध्य केवल भगवान ही है अर्थात केवल भगवान के ही शरण होना है उन्हीं का चिंतन करना है, उन्हीं की उपासना करनी है और उन्हीं को प्राप्त करना है तथा जिनका ऐसा दृढ़ भाव होता है कि भगवान के सिवाय मेरा कोई अन्य नहीं है, ऐसे भक्त भगवान के अनन्य भक्त कहलाते हैं-जैसे मीराबाई भगवान कृष्ण के अनन्नय प्रेम में भाव-विभोर होकर कहती है-”मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरौ न कोई” भगवान के प्रति अनन्यता का यह उत्कृष्टतम प्रमाण है। भगवान कृष्ण गीता के नौवें अध्याय के बाइसवें श्लोक में अर्जुन को आश्वस्त करते हुए कहते हैं-”हे पार्थ! जो भक्त अनन्य भाव से मेरे दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हैं उनकी जो आवश्यकताएं होती हैं, उन्हें मैं पूरी करता हूं और जो उनके पास हैं, उसकी रक्षा करता हूं। ध्यान रहे, अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति करा देना योग कहलाता है और प्राप्त वस्तु की रक्षा करना ‘क्षेम’ कहलाता है।” इन दोनों के संवर्धन और संरक्षण की जिम्मेदारी भगवान अपने ऊपर लेते हैं। अनन्य भक्त भगवान भावना भावित होता है। जिससे वह शरणागति को प्राप्त होता है, भगवद्धाम (मोक्ष) को प्राप्त होता है इसलिए मनुष्य को भगवान की भक्ति अनन्य भाव से करनी चाहिए।
सदगुण दुर्गुण दोनों ही,
धीरे बढ़ते जाए।
गर बाधा न हो बीच में,
तो पहाड़ बनते जाए ।।  1113 ।।
व्याख्या :-
इस संसार में जितने भी सदगुण है वे मानवीय व्यक्तित्व के आभूषण हैं, जिनसे मनुष्य शोभायमान होता है, अलंकृत होता है। पूनम का चांद किसके मन को नहीं लुभाता? देखने वाला हतप्रभ रह जाता है, रूक-रूक कर नजर थाम कर जी भरके देखता है, क्योंकि चांद उस दिन पूर्ण यौवन पर होता है। सौंदर्य और शीतलता तथा चांदनी में मादकता चकोर नाम के पक्षी को पागल कर देती है, दीवाना कर देती है, ठीक इसी प्रकार सद्गुणों की शीतलता, स्वभाव में सरलता अर्थात अहंकार शून्यता व्यक्ति के आसपास के वातावरण को यश अथवा कीर्ति से ऐसे सुगंधित करती है जैसे रात की रानी अपने आसपास के वातावरण को अपनी मनमोहक सुगंध से सुरभित करती है। क्रमश:

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