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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

राष्ट्रीय साक्षरता अभियान

हमारे देश में लोगों को साक्षर करने का मिशन बड़े जोरों पर चलाया गया है। राजनीतिज्ञों ने इस अभियान का राजनीतिक लाभ और देश के नौकरशाहों ने आर्थिक लाभ उठाने का भी भरपूर प्रयास किया है। अपने इस प्यारे एवं ‘सारे जहां से अच्छे हिंदुस्तान’ में जिस प्रकार सडक़ें फाइलों में बन जाती हैं और फाइलों में ही टूटने-फूटने पर पुन: उनकी मरम्मत भी कर दी जाती है उसी प्रकार इस साक्षरता मिशन का लाभ हमारे नौकरशाह पत्रावलियों में ही उठा लेते हैं। फिर वे पत्रावलियां आंकड़ों का एक प्रमाण बन जाती हैं, हमारे राजनीतिज्ञों के लिए। जिनके सहारे वे घोषणाएं करके जनता से वोट मांगते हैं और चुनावी वैतरणी को पार करने का जी तोड़ प्रयास करते हैं।
साक्षरता मिशन नहीं शिक्षा अभियान
आप तनिक विचार करें कि हमारी शिक्षा कैसी हो? बृहदारण्यक उपनिषद में ऋषि क्या कहते हैं? तनिक विचार करें-
सहनौअवतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।।
ऋषि का कहना है कि हमारी शिक्षा हमें निम्नलिखित पांच उद्देश्यों को प्राप्त कराने वाली हो-
1. ‘सहनौ अवतु’ अर्थात हमारी शिक्षा हमें आत्मरक्षा में समर्थ कराने वाली हो।
2. ‘सहनौभुनक्तु’ अर्थात रोजी रोटी की समस्या सुलझाने वाली हो शिक्षा।
3. ‘सहवीर्यं करवावहै’ अर्थात शिक्षा सामाजिक पराक्रम के गुण हमारे भीतर भरने वाली हो।
4. ‘तेजस्विनावधीतमस्तु’ अर्थात शिक्षा तेजस्विता के गुणों को देने वाली हो।
5. ‘मा विद्विषाव है’ अर्थात शिक्षा विद्वेष की भावना को समाप्त करने वाली हो। इससे स्पष्ट है कि भारतीय शिक्षा व्यक्ति को सर्वप्रथम आत्मरक्षा में समर्थ बनाती है। उसे दीन हीन नहीं बनाती। भोजनादि के लिए उसे दूसरों के सम्मुख हाथ फैलाने के लिए प्रेरित नहीं करती, अपितु उसे स्वयं ही अपनी रोजी-रोटी के जुगाड़ के लिए समर्थ बनाती है।
हमारी शिक्षा इसीलिए हमें आश्रम व्यवस्था की ओर ले जाती थी और हम आज के विद्यार्थियों की भांति श्रम से मुंह चुराने वाले न होकर श्रमशील होते थे। आश्रम का अर्थ ही यह है कि जहां श्रम ही श्रम करना पड़े। एक आश्रम में ब्रह्मचर्य की, दूसरे में गृहस्थ के दायित्वों के निर्वाह की, तीसरे में स्वाध्यायशीलता की, चौथे में संयुक्त + न्यासी (संन्यासी) बनकर अब तक प्राप्त किये गये ज्ञानार्जन को वितरित कर देने की आश्रम व्यवस्था थी। हमारी शिक्षा इसी सामाजिक पराक्रम को हमारे भीतर भरने वाली होगी तो जीवन ही स्वर्ग बन जाएगा। ऐसी शिक्षा ही हमारे भीतर तेजस्विता का विशेष गुण उत्पन्न करने वाली होगी। जब ये श्रमशीलता और तेजस्विता के गुण हमारे अंदर समाविष्ट होंगे तो हमारे भीतर एक दूसरे के प्रति द्वेषभाव तो जन्मेगा ही नहीं। आज ऐसी ही शिक्षा के अभियान को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी। किंतु दुर्भाग्यवश देश के राजनैतिक नेतृत्व को विदेशों के अंधानुकरण का ऐसा रोग लगा कि उनके विवेक और बुद्घि को इस अंधानुकरण का पाला बुरी तरह मार गया। 
हम  शिक्षा के नाम पर कुशिक्षा को परोसने लगे। कुछ लोगों ने ऐसा षडय़ंत्र रचा और स्वतंत्र भारत की शिक्षा नीति ही ऐसी बनाई है कि व्यक्ति प्रबुद्घ और ज्ञान समृद्घ नागरिक तो बन ही न सके।
हमने व्यक्ति के पढ़ाने को ही शिक्षा मान लिया, उससे थोड़ा आगे बढ़े तो रोजी-रोटी का जुगाड़ कराने के लिए शिक्षा को एक माध्यम मान लिया, किंतु तेजस्विता, श्रमशीलता, सामाजिक पराक्रमशीलता और अविद्वेष की भावना को बलवती कर हमें ज्ञान समृद्घ कराने का उचित माध्यम शिक्षा को नहीं बनने दिया गया। क्योंकि हमने शिक्षा को रोजी-रोटी कमाने का माध्यम बनाकर प्रस्तुत किया, इसलिए देश में ‘साक्षरता मिशन’ चलाया गया और चलाया जा रहा है। रोजी-रोटी कमाने के भाव ने यहां भौतिकवाद को पनपाया है और अध्यात्मवाद को (जो कि भारत के सनातन वैदिक धर्म की पहचान है) मिटाया है। फलस्वरूप मानव जीवन भौतिकवादी बनता जा रहा है। अध्यात्मवाद अर्थात अविद्वेष का भाव, श्रमशीलता, स्वाध्यायशीलता आदि उच्चता के भाव उससे सिमटते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप समाज में द्वेष की आग सुलग रही है।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)
पुस्तक प्राप्ति का स्थान-अमर स्वामी प्रकाशन 1058 विवेकानंद नगर गाजियाबाद मो. 9910336715

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