सरकारी बजट पर रेवड़ी संस्कृति का बढ़ता साया

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ललित गर्ग

सब्सिडी और मुफ्त में अंतर करना भी आवश्यक है क्योंकि सब्सिडी जरूरतमंदों को मिलने वाले उचित और एक वर्ग विशेष को दिए जाने वाला लाभ है, जबकि मुफ्तखोरी काफी अलग है यह आम वोटरों को लुभाने का जरिया है।

सरकारों के बजट भी अब मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त उपहार बांटने, तोहफों, लुभावनी घोषणाएं एवं योजनाओं की बरसात करने का माध्यम बनते जा रहे हैं। बजट में भी ‘रेवड़ी कल्चर’ का स्पष्ट प्रचलन लगातार बढ़ रहा है, खासकर तब जब उन राज्यों में चुनाव नजदीक हों। ‘फ्रीबीज’ या मुफ्त उपहार न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में वोट बटोरने का हथियार हैं। यह एक राजनीतिक विसंगति एवं विडम्बना है जिसे कल्याणकारी योजना का नाम देकर सत्ताधारी पार्टी राजनीतिक लाभ की रोटियां सेंकती है। यह तय करना कोई मुश्किल काम नहीं है कि कौन-सी कल्याणकारी योजना है और कौन-सी मुफ्तखोरी यानी ‘रेवड़ी कल्चर’ की, परंतु राजनीतिक मजबूरी इसे चुनौतीपूर्ण बना देती है। भारत जैसे विकासशील देश की विभिन्न राज्यों की सरकारें सरकारी बजट के माध्यम से आम-जनता को प्रभावित करने का हरसंभव प्रयास करती है। छत्तीसगढ़ सरकार का बजट इसका ताजा उदाहरण है। उसने बजट में प्रावधान किया है कि युवाओं को ढाई हजार रुपए मासिक बेरोजगारी भत्ता देगी। इसके अलावा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, होमगार्डों, ग्राम कोटवारों आदि के मानदेय में भी वृद्धि की घोषणा की है। क्या सरकार को रोजगार एवं विकास पर ध्यान नहीं देना चाहिए।

बात केवल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी या भाजपा की ही नहीं है, बल्कि हर राजनीतिक दल सरकारी खजानों का उपयोग आम मतदाता को अपने पक्ष में करने के लिये करता है। छत्तीसगढ़ सरकार की ही तरह एक दिन पहले मध्य प्रदेश सरकार ने भी अपने बजट में लाड़ली बहना योजना शुरू की, जिसके तहत ऐसी महिलाओं को एक हजार रुपए प्रति माह सरकारी सहायता देने की घोषणा की गई, जो आयकर के दायरे में नहीं आतीं और जिनके परिवार की आमदनी ढाई लाख रुपए वार्षिक से कम है। पंजाब विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने महिलाओं को वजीफा देने की घोषणा की थी। राजस्थान सरकार तो पहले ही ऐसी लुभावनी योजनाओं की बरसात कर चुकी है। गौरतलब है कि पंजाब के अलावा इन तीनों राज्यों में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं और सभी राजनीतिक दल उसकी तैयारी में जुटने लगे हैं। इन सरकारों की घोषणाओं में स्पष्ट रूप से चुनावी मकसद देखा जा सकता है। हर कल्याणकारी सरकार का दायित्व है कि वह अपने नागरिकों को आर्थिक रूप से सक्षम बनने के अवसर उपलब्ध कराए। लेकिन सरकार चुनाव के समय ही ऐसी लुभावनी योजनाएं लेकर क्यों आती है?

सभी राजनीतिक दलों की बड़ी लुभावनी घोषणाएं होती हैं, घोषणा पत्र होते हैं- जनता को पांच वर्षों में अमीर बना देंगे, हर हाथ को काम मिलेगा, सभी के लिए मकान होंगे, सड़कें, स्कूल-अस्पताल होंगे, बिजली और पानी, हर गांव तक बिजली पहुंचाई जायेगी, शिक्षा-चिकित्सा निःशुल्क होगी। ये राजनीतिक घोषणाएं पांच साल में अधूरी ही रहती है, फिर चुनाव की आहट के साथ रेवड़ियां बांटने का प्रयत्न बजट के माध्यम से किया जाता है, कितने ही पंचवर्षीय चुनाव हो गये और कितनी ही पंचवर्षीय योजनाएं पूरी हो गईं पर यह दुनिया का आठवां आश्चर्य है कि कोई भी लक्ष्य अपनी समग्रता के साथ प्राप्त नहीं हुआ। खुशहाल देश और समाज वही माना जाता है, जहां लोग निजी उद्यम से अपने गुजर-बसर संबंधी सुविधाएं जुटाते हैं। खैरात पर जीने वाला समाज विपन्न ही माना जाता है। लोग भी यही चाहते हैं कि उन्हें कुछ करने को काम मिले। इसी से उन्हें संतोष मिलता है। मगर हकीकत यह है कि देश में नौकरियों की जगहें और रोजगार के नए अवसर लगातार कम होते गए हैं। सरकारों की तरफ से ऐसे अवसरों को बढ़ाने के व्यावहारिक प्रयास न होने की वजह देश एवं प्रांत समग्र एवं चहुंमुखी विकास की ओर अग्रसर नहीं हो पाते हैं। सरकारें अपनी इस नाकामी एवं कमजोरी पर पर्दा डालने के लिए मुफ्त सहायता देने की परंपरा विकसित कर ली है। चाहे वह मुफ्त राशन हो, बेरोजगारी भत्ता हो या फिर महिलाओं को वजीफा हो, मुक्त बिजली-पानी हो, मुफ्त चिकित्सा हो, मुफ्त यात्रा हो- इस मामले में किसी भी राजनीतिक दल की सरकार पीछे नहीं है। अब तो इस मामले में जैसे एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़-सी नजर आने लगी है। सवाल है कि सरकारें इस पहलू पर कब विचार करेंगी कि हर हाथ को काम मिले, रोजगार बढ़े, स्वरोजगार की स्थितियां बने। लोगों के हाथ में काम होगा, तो उन्हें इस तरह सरकारों की मुफ्त की योजनाओं के लिए हाथ परसारने पर मजबूर ही नहीं होना पड़ेगा। जब लोगों के हाथ में काम होता है, तो न सिर्फ उनकी पारिवारिक स्थिति सुधरती है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी बल मिलता है। लेकिन लगता है सरकारें आम जनता को समर्थ बनाना ही नहीं चाहती, गरीब को गरीब बनाये रखने में ही उनका राजनीतिक हित है, तभी वे रेवड़ियां बांटने का चुनावी लाभ उठा सकती है।

भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों अपने चुनावी एवं गैर-चुनावी संबोधनों में मुफ्त संस्कृति को लेकर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा था कि यह आधारभूत संरचना के विकास में अवरोध है। इसे ‘शॉर्टकट’ बताकर इसके खतरे से आगाह किया और मुफ्त संस्कृति पर बहस को आगे बढ़ाया। उच्चतम न्यायालय में भी इस सम्बंध में जनहित याचिकाएं की सुनवाई करते हुए कहा था कि, ‘इस तरह से फ्रीबीज बांटना सरकार के लिए ऐसी परिस्थिति खड़ी कर सकता है कि जहां सरकारी खजाना खाली होने की वजह से जनता को आम सुविधाओं से वंचित होना पड़े। चुनाव के समय और सरकार में आने के बाद गरीब कल्याण के नाम पर रेवड़ी बांटने का काम सरकार और राजनीतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार करते हैं। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक गरीब कल्याण के नाम पर सरकारें अपनी योजनाओं का ढिंढोरा पीटती हैं। गरीब कल्याण की भावना के साथ काम करने वाली सरकार गरीब और जरूरतमंदों को सब्सिडी के साथ अनेक सुविधाएं उपलब्ध कराती है इसमें सरकारी अस्पताल में सस्ता इलाज, स्कूलों में मुफ्त शिक्षा और मिड डे मील के साथ अन्य कई सुविधाएं शामिल हैं। सरकारों ने नौकरी और रोजगार सृजन की तरफ से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह की योजनाओं को सबसे आसान रास्ता समझ लिया है। इस रास्ते पर वे कितने समय तक चल सकेंगी, इसका ठीक-ठीक आकलन शायद ही किसी ने किया हो। अब तो ऐसा लगने लगा है कि जैसे सरकारों में रोजगार सृजन की इच्छाशक्ति भी नहीं बची है।

बजट की लोक-लुभावन घोषणाओं के आर्थिक अर्थों में मुफ्त के प्रभावों को समझने और इसे करदाताओं के पैसे से जोड़ने की जरूरत है। सब्सिडी और मुफ्त में अंतर करना भी आवश्यक है क्योंकि सब्सिडी जरूरतमंदों को मिलने वाले उचित और एक वर्ग विशेष को दिए जाने वाला लाभ है, जबकि मुफ्तखोरी काफी अलग है यह आम वोटरों को लुभाने का जरिया है। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि यह पैसा करदाताओं का है, जिसका उपयोग पार्टियां अपने निजी प्रचार और वोटों की राजनीति के लिए कर रही हैं। रेवड़ी संस्कृति यानी सरकारी खजाने से भारी-भरकम चुनावी वादों की पूर्ति। कुछ लोग इसे जनता को मुफ्तखोरी की लत लगाने का नाम देते हैं। सार्वजनिक विमर्श में इसे फ्रीबीज या कहें कि मुफ्त उपहार की पेशकश कहा जाता है।

सरकारी बजट को आम जनता के विकास का माध्यम बनाना चाहिए न कि उन्हें मुफ्त या खैरात बांट कर अकर्मण्य बनाया जाये। जरूरत मुक्त की संस्कृति को नियंत्रित करने की है। सत्ताधारी राजनीतिक दल राजनैतिक लाभ की रोटियां सेंकने की बजाय बेहतर प्रभावी आर्थिक नीतियां बनाएं और उसे लाभार्थियों तक सही तरीके से पहुंचाएं तो इस प्रकार की मुफ्त घोषणाओं की जरूरत नहीं रहेगी। चुनाव के समय सत्ताधारी पार्टियों को अपने बजट में उन आर्थिक नीतियों या विकास मॉडलों को विस्तार से लागू करना चाहिए जो वास्तविक रूप में उस प्रांत की जरूरत हैं। उन्हें जनता के सामने उन नीतियों को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए और प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए। समाज की, वास्तविक विकास और सुशासन सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है, इसलिए लोगों को इस तरह के मुफ्त उपहार देने की एक सीमा होना जरूरी है। आज जिस तरह से सरकारें गरीबों के हित के नाम पर मुफ्त की स्कीम लांच कर रही है वास्तव में वह इससे अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति कर रही है। इस तरह देश के गरीबों में मुफ्तखोरी की आदत डालना सही नहीं है। मुफ्तखोरी की राजनीति से लोकतंत्र को खतरा हो सकता है और इससे देश का आर्थिक बजट लड़खड़ाने का भी खतरा है। इसके साथ इस सबसे निष्क्रियता एवं अकर्मण्यता को बल मिलेगा अगर मुफ्त का राशन, बेरोजगारी एवं महिला भत्ता मिलेगा तो लाभार्थी काम करना बंद कर देंगे। हिंदुस्तान में लोगों को बहुत कम में जीवन निर्वहन करने की आदत है ऐसे में जब मुफ्त राशन, बिजली, पानी, शिक्षा, चिकित्सा मिलेगा तो काम क्यों करेंगे?

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