दिल्ली ने एमसीडी के चुनावों में ‘आप’ को उसके ‘पाप’ का दण्ड सुना दिया है, साथ ही कांग्रेस की नेतृत्वविहीनता को उसका उचित पुरस्कार देकर भाजपा को फिर से सत्ता सौंपकर नरेन्द्र मोदी की नीतियों में विश्वास प्रकट किया है। पूर्व से ही दिल्ली के ऐसे परिणामों की अपेक्षा लोगों की थी कि दिल्ली इस बार उत्तर प्रदेश को दोहराने जा रही है। अब चुनाव परिणाम सामने आ गये हैं तो ‘आप’ के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल की झुंझलाहट व बौखलाहट बढ़ गयी है। उनकी यह झुंझलाहट व बौखलाहट अप्रत्याशित नहीं है, उनमें धैर्य व सहिष्णुता की कमी है। वह अपने इस रोग के वशीभूत होकर किसको क्या कर जाएं-और कब क्या कह जाएं कुछ पता नहीं। उन्होंने अभी तक नौटंकियां की हैं और संयोग से कई बार उनकी नौटंकियां सफल हो गयीं, जिसका सबसे बड़ा लाभ उन्हें यह मिला कि वे दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गये।
केजरीवाल सत्ता के शीर्ष पर इसलिए पहुंचे कि उन्होंने राजनीति में शुचिता व पारदर्शिता की बात की थी। उन्होंने दिल्ली वासियों को यह विश्वास दिलाया था कि जनता का पैसा जनता के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने में व्यय किया जाएगा। उनकी बातों से दिल्लीवासियों को तब ऐसा लगा था कि जैसे उनके नेतृत्व में दिल्ली में वीतराग सन्यासियों की सरकार बनने वाली है जो दिल्ली के विकास से अलग न तो कुछ सोचेगी और न कुछ करेगी। दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों में से 67 सीटें जीतकर अरविन्द केजरीवाल को लगा कि दिल्ली में घुसकर (अर्थात दिल्ली प्रदेश की सत्ता पर कब्जा करके) अब उनके लिए ‘दिल्ली’ दूर (अर्थात देश का प्रधानमंत्री बनना) नहीं है। इसलिए उनकी महत्वाकांक्षाओं को पर लग गये। उनकी वाणी अनियंत्रित हो गयी। वह ये भूल गये कि राजनीति में अपने विरोधियों पर कैसे हमला किया जाता है और हमला करते समय किन-किन मर्यादाओं का ध्यान रखा जाता है? उन्होंने दिल्ली के विकास को छोडक़र पीएम मोदी को सीधे निशाने पर ले लिया। दिल्ली की समझदार जनता ने देखा कि हमारा मुख्यमंत्री हमारी समस्याओं के समाधान देने की बजाए ‘दिल्ली हासिल करने’ की योजनाओं में अधिक व्यस्त है तो उसका अपने मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से मोहभंग होने लगा। दूसरी गलती अरविन्द केजरीवाल ने यह की कि उन्होंने अपनी सत्ता को अपने लिए सुरक्षित करने के लिए नये-नये विकल्पों पर विचार करना आरंभ कर दिया। उन्होंने पंजाब पर अधिक ध्यान दिया और वहां आतंकवादियों तक से हाथ मिलाने में भी परहेज नहीं किया। उन्हें सत्ता का सौदा करना था और उसके लिए चाहे जो भी हथकंडा अपनाया जाए उसके लिए वह तैयार थे। वह दिल्ली छोडक़र पंजाब का मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहे थे जिससे कि उन्हें अगले पांच वर्ष फिर एक प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिल जाए। इससे भी दिल्ली की जनता को लगा कि इस व्यक्ति को केवल सत्ता चाहिए और उसके लिए वह कुछ भी कर सकता है। फलस्वरूप जनता ने केजरीवाल को छोडऩा आरंभ कर दिया।
अरविन्द केजरीवाल के समय में दिल्ली के विकास कार्य लगभग ठप्प पड़े हैं। महोदय ने चुनावी वायदे पूरे करने में प्रदेश का खजाना लुटा दिया है। दिल्ली ने देख लिया है कि अरविन्द केजरीवाल के मंत्री और विधायक न केवल भ्रष्टाचारी हैं अपितु बलात्कारी भी हैं। ऐसे कई मामले ‘आप’ के विधायकों व मंत्रियों के सामने आये हैं-जिन्हें देखकर अत्यंत गिरावट का दंश झेल रही भारतीय राजनीति को और भी अधिक लज्जित होना पड़ा है। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने अपने विधायकों के वेतन में अप्रत्याशित वृद्घि कर के यह संकेत दे दिया था कि यह सरकार वीतराग सन्यासियों की सरकार न होकर लुटेरों की सरकार है और उसका उद्देश्य धन कमाना है। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने अपने 20 से अधिक विधायकों को निगमों के चेयरमैन आदि बनाकर उन्हें भी लूट के लाइसेंस बांटे और उन्हें मंत्रियों की तरह जीवन जीने के लिए सारी सुविधाएं उपलब्ध करायीं। इन सारे पापों का जनता ने एमसीडी के चुनावों में सारा हिसाब करते हुए ‘आप’ को कठोर दण्ड दे दिया है।
उधर कांग्रेस की स्थिति भी पूर्व से ही लग रही थी कि यह पार्टी भी बुरी तरह पिटने वाली है। इसका कारण यह था कि पार्टी नेता राहुल गांधी इस समय यूपी की कमरतोड़ पिटाई के घावों को सहलाने में लगे रहे हैं। उन्होंने दिल्ली के इन चुनावों में कोई रूचि नही ली है। सारी दिल्ली कांग्रेस ने यह चुनाव बिना किसी चेहरे के अनमने मन से लड़ा है। वह एक राष्ट्रीय पार्टी रही है, इसलिए उसे चुनाव तो लडऩा था पर उसका उत्साह बढ़ाने के लिए उसके किसी नेता का संरक्षण या मार्गदर्शन उसे नहीं मिल रहा था। उत्साहहीन कांग्रेस चुनावों में बैसाखियों के सहारे उतरी और अंत में लड़खड़ाकर गिर गयी। ऐसी मानसिकता से जो कोई चुनाव में उतरता है वह अंत में गिर ही जाता है। 
दिल्ली की जनता ने उत्तर प्रदेश को दोहराकर भाजपा को प्रचण्ड बहुमत दे दिया है। निश्चय ही यह भाजपा के पीएम मोदी व अमितशाह की चुनाव प्रबंधन योजना की जीत है। ऐसा भाजपा वाले कह सकते हैं, परंतु भाजपा को अपने घमण्ड को नियंत्रित रखने के लिए यह भी मानना चाहिए कि यह विकल्पविहीनता की भी जीत है। दिल्ली की जनता के सामने कोई विकल्प नहीं था तो भाजपा ही सही। अन्यथा अब जनता आतंकवादियों के सामने असहाय खड़े गृहमंत्री राजनाथसिंह के कड़े शब्दों में निंदा करने की प्रवृत्ति से ऊबकर आतंकी घटनाओं में सम्मिलित लोगों के विरूद्घ कठोर कार्यवाही चाहती है। गृहमंत्री की शिथिलता से भाजपा का ग्राफ गिर रहा है, पर विकल्पविहीनता की स्थिति उसे चुनावी लाभ दे रही है। वैसे यह गलत है कि किसी एक दल को हर स्थान पर प्रचण्ड बहुमत मिले। ऐसी स्थिति ऐसे दल को अहंकारी बनाती है और अंत में पतन के गर्त में ले जाती है। अच्छा हो कि भाजपा अहंकार शून्य रहे।

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