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इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू

इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू (अध्याय – 08)

भारत की स्थापत्य कला पर नेहरू जी के विचार (अध्याय – 08)

  • डॉ राकेश कुमार आर्य

हिंदुस्तान की खोज के चौथे अध्याय में नेहरू जी सिंध घाटी की सभ्यता से अपनी बात को आरंभ करते हैं। वह कहते हैं कि-

” हिंदुस्तान के गुजरे हुए जमाने की सबसे पहली तस्वीर हमें सिंध घाटी की सभ्यता में मिलती है। इसके पुरअसर खंडहर सिंध में मोहनजोदड़ो में और पश्चिमी पंजाब में हड़प्पा में मिले हैं। यहां पर जो खुदाई हुई है, उन्होंने प्राचीन इतिहास के बारे में हमारे ख्यालों में इंकलाब पैदा कर दिया है।”

नेहरू जी ने रामायण को एक महाकाव्य से अधिक कुछ नहीं माना। यदि उनकी दृष्टि और दृष्टिकोण में व्यापकता होती तो वह सिंधु सभ्यता से पीछे रामायण की सच्चाई को समझने का भी प्रयास करते। तभी उनकी “हिंदुस्तान की खोज” पूरी होती।

रामायण के बालकांड के तीसरे सर्ग में महर्षि वाल्मीकि जी ने अयोध्या की भव्यता का वर्णन किया है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण की इस साक्षी से पता चलता है कि अयोध्या का निर्माण मनु महाराज ने करवाया था। वह संसार के पहले राजा थे। महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं कि-

कोसलो नाम मुदितः स्फीतो जनपदो महान।
निविष्टः सरयूतीरे प्रभूत धनधान्यवान् ॥

सरयू नदी के तट पर कौशल नामक एक देश था, जो संतुष्ट जनों से पूर्ण समृद्धि संपन्न और धन-धान्य से पूर्ण था। वाल्मीकि जी से ही हमको पता चलता है कि अयोध्यापुरी 12 योजन अर्थात 60 मील लंबी और तीन योजन अर्थात 15 मील चौड़ी थी। उसमें बड़ी सुंदर लंबी चौड़ी सड़कें बनी हुई थीं। यह राजधानी एक विस्तृत राजपथ से सुशोभित हुआ करती थी। इस राजपथ से अनेक सड़कें निकला करती थीं। सड़कों पर प्रतिदिन जल छिड़का जाता था और प्रतिदिन ही फूल बिछाए जाते थे।

अयोध्या पुरी नाम की यह नगरी तोरण द्वारों और सुंदर चौड़े बाजारों से सजी संवरी रहती थी। सब प्रकार के यंत्र इस नगरी में उपलब्ध होते थे और नाना कलाविशारद शिल्पी यहां पर निवास किया करते थे। उसमें सूत, मागध और बंदीजन भी रहते थे। वह नगरी अत्यंत शोभायमान और दैदीप्यमान थी। उसमें ऊंची-ऊंची अटारियों वाले भवन थे। जिन पर ध्वज और पताकाएं फहरा रही थीं। नगर की सुरक्षा के लिए परकोटे की दीवारों पर सैकड़ों तोपें चढ़ी हुई थीं। इस राजधानी में दुर्गम किले थे। कुओं में जल गन्ने के रस के समान भरा रहता था। अच्छे अस्त्र-शस्त्र यंत्र उपलब्ध थे। इतनी अच्छी सुरक्षा व्यवस्था होने के कारण कोई भी शत्रु इस नगरी की ओर देखने का साहस नहीं कर पाता था। ढूंढने से भी कहीं पर कोई निर्धन व्यक्ति दिखाई नहीं देता था।

बारोन डीलबर्ग ने द्वारका की वास्तुकला से प्रभावित होकर उसे आश्चर्यजनक नगर का नाम दिया था और कहा था कि-

“उस देश अर्थात भारत के निवासियों ने खोदकर बनाई जाने वाली गुफा के निर्माण एवं उसे अलंकृत करने में अन्य देशवासियों की अपेक्षा बहुत उच्च पूर्ण एवं श्रेष्ठ दक्षता प्रदर्शित की है।”

हिंदू वास्तु कला की ग्रीक और मिस्र की वास्तु कला से तुलना करते हुए प्रोफेसर हिरेन ने लिखा है कि-

“स्तंभों पर की गई सजावट की सुंदरता अन्य बातों के अलावा उन पर बनाई गई मूर्तियां जो परियों जैसी लगती हैं. के बनाने में तो हिंदुओं ने इन दोनों राष्ट्रों ग्रीक एवं मिस्र को मात दे दी है।”

विदेशी विद्वानों के द्वारा भारत के बारे में इस प्रकार का वर्णन बताता है कि भारत सिंधु सभ्यता से भी पूर्व से वास्तु-कला और स्थापत्य कला के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व करता आ रहा है।

अतः हमें केवल सिंधु सभ्यता या किन्हीं मोहनजोदड़ो या हड़प्पा में नहीं अटकना या भटकना चाहिए, अपितु इसके पीछे जाकर खड़ी भारत की भव्यता को खोजने का प्रयास करना चाहिए।

नेहरू जी का चिंतन सिंधु सभ्यता या किसी मोहनजोदड़ो या हड़प्पा में अटक-भटक गया। वह भारत को खोजते-खोजते भारत की जड़ों तक नहीं जा सके। जहां से उन जैसे इतिहास लेखकों ने दुनिया को खोजना आरंभ किया, वहीं से नेहरू जी ने भारत की जड़ों को खोजने का प्रयास करना आरंभ कर दिया।

यही कारण रहा कि नेहरू जी ने अपनी हिंदुस्तान की खोज के पृष्ठ 80 पर सर जॉन मार्शल को उद्धृत करते हुए लिखा कि-

“मोहनजोदड़ो और हड़प्पा इन दोनों जगहों में एक चीज जो साफ तौर पर जाहिर होती है और इसके बारे में कोई धोखा नहीं हो सकता, वह यह है कि इन दोनों जगह में जो सभ्यता हमारे सामने आई है, वह कोई इब्तादाई सभ्यता नहीं है, बल्कि ऐसी है जो उस समय युगों पुरानी पड़ चुकी थी। (इसका अभिप्राय यह नहीं कि नेहरू जी इस लेखक को उद्धृत कर यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि भारत इससे भी पहले युगों अर्थात लाखों करोड़ों वर्ष पहले से स्थापत्य कला और वास्तुकला के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व कर रहा था? जो व्यक्ति मानव सभ्यता को केवल 10,000 वर्ष में ही देखता हो, उसके दृष्टिकोण को बड़े सहजता से समझा जा सकता है कि ऐसा कहकर वह क्या संकेत दे रहे हैं?) हिंदुस्तान की जमीन पर मजबूत हो चुकी थी और उसके पीछे आदमी का कई हजार पुराना कारनामा था। इस तरह अब से मानना पड़ेगा कि ईरान, मेसोपोटामिया और मिस्र की तरह हिंदुस्तान उन सब से प्रमुख देशों में से एक है, जहां सभ्यता का आरंभ और विकास हुआ था। (यहां पर नेहरू जी को स्पष्ट करना चाहिए था कि हिंदुस्तान ही वह देश है जिससे ईरान, मेसोपोटामिया और मिख जैसी सभ्यताओं का विकास हुआ। नेहरू जी इस भ्रम में दिखाई देते हैं कि जैसे मानव सभ्यता ने अलग-अलग क्षेत्रों में अपना विकास करना आरंभकिया और कालांतर में कबीलों में विभक्त होकर ये सभ्यताएं एक दूसरे के खून की प्यासी हो गईं।) वह आगे कहते हैं कि पंजाब और सिंघ में, अगर हम हिंदुस्तान के और दूसरे हिस्सों में न भी मानें, एक बहुत तरक्कीयाफ्ता और अद्भुत रूप से आपस में मिलती जलती हुई सभ्यता का प्रचार था। जी उसी जमाने की मेसोपोटामिया और मिस्र की सभ्यताओं से जुदा होते हुए भी कुछ बातों में उनसे ज्यादा तरक्की पर थी।”

ऐसा नहीं है कि नेहरू जी प्राचीन भारत की उन्नति, प्रगति और समृद्धि से परिचित नहीं थे। वह भारत की उन्नति, प्रगति और समृद्धि का उल्लेख भी बड़े गौरव के साथ करते हैं। समस्या केवल एक है कि वह भारत का सर्वाधिक प्राचीन राष्ट्र के रूप में आकलन करने में चूक कर जाते हैं। मार्शल को उद्धृत करते हुए वह लिखते हैं कि इस सिंधु घाटी की सभ्यता का समकालीन मेसोपोटामिया और मिस्र की सभ्यता से कोई मुकाबला नहीं था।

“इस तरह कुछ खास खास बातें ये हैं कि इस जमाने में रुई का कपड़ा बनाने के काम में इस्तेमाल सिर्फ हिंदुस्तान में होता था और पश्चिमी दुनिया में 2,000 या 3,000 साल बाद तक यह नहीं फैल सका। इसके अलावा मिस्र, मेसोपोटामिया या पश्चिमी एशिया में कहीं भी हमें वैसे अच्छे बने हुए हम्माम या कुशादा घर नहीं मिलते, जैसे कि मोहनजोदड़ो के शहरी अपने इस्तेमाल में लाते थे। उन मुल्कों में देवताओं के शानदार मंदिरों और राजाओं के लिए महलों और मकबरों के बनाने का ज्यादा ध्यान दिया जाता था और धन खर्च किया जाता था। लेकिन जान पड़ता है कि जनता को मिट्टी की छोटी झोपड़ियों से संतोष करना पड़ता था। सिंधु घाटी में इससे उल्टी ही तस्वीर दिखाई देती है और अच्छी से अच्छी इमारतें भी मिलती हैं। जिनमें नागरिक रहा करते थे।”

नेहरू जी -“सिंध घाटी की सभ्यता और आज के हिंदुस्तान के बीच की बहुत सी कड़ियां गायब हैं और ऐसे जमाने गुजरे हैं कि जिनके बारे में हमारी जानकारी नहीं के बराबर है”- कहकर यह स्पष्ट कर देते हैं कि मानवीय सभ्यता का शुभारंभ या आदि बिंदु सिंधु घाटी ही है। इसके पश्चात भी हमारी भारतीय सभ्यता कहां-कहां से गुजरी है, इसके भी अनेक पन्ने नेहरू जी की दृष्टि से ओझल रहते हुए दिखाई देते हैं। जबकि आधुनिक शोध ये स्पष्ट कर रहे हैं कि भारत की वैदिक सभ्यता सनातन स्वरूप में सतत प्रवाहमान रही है। सिंधु घाटी की सभ्यता इसका एक पड़ाव है। इस पड़ाव के पश्चात की भारतीय सनातन सभ्यता की सरिता हमारे लिए कभी भी ओझल नहीं हो सकती। हम सनातन की संतानें हैं। सनातन ही हमारा धर्म है। सनातन ही हमारा उपास्य देव है और सनातन ही हमारा परम लक्ष्य है। सनातन की आराधना हमारी राष्ट्र की आराधना है। हमारी परंपरा की साधना है इस ओर ध्यान देना हम सब का राष्ट्रीय कर्तव्य है। नेहरू जी निश्चित रूप से इस ओर ध्यान नहीं दे पाए।
क्रमशः

( आलोक – डॉक्टर राकेश कुमार आर्य के द्वारा 82 पुस्तकें लिखी व प्रकाशित की जा चुकी हैं। उक्त पुस्तक के प्रथम *संस्करण – 2025 का प्रकाशन *अक्षय प्रकाशन दिल्ली – 110052 मो० न० 9818 452269 से हुआ है।
* यदि आप उपरोक्त पुस्तक के माध्यम से पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा भारत के इतिहास के विकृतिकरण में दिए गए योगदान की सच्चाई जानना चाहते हैं तो आप हमसे 99 11 16 99 17, 892061 3273 पर संपर्क कर उपरोक्त पुस्तक को मंगवा सकते हैं । उपरोक्त पुस्तक का मूल्य 360 रुपए है। परंतु आपके लिए डाक खर्च सहित ₹300 में भेजी जाएगी । – निवेदक : अजय कुमार आर्य कार्यालय प्रबंधक )

 

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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