भारत में नक्सलवाद को कम्युनिस्ट आंदोलन की देन माना जा सकता है। वास्तव में कम्युनिस्ट अब एक आंदोलन नहीं रह गया है। यह अब एक मृत विचारधारा बन चुका है और विश्वशांति के समर्थक किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए अब ‘कम्युनिज्म’ में कोई आकर्षण नही रहा है। इसका कारण है कि साम्यवादी विचारधारा अपने आप में एक रक्तिम विचारधारा है। इसका अभी तक का सारा इतिहास रक्तिम रहा है।
उदाहरण के रूप में रूस में साम्यवादी क्रांति (1917) होते ही 1921 में अकाल पड़ा तो उसमें लगभग पौने तीन करोड़ लोग प्रभावित हुए थे उसमें सरकारी प्रबंधन से कुपित होकर 16000 नाविकों ने विद्रोह कर दिया था। जिसे रूस के तत्कालीन तानाशाह राष्ट्रपति लेनिन ने अपने 60000 सैनिकों की तैनाती कर निर्ममता से कुचलवा दिया था और 16000 नाविकों को स्वर्ग लोक पहुंचा दिया था। इसके पश्चात रूस में जब स्टालिन का शासन आया तो वहां दो करोड़ से अधिक लोगों की हत्याएं कर दी गयीं थीं। उनका अपराध केवल यह था कि वे साम्यवादी विचारधारा की क्रूरता के सामने बोलने का साहस कर रहे थे।
1951 में हंगरी में सोवियत संघ ने अपनी क्रूरता का प्रदर्शन किया, जिसमें 25000 हंगरी नागरिकों को मार दिया गया था। 1968 की अगस्त में छह लाख रूसी और अन्य वर्साव सैनिकों ने लोकतांत्रिकीकरण के ‘डब चेक’ प्रयास को रौंदने के लिए चेकोस्लोवाकिया में टैंकों के साथ आक्रमण किया। सन 1981 में चीन ने लोकतंत्र की मांग कर रहे अपने छात्रों की मांग को निर्दयतापूर्वक कुचल कर बड़ी संख्या में छात्रों को मौत के घाट उतार दिया था। पश्चिम बंगाल में सन 1977 से लेकर 2001 के मध्य साम्यवादियों के शासनकाल में लगभग 44000 हत्याएं की गयीं। इस का अभिप्राय था कि 1735 व्यक्ति प्रतिवर्ष मारे गये अर्थात विचारधारा के नाम पर बंगाल में चार व्यक्ति प्रतिदिन मारे जाते रहे। तब किसी भी ‘अखलाक’ की मृत्यु पर कम्युनिस्टों ने एक दिन भी छाती नही पीटी थी।
पश्चिम बंगाल में 1992 से 1996 के मध्य बलात्कार की संख्या 3712 प्रति वर्ष थी। जो कि 1997 से 2001 के बीच बढक़र 4847 हो गयी। किसी भी ‘निर्भया’ को देखकर साम्यवादियों का हृदय नही पसीजा और ना उन्होंने एक दिन भी यह कहा कि बलात्कार की पीडि़ता हर महिला भारत की बेटी है। उन्हें बलात्कार की पीडि़ता हर नारी उस समय ‘गर्म गोश्त’ ही दिखायी देती रही।
मजदूरों की सबसे अधिक चिंता करने वाले कम्युनिस्टों के शासनकाल में पश्चिम बंगाल में 1980-1990 के मध्य औद्योगिक आतंकवाद के चलते फेक्ट्रीयों में आत्महत्या की 63 घटनाएं हुईं। जबकि 1991 से 2001 के दशक में यह संख्या 85 हो गयी। कुछ कालोपरांत 2003 में पश्चिम बंगाल में 19 लाख श्रमिकों वाली 53000 औद्योगिक इकाइयां बंद हो गयीं।
अब साम्यवादियों की ‘सहिष्णुता’ देखिये। केरल में 1961 से 2002 के मध्य आरएसएस के 150 से अधिक कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गयी। 1994 से अक्टूबर 2000 तक कम्युनिस्ट आतंकियों ने झारखण्ड में 1042 लोगों की हत्या कीं। ये कट्टरवादी नरसंहार की 3500 घटनाओं के उत्तरदायी हैं।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि साम्यवादी विचारधारा अपने आप में एक अलोकतांत्रिक विचारधारा है जो अपने मूल स्वभाव में पूर्णत: असहिष्णु है। जहां तक भारत की बात है तो इस देश में रहकर भी साम्यवादी इसके विरोधी हैं। वर्तमान में भारत के इतिहास का विकृतीकरण कर भारत की हानि करने में कम्युनिस्टों ने जितना अपना सहयोग दिया है उतना किसी अन्य ने नहीं दिया है। इनके ऐसे काले कारनामों को देखकर ही लोगों ने साम्यवादियों से मुंह फेर लिया है। अब यह सत्ता से दूर कर दिये गये हैं और ये अपने किये का दण्ड भोग रहे हैं। अब भारत में नक्सलवाद के नाम पर कम्युनिस्ट एक नया आतंकवाद खड़ा कर रहे हैं।
नक्सलवादी उन आंचलों में सक्रिय होते हैं जहां सबसे अधिक निर्धन लोग रहते हैं। निर्धन लोगों के भीतर सरकार के विरूद्घ पनप रहे क्षोभ और आक्रोश को ये लोग भुनाते हैं और निर्दोष लोगों को अपने चंगुल में फंसाकर उन्हें निर्दोषों का रक्त बहाने के लिए प्रेरित करते हैं। यद्यपि सैद्घांतिक दृष्टि से वहां माओवाद नहीं होता, परंतु इनका एक ही उद्देश्य होता है कि जो सत्ताधीश अर्थात शासन और जनता के बीच के लोग तुम्हें दुखी कर रहे हैं उन्हें मारते चलो। तुम्हें रोटी की समस्या है तो वह तुम्हें हम दिलाएंगे। इस प्रकार अराजकता का सहारा लेकर लोगों को उसके लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इस प्रोत्साहन का उद्देश्य देश में सर्वत्र हिंसा फैलाना और कटुता का वातावरण उत्पन्न करना है। जिससे देश के विकास कार्य प्रभावित हों और देश में सर्वत्र घृणा की आग फैल जाए। कांग्रेसियों के साथ सत्य, अहिंसा और प्रेम की बात कहने वाले गांधीजी को कम्युनिस्ट बड़ी श्रद्घा से देखने का नाटक करते हैं। परंतु गांधीजी की अहिंसा के विपरीत समाज में सर्वत्र हिंसा और घृणा का परिवेश स्थापित करते हैं।
सरकार को चाहिए कि नक्सलवादी हिंसा में लगे युवाओं की आर्थिक समस्याओं का समाधान दें और नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में नक्सलवादियों की पीठ थपथपा रहे कम्युनिस्टों के सूत्रों को काटने के लिए उन्हें स्कूली पाठ्यक्रम के माध्यम से देशभक्ति का पाठ पढ़ाया जाए। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का यह कथन निश्चय ही स्वागत योग्य है कि देश में अब जातिवाद की राजनीति न होकर देशभक्ति की राजनीति होगी। देशभक्ति की राजनीति ही राष्ट्रनीति होती है और यही राष्ट्रधर्म होता है। आज नक्सलवादियों को इसी राष्ट्रनीति और राष्ट्रधर्म को पढ़ाने व समझाने की आवश्यकता है। अच्छा होगा कि नक्सलवादी हिंसा को रोकने के लिए नक्सलवादियों और साम्यवादियों के सूत्र काटे जाएं और नक्सलवादियों को बताया जाए कि इन साम्यवादियों का देशभक्ति से कोई संबंध नहीं है। इनका उद्देश्य तो भारत और भारतीयता का विरोध करना है। पर तुम मां भारती के पुत्र हो और सारा देश तुम्हारी संवैधानिक मांगों को पूर्ण करने के लिए तैयार है। हमारा मानना है कि तब निश्चय ही कोई समाधान निकलेगा।

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