भक्ति की छाया चित्त में, गहरी हो मनमीत

बिखरे मोती-भाग 182

सद्गुणों से मनुष्य प्रतिभावान होता है, आभावान होता है, दीप्तिमान होता है, गुणवान होता है। वह अपने कुल, समाज और राष्ट्र को आलोकित करता है, उनका गौरव बनता है-जबकि दुर्गुणों से मनुष्य पतन के गर्त में गिरता है, अपने कुल अथवा खानदान, राष्ट्र व समाज को कलंकित करता है और घृणा का पात्र बनता है। माना कि इन दोनों में यह बड़ी भारी विषमता है किंतु सद्गुण और दुर्गुण में एक समता भी है-सद्गुण और दुर्गुणों में शनै: शनै: वृद्घि होती जाती है। यदि कोई बाधा आड़े न आए तो सद्गुण और दुर्गुण पर्वत की तरह विशालकाय हो जाते हैं। अत: विवेकशील व्यक्ति को अपना दृष्टिकोण शहद की मक्खी की तरह बनाना चाहिए, जैसे शहद की मक्खी जहां भी जाती है वहां से मिठास लेकर आती है और शहद का एक बड़ा छत्ता बना देती है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य को सर्वदा गुणग्राही होना चाहिए। सद्गुणों के अर्जन से और दुर्गुणों के विसर्जन से ही मनुष्य का कल्याण संभव है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपना आत्मावलोकन करता रहे, सर्वदा सद्गुणों का विकास और दुर्गुणों का हृास करता रहे।
भक्ति की छाया चित्त में,
गहरी हो मनमीत।
अमृत-रस की खान ये,
जीवन हो नवनीत ।। 1114 ।।
व्याख्या :-
भक्ति क्या है? परमपिता परमात्मा के प्रति हृदय में अतिशय प्रेम ही भक्ति कहलाती है। – ‘नारद भक्ति सूत्र’ ‘सेवा शारीरिक क्रिया है। जब इसमें प्रेम जुड़ जाता है, तो वह भक्ति बन जाती है।’ ‘महर्षि पराशर’ 
‘उस परम सत्ता (परमात्मा) से ऊर्जान्वित होना अर्थात उससे जुडऩा उसके रस में डूबना स्निग्ध होना भक्ति कहलाती है।’ 
‘मनु महाराज’ 
हे मनुष्य! तू भगवान की भक्ति करने में कोताही मत कर। चौरासी लाख योनियों में केवल मनुष्य योनि ही ऐसी है जिसमें भगवान की भक्ति की जा सकती है अन्यथा सब योनियों के दरवाजे बंद हैं। 
यह भक्ति तो चंदन का वृक्ष है जिसमें सुगंध के साथ-साथ शीतलता की भी भरमार है। यह शीतलता तेरे चित्त में बसने वाले तीनों तापों की तपिश को शांत कर तुझे सुकून देगी और दिव्य गुणों से सज्जित करेगी। जैसे वृक्ष की छाया जितनी गहरी होती है, ठीक इसी प्रकार भक्ति भी जितनी गहरी होती है अर्थात उसमें अनन्यता होती है-उतनी ही फलदायिनी होती है। भक्ति हृदय में बहने वाली रस की वह सरिता है जो परमात्म रूपी सागर से मिलाती है। 
वेद और उपनिषदों में परमात्मा को-‘रसौ वै स:’ कहा गया है अर्थात ‘वह रसों का रस है’ वह अमृत रस का आगार है। उसका रसपान करना ही अमरता को प्राप्त करना है और उसके रसपान से वंचित रहना ही मृत्यु है। इसीलिए यजुर्वेद का ऋषि कहता है-
‘यस्यच्छाया अमृतं यस्य: मृत्यु: कस्मै देवाय हविषा विधेम्’ अर्थात जिसका आश्रय ही मोक्षदायक है, जिसका न मानना यानि कि भक्ति न करना ही मृत्यु आदि दुख का हेतु है।’ इसी संदर्भ में बृहदारण्यक उपनिषद का ऋषि कहता है-”न चेदवेदी: महती विनष्टि:’ अर्थात उसे यदि इस जनम् में भी न जाना तो महाविनाश है। जो उसे जान जाते हैं वे अमृत को प्राप्त हो जाते हैं।”
क्रमश:

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