क्या उसने इसके उपाय किये हैं या कौन से अन्य उपाय किये जाने उसके पास शेष हैं? यदि उसके पास कुछ शेष है तो उसके विकल्प क्या हैं? हमारी जनता भी अपने राजनीतिज्ञों से ऐसे ही प्रश्न पूछे। उन्हें वास्तविक बिंदुओं पर लाने के लिए वह प्रेरित भी करे और बाध्य भी करे। ‘हवाई फायरों’ की अपेक्षा उन्हें यथार्थ के धरातल पर लाया जाए। तभी स्वतंत्रता की रक्षा संभव है और वही वास्तविक स्वतंत्रता भी मानी जा सकती है जिसमें ‘सबको विकास के समान अवसर उपलब्ध हों।’ विकास के अवसरों का दोहन और शोषण कर लेना तो स्वतंत्रता का ही अपहरण कर लेना है। कोई भी व्यक्ति देश में ऐसा न रहे जो विकास के समान अवसरों से वंचित हो, यदि ऐसे लोग समाज में हैं जो विकास के समान अवसरों से वंचित हों तो उन्हें समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए जागरूक लोगों को सामने आना चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में विकास के सभी अवसरों पर कुछ लोगों ने अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया है।
भारत में यही तो हो रहा है। देश के सारे संसाधनों, संस्थानों, उद्यमों और उद्योगों पर कुछ विशेष लोगों का आधिपत्य हो गया है। अवैध रूप से ‘अधिपति’ बने ये लोग राजनीतिज्ञों को चुनाव के लिए पैसा उपलब्ध कराते हैं और फिर राजनीतिज्ञ इन्हें पैसा कमाने के अवसर उपलब्ध कराते हैं। इस प्रकार राजनीतिक स्वतंत्रता भी अपहृत होकर रह गयी है। ‘स्वतंत्रता को खतरा’ राजनीतिक स्वतंत्रता के अपहरण के उपरोक्त उदाहरण के परिप्रेक्ष्य में हमारे नागरिक इसका वास्तविक अर्थ समझें। ‘देश बचाओ या क्षेत्र बचाओ’ का रहस्य हम तब सहज ही समझ जाएंगे। राष्ट्र को खतरा, राष्ट्र के मान-सम्मान की लड़ाई के इनके आवाह्न, देश के सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति समर्पण के इनके संकल्प और राष्ट्र की एकता और अखण्डता की निस्सारता और अवास्तविकता तब हमें सहज ही ज्ञात हो जाएगी।
तब हम समझ जाएंगे कि ‘आजादी को खतरा’ का अर्थ निहित स्वार्थों और कुर्सी संकट से है, इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। महाभारत के युद्घ से पूर्व कौरव कह रहे थे कि राष्ट्र संकट में है, कुलगुरू कृपाचार्य, गुरू द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह आदि का भी यही कथन था कि-”राष्ट्र संकट में है।” आज के राजनीतिज्ञों की भांति धृतराष्ट्र भी यही कहे जा रहे थे कि-‘राष्ट्र अभूतपूर्व संकटों के दौर से गुजर रहा है।’
महाभारत का कारण
राष्ट्र को लेकर सबका अपना-अपना दृष्टिकोण था, अपनी अपनी सोच थी और राष्ट्र पर मंडरा रहे संकट के दृष्टिगत अपनी -अपनी व्याख्या एवं परिभाषा थी। किंतु दो व्यक्तियों अर्थात श्रीकृष्ण और महात्मा विदुर की सोच और दृष्टिकोण इन सभी से भिन्न थे।  उनकी यह मत भिन्नता भी अन्य लोगों से थोड़े से अंतर पर ही खड़ी थी। बस! इतने अंतर पर कि वे यह न सोचकर कि ‘राष्ट्र संकट में है’ बलिक यह सोच रहे थे कि ‘राष्ट्र क्यों संकट में है?’ उनके कत्र्तव्यबोध और राष्ट्रबोध ने उन्हें यह अनुभव करा दिया था कि राष्ट्र संकट में क्यों है? उनका यह ‘क्यों’ का निष्कर्ष धृतराष्ट्र को भी बुरा लगता था और चिंतित भीष्म पितामह को भी बुरा लगता था।
परिणाम क्या निकला?- महायुद्घ, महाभारत। युद्घ से पूर्व जब श्रीकृष्णजी पांडवों के दूत बनकर शांति-संधिवात्र्ता के लिए हस्तिनापुर पधारे तो सायंकाल को दुर्योधन ने उनसे अपने साथ भोजन करने का आग्रह किया, जिसे श्रीकृष्ण जी ने सविनय अस्वीकार कर दिया।
उन्होंने कहा-दो स्थितियों में ही भोजन का निमंत्रण स्वीकार किया जाता है, एक तो तब जबकि भूख के मारे प्राण निकल रहे हों तो ऐसे में जो कुछ मिल जाए, व्यक्ति उसी को बड़े ही प्रेम से खाता है, दूसरे-जब आमंत्रण देने वाले से गहरा प्रेम हो तो वहां भोजन करके प्रसन्नता की अनुभूति होती है। आपके यहां दोनों ही बातें नहीं हैं। प्रेम भाव तो आप में है ही नहीं और भूख के कारण मैं भी व्याकुल नहीं हूं, इसलिए धन्यवाद।
देशभक्तों का अज्ञातवास
देश की स्वतंत्रता के पश्चात ‘दुर्योधन’ ने देश की सत्ता पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया और ‘पांडवों’ को देश निकाला दे दिया। यही कारण है कि सुभाष चंद्र बोस जैसे लोग आज तक अज्ञातवास में हैं। उन्हें जिन रक्तिम हाथों से ‘भारतरत्न’ दिया गया उसमें दुर्योधन रूपी देश के सत्ताधीशों का आत्मीय भाव नहीं था, इसलिए नेताजी के परिजनों ने उस ‘भारतरत्न’ को उसी प्रकार  सविनय वापिस लौटा दिया जिस प्रकार कृष्ण जी ने दुर्योधन के द्वारा दिया गया भोजन का आमंत्रण सविनय ठुकरा दिया था।
कृष्ण जी ने दुर्योधन के भोजन का आमंत्रण अस्वीकार कर विदुर की झोंपड़ी की राह पकड़ी थी। हमें आज ढूंढऩा होगा, विदुर की उस झोंपड़ी को, विदुर को, विदुर की नीति को, विदुर के विचारों को, विदुर की स्पष्टता को। तब ज्ञात होगा कि स्वतंत्रता क्या होती है? उसे किस ‘दुर्योधन’ ने कब क्यों और कैसे हड़प लिया था? तभी ज्ञात होगा कि इस स्वतंत्रता के वास्तविक अधिकारी कौन हैं? तभी होगा उन सारे षडय़ंत्रों का भण्डाफोड़ जिनके कारण स्वतंत्रता मिलने के पश्चात भी हम स्वतंत्र नहीं हुए।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)
पुस्तक प्राप्ति का स्थान-अमर स्वामी प्रकाशन 1058 विवेकानंद नगर गाजियाबाद मो. 9910336715

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