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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से विश्वगुरू के रूप में भारत

विश्वगुरू के रूप में भारत-39

सिंधु नदी के मुहाने से लेकर कुमारी अंतरीप तक समुद्र के किनारे रहने वाले लोगों के प्रयत्नों का ही प्रभाव था कि उनकी शानदार सभ्यता यहां पुष्पित एवं पल्लिवत हुई। ये लोग समुद्र के किनारे-किनारे चलकर ओमान, यमन होते हुए शक्तिशाली धारा को पार करके मिस्र न्यूकिया एवं अबीसिनिया आये। ये वही लोग हैं जो शताब्दियों तक इन स्थानों में फलते फूलते रहे और अपनी सभ्यता का प्रसार हैलास और उसके द्वीपों में करते रहे।”
हमारा मानना है कि जिस भारत देश के प्राचीन साहित्य में विशेषत: पुराणों में विभिन्न महाद्वीपों के नाम स्पष्ट अंकित हों, और जो देश सम्पूर्ण भूमंडल को उत्तम राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था देने के लिए सम्पूर्ण भूमंडल को अपने राजाओं में अलग-अलग विभाजित कर उन राजाओं को अलग-अलग महाद्वीपों का ‘जनलोकपाल’ नियुक्त करने का महत्वपूर्ण कार्य उस समय पूर्ण कर सकता है जब यह संसार आंखें ही खोल रहा था, उस देश के विषय में यह सत्य ही है कि उसने ही अपनी संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर संपूर्ण भूमंडल के लोगों को मानवता का पाठ पढ़ाया। बहुत से इतिहासकारों और विद्वानों के ऐसे विचार हैं-जिनसे हमारे इस मत की पुष्टि होती है।
भारत के विषय में यह निर्विवाद सत्य है कि इसने अपनी वैदिक संस्कृति के माध्यम से एक उन्नत जीवनशैली की खोज कर ली थी। जिसमें व्यापार के लिए दूर देशों में जाना और जाने के लिए विमानों का प्रयोग करना भी इसने सीख लिया था। विमानों के विषय में भारत के ज्ञान-विज्ञान पर हम आगे चलकर प्रकाश डालेंगे और बताएंगे कि विमान विद्या किस प्रकार वेदों की ही देन है? विमान विद्या में निष्णात रहे हमारे पूर्वजों का उद्देश्य सर्वत्र वैदिक संस्कृति के माध्यम से मानवता को संस्कारित और अनुशासित रखना था। ऐसे में विश्व के विभिन्न स्थानों पर जाकर अपनी सभ्यता का वहां विकास करना और व्यापार आदि के माध्यम से आर्थिक समृद्घि प्राप्त करना हमारा उद्देश्य रहा। पर यहां पर यह बात ध्यान देने की है कि हमारा उद्देश्य किसी देश के अपने आर्थिक व्यापार को या ढांचे को नष्ट करना कदापि नहीं था। हमने जहां-जहां जाकर अपनी बस्तियां बसायीं वहां-वहां अपनी उन्नत जीवन शैली का भी प्रचार-प्रसार किया। फिलोस्ट्रेटन्स में एक मिस्रवासी का कहना है कि-”उसने अपने पिता से सुना था कि भारतीय लोग सबसे बुद्घिमान होते हैं और इथोपियन्स ने जो कि एक भारतीय उपनिवेश के वासी थे-उसे बुद्घिमत्ता एवं अपने पूर्वजों की परम्पराओं एवं तौर-तरीकों को सुरक्षित रखा और अपने प्राचीन मूल के प्रति आभार प्रकट किया।”
हमें संपूर्ण संसार के लोगों के एक ही परिवार के सदस्य होने के विषय में सोचते समय यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि हम सब मूल रूप में एक ही पिता की संतानें हैं अर्थात ईश्वर की संतानें हैं। उसने अलग-अलग देशों में अलग-अलग रक्त वाले और अलग-अलग जातियों वाले लोगों का बीज नहीं बिखेरा। ईश्वर ने सम्पूर्ण भूमंडल पर एक ही मानवजाति का निर्माण किया, और मानवता को उसका धर्म घोषित किया। ईश्वर मानव सृष्टि करते समय यदि मानव बीज को सर्वत्र बिखेरता तो यह उसकी बुद्घिमत्ता का परिचायक नहीं होता। ऐसा करना सृष्टि नियमों के विपरीत है-उसने सुरक्षा आदि के दृष्टिकोण से एक ही स्थान पर मानव का निर्माण किया और एक ही स्थान पर रखकर उन्हें एक ज्ञान, एक भाषा आदि दिये। जब आर्य लोग संसार के कोने-कोने में फैले तो वह हर स्थान पर अपनी परम्पराएं और अपनी भाषा आदि को लेकर गये। यही कारण है कि सम्पूर्ण संसार में मानव जाति की विभिन्न भाषाएं और विभिन्न परम्पराएं आज भी अपने किसी मूलस्रोत की ओर संकेत करती है। विकास की दौड़ में चाहे कोई अंतिम देश खड़ा हो, चाहे उस अंतिम देश का अंतिम व्यक्ति खड़ा हो-पर सभी आदि संस्कृति के एक ही आकर्षण केन्द्र से बंधे होने का संकेत करते हैं-यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे सौर परिवार के सभी सदस्य अपने सूर्य का चक्र लगाते हैं और उससे आकर्षण में बंधे रहते हैं। सृष्टि विज्ञान का नियम यदि हर जगह लागू होता है तो उसका फैलाव या विस्तार भी उसी से बंधा हुआ माना जाना चाहिए।
हम सब पृथ्वीवासी वास्तव में भारतीय संस्कृति के सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। यह अलग बात है कि दूरतम स्थित देशों या व्यक्तियों पर इस सूर्य का प्रकाश कम पहुंच रहा है और उनकी परिक्रमा की गति भी धीमी है-पर इसका अर्थ यह भी तो नहीं कि वह संस्कृति के मूल चेतना केन्द्र से कट गया है। गति उसमें भी है और वह भी हमारा ही एक अंग है-हमें यह स्वीकार करना चाहिए। सारी समस्या को इस प्रकार देखने व समझने से समाधान मिलना निश्चित है।
पर्शिया
प्रो. मैक्समूलर की मान्यता रही है कि पारसी लोग उत्तर भारत से आये हुए लोग ही थे। प्रो. हीरेन का मानना है कि ”वास्तव में ‘जिंद’ शब्द संस्कृत से आया है जो मनुस्मृति में अध्याय 10 के श्लोक संख्या 43-45 में मिलता है, जिससे पता चलता है कि पारसी लोग भारतीय क्षत्रिय जाति के वंशज हैं।”
पारसी लोगों ने ‘सबके साथ मिलकर चलने और सबका सम्मान करने’ या सबकी परम्पराओं और प्रथाओं का सम्मान करने का अपना भारतीय संस्कार सदियों और युगों के बीत जाने के पश्चात भी बचाकर और संभालकर रखा है। उनका यह संस्कार उन्हें भारतीय संस्कारों के साथ जोड़ता है और हमें इस बात के लिए प्रेरित करता है कि उन लोगों को भी भारतीय वंश परम्परा से ही माना जाना चाहिए। कुछ लोग विभिन्न देशों के निवासियों की किसी भिन्न देश के या महाद्वीप के लोगों से तुलना करते समय उन लोगों के सिर की बनावट, नाक की बनावट या अन्य अंगों की बनावट का आसरा लेते हैं-हमारा मानना है कि इसे अधिक युक्तियुक्त नहीं माना जाना चाहिए। इसके स्थान पर लोगों की धार्मिक, सामाजिक परम्पराओं पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि उनमें परस्पर कितना साम्य है और वे किस सीमा तक परस्पर समन्वित हैं? जरथुस्त्र धर्म के संबंध में मि.होंग लिखते हैं-”जब मैं इस धर्म की तुलना ब्राह्मण धर्म से करता हूं तो मुझे इन दोनों धर्मों एवं इनकी प्रथाओं में बहुत ही निकटता दिखायी पड़ती है। ब्राह्मण व पारसी धर्म के देवताओं के नामों, वीरों की गाथाएं, बलिदानों की घटनाएं, घरेलू रीति-रिवाज एवं प्रथाओं, सृष्टि रचना संबंधी विचारों का वेदों एवं ‘जिन्द अवेस्ता’ के आधार पर तुलनात्मक अध्ययन करने पर इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि पारसी धर्म का मूल ब्राह्मण धर्म ही है। पारसी धर्म में इस बात के बहुत से संदर्भ उपस्थित हैं कि पारसी धर्म प्रारम्भिक काल में ब्राह्मण धर्म के विकृत रूप के विरूद्घ संघर्ष का परिणाम है।”
पारसी लोगों ने ब्राह्मण धर्म के रीति रिवाजों को अपनाये रखकर अपनी मूल वैदिक संस्कृति का संरक्षण करके सराहनीय कार्य किया है। ‘जेन्द अवेस्ता’ में भी ऐसे संकेत हमें मिलते हैं जिनसे भारतीय परम्पराओं का सटीक पता चलता है। पारसियों के धर्म गुरू जुरथुस्त्र ने भी भारतीय ज्ञान-विज्ञान के अनुकूल अपने उपदेश दिये और अपने को भारतीयता के अनुकूल सिद्घ करने के भी स्पष्ट संकेत दिये।
क्रमश:

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