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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से विश्वगुरू के रूप में भारत

विश्वगुरू के रूप में भारत-38

विकास और विनाश के इस खेल को भारत अपने देवासुर संग्राम की कहानियों के माध्यम से स्मरण रखता है और उसे इसीलिए बार-बार दोहराता है अर्थात ध्यान करता है कि यदि कहीं थोड़ी सी भी चूक हो गयी या हमने प्रमादपूर्ण शिथिलता का प्रदर्शन किया तो महाविनाश हो जाएगा। यही कारण है कि भारत अत्यंत विषम परिस्थितियों में ही युद्घ का निर्णय लेता है। यह देश युद्घ के लिए ऐसे ही तैयार नहीं हो जाता है, यह देश विकास चाहता है और उस विकास के लिए नीति मार्ग को सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए, धर्म की भावना को बलवती करने के लिए तथा मर्यादा को बनाये रखने के लिए भारत विश्व में सहृदयी मित्र खोजता है। यह गुप्त संधि करके शत्रुओं को नष्ट करके संपूर्ण मानवता को युद्घ की आग में झोंकने की रणनीति को सर्वथा त्याज्य मानता है।

ऐसे मर्यादित, नीतिवान, धर्मशील और सहृदयी भारत ने विश्व का नेतृत्व करते हुए प्राचीनकाल में अपना विश्व साम्राज्य स्थापित किया था। वह विश्व साम्राज्य स्वाभाविक रूप से स्थापित किया गया विश्वसाम्राज्य था, उसमें किसी का विनाश करने का या किसी को मिटाने का संकल्प कदापि नहीं था। उसमें सहृदयता थी और सबको विकास व नीति के मार्ग पर लेकर चलने की उत्कृष्ट भावना थी। अपने इस सपने को साकार करने के लिए भारत ने महाभारत युद्घ के पश्चात भी अपने ज्ञान विज्ञान को सहेजकर रखने का गंभीर प्रयास किया। यद्यपि ‘महाभारत’ युद्घ के कारण भारत को बहुत भारी क्षति उठानी पड़ी थी। मि. विलसन लिखते हैं-”यह कथन नहीं है कि हिंदुओं ने इतिहास की रचना नहीं की है। दक्षिण का सारा साहित्य स्थानीय हिंदू लेखकों के द्वारा लिखित इतिहास से परिपूर्ण है। मि. स्टर्लिंग ने उड़ीसा में विभिन्न तिथिक्रम से वर्णित वृत्तांतों की खोज की है और ठीक इसी प्रकार कर्नल टॉड को राजस्थान में इसी प्रकार के प्रचुर प्रमाण प्राप्त हुए हैं।”
भारत के विश्व साम्राज्य के गौरवमयी अतीत की ओर संकेत करते हुए क्राउण्ट ब्जोर्न स्टेजेरना कहता है-”आर्यावत्र्त में न केवल हम ब्राह्मण धर्म का पालन करते हैं, अपितु भारत की सभ्यता का चलन भी देखते हैं जो कि शनै: शनै: पश्चिम के इथोपिया, मिस्र, फोनिमिया पूर्व में स्याम, चीन व जापान तथा दक्षिण में श्रीलंका, जावा, सुमात्रा, तक तथा उत्तर में ईरान, कालडिया, व कोलचिस तब फैला, जहां से यह ग्रीस व रोम आया। वहां से यह हाइपर बोरियंस तक फैला।”
ये साक्षी स्पष्ट करती हैं कि भारत का विश्व साम्राज्य दिग-दिगंत में था, और उसका उद्देश्य संसार को अपने अनुचित प्रभाव में लाकर उस पर बलात् अपना शासन थोपना नहीं था। इसके विपरीत भारत का लक्ष्य सर्वत्र मानवतावाद का प्रचार-प्रसार करना था। इस विषय में कर्नल अल्काट का कहना भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनका मानना है कि-”भाषा विज्ञान की तुलनात्मक विचारधारा से ज्ञात होता है कि अन्य भाषाओं का संस्कृत के साथ अध्ययन करने से यूरोप में आर्य सभ्यता के प्रवजन के चिह्न स्थापित होते हैं। हमारे पास समान रूप से ऐसे साधन उपलब्ध हैं जिनसे आर्य विचारों के पश्चिम की ओर प्रवाह का पता चलता है। बेबीलोन, मिस्र, ग्रीस रोम व उत्तरी यूरोप के दार्शनिक एवं धार्मिक विचारों में आर्य विचारधारा की स्पष्ट छाप है। हमें साथ ही साथ पायथागोरस, सुकरात, प्लेटो, अरस्तू, होकर, जेनो, हेसियात, सिसरो, सूपबोला, आदि की शिक्षाओं का, वेद व्यास कपिल, गौतम पतंजलि, कणाद, जैमिनि, नारद, पाणिनि, मरीचि व अन्य के साथ तुलनात्मक अध्ययन करने पर इनके विचारों की समानता देखकर आश्चर्य होगा। हमें यूरोप के नूतन दर्शन के स्रोत पूर्व के प्राचीन दर्शन से प्राप्त होंगे। मानव का मस्तिष्क विभिन्न युगों के विचारों में समन्वय स्थापित करने में सक्षम है। यह ऐसे ही है जैसे मानवता हर काल में शिक्षक, शासक, योद्घा व कलाकारों को आवश्यकतानुसार उत्पन्न कर सकती है, परंतु आर्यों के ऋषि मुनियों, संतों के विचार बाद के ग्रीक एवं रोमन विचारकों से इतने मिलते हैं मानो बाद के दार्शनिक उन आर्य दार्शनिकों की प्रतिच्छाया मात्र ही हैं। इससे हमारे इस विचार को बल मिलता है, कि मिस्र के लोग भारत से आये थे। प्राय: सभी प्राचीन दार्शनिक यहूदी मूसा से लेकर ग्रीस प्लेटो तक किस्त में शिक्षा ग्रहण करने आते थे।”
उपरोक्त उद्घरण ये यह तथ्य भली प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि संसार में बेबीलोनिया, रोम, मिस्र आदि की संस्कृतियों की कहानी काल्पनिक है। वास्तव में इन देशों में प्राचीनकाल में भारत की संस्कृति का ही डंका बज रहा था। महाभारत युद्घ के पश्चात भारत के दुर्दिनों का आगमन हुआ तो भारत का इन देशों से संबंध या तो शिथिल पड़ गया या फिर पूर्णत: उनसे सम्बन्ध विच्छेद हो गया। जैसे एक नदी जब अपना प्रवाह परिवर्तित करती है तो वह जहां पहले से बह रही थी-वहां भी अपने बहने के अवशेष बड़े-बड़े गड्ढों के रूप में छोड़ जाती है। वैसे ही भारत की संस्कृति से छूटे हुए अवशेष रूपी गड्ढे हमें बेबीलोनिया, मिस्र आदि देशों की संस्कृतियों के रूप में दिखायी देते हैं। उन गड्ढों को आप नदी का प्रवाह नहीं मान सकते। हां, इन गड्ढों से आप यह जानकारी अवश्य ले सकते हैं कि कभी यहां से होकर नदी प्रवाहमान रही है। ऐसी सोच से हमें वास्तविकता का ज्ञान होगा, और हम इन देशों के अतीत का सही-सही आंकलन कर पाएंगे।
एक समय आया जब मजहबी आंधियां भयंकर युद्घ और जनसंहार करती बेबीलोनिया, मिस्र आदि देशों में आयीं तो ये देश अपनी संस्कृतियों की रक्षा नहीं कर पाए। जबकि भारत उस समय भी अपने आपको बचाने में सफल रहा। इसका अभिप्राय है कि भारत की संस्कृति का दुर्ग इन देशों की संस्कृति की अपेक्षा कहीं अधिक सुदृढ़ था। इसका कारण यही था कि भारत विश्व संस्कृति का गढ़ था। वह मूल नदी थी। जबकि ये देश विश्व संस्कृति के न तो गढ़ से और न ही ये मूल नदी थे।
अब हम यहां पर कुछ ऐसे देशों के विषय में विचार करेंगे जो प्राचीन संस्कृति रखने वाले देश माने जाते हैं। पर वास्तव में वे अपने प्राचीनकाल में भारत की संस्कृति से ही शासित -अनुशासित होते रहे हैं। आज उन्हें चाहे जिस रूप में व्याख्यायित किया जा रहा हो-पर सच यही है कि उनका अतीत भारत के कारण गौरवपूर्ण रहा है।
मिस्र एवं इथोपिया
मिस्र एक प्राचीन देश माना जाता है। उसकी संस्कृति भी स्वाभाविक रूप से प्राचीन मानी जाती है। इसके विषय में कर्नल अल्काट का कहना है कि-”यह बात हम अधिकार पूर्वक कह सकते हैं कि सात या आठ हजार वर्ष पूर्व भारत से बड़ी संख्या में लोग अपनी कला एवं सभ्यता को लेकर उस देश में आये जिसे हम आजकल मिस्र के नाम से जानते हैं।”
मिस्र के निवासी भी अपने विषय में ऐसा ही मानते हैं कि वे यहां के मूल निवासी न होकर कहीं बाहर से आये। जिसका संकेत वह भारत की ओर ही करते हैं। विद्वानों की मान्यता है कि भारत के लोग स्वेज को पार करके नील नदी के किनारे अपने नये स्थान पर जाकर बसे।
‘इंडिया इन ग्रीस’ के लेखक की मान्यता है कि-”सिंधु नदी के मुंहाने पर समुद्र की यात्रा करने वाले लोग रहते थे, जो बहुत क्रियाशील, सब कार्यों में प्रवीण एवं साहसी थे, और जब आवश्यकता होती थी संघर्ष कर सकने में सक्षम थे। इसी के बलबूते पर वे पंजाब जैसे स्थान से चलकर ग्रीस में स्थापित हो गये थे।
क्रमश:

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