आक्रमणकारियों ने जिन स्थलों के नाम बदले, उनके वास्तविक नाम रखे जाने का अभियान चलना चाहिए

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अश्विनी उपाध्याय

हम आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं लेकिन हमारे प्राचीन ऐतिहासिक सांस्कृतिक धार्मिक स्थल आज भी क्रूर विदेशी आक्रमणकारियों, उनके नौकरों और उनके परिवार के सदस्यों के नाम पर हैं। आक्रमणकारियों ने न केवल सामान्य स्थानों का नाम बदला बल्कि जानबूझकर हमारे प्राचीन ऐतिहासिक सांस्कृतिक धार्मिक स्थलों का नाम भी बदल दिया और स्वतंत्रता के 75 वर्षों के बाद भी उनका जारी रहना भारत की संप्रभुता और नागरिकों के गरिमायुक्त जीवन के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और संस्कृति के अधिकार के खिलाफ है लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों ने आक्रमणकारियों के बर्बर कृत्य को ठीक करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

भगवान श्रीकृष्ण के आशीर्वाद और अपने अथक परिश्रम से पांडवों ने खांडवप्रस्थ को इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) बनाया था लेकिन दिल्ली में युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, कुंती, द्रौपदी और अभिमन्यु के नाम पर सड़क, वार्ड, गाँव या विधानसभा क्षेत्र नहीं है लेकिन बर्बर विदेशी आक्रांताओं के नाम पर सड़क, वार्ड, गाँव और विधानसभा क्षेत्र है जो हमारी संप्रभुता ही नहीं बल्कि अनुच्छेद 21, 25, 29 के अंतर्गत प्रदत्त गरिमायुक्त जीवन के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और संस्कृति के अधिकार के भी खिलाफ है।

ऐतिहासिक ‘अजातशत्रु नगर’ का नाम बर्बर “बेगू” ने अपने नाम पर रख लिया और आज भी वह ‘बेगूसराय’ कहलाता है। ‘नालंदा विहार’ का नाम लुटेरे ‘शरीफुद्दीन अहमद’ ने अपने नाम पर रख लिया और आज भी उसे ‘बिहार शरीफ’ कहते हैं। सांस्कृतिक शहर ‘द्वार बंग’ को क्रूर ‘दरभंग खान’ ने अपने नाम पर रख लिया और अब उसे ‘दरभंगा’ कहते हैं। धार्मिक शहर ‘हरिपुर’ को ‘हाजी शम्सुद्दीन शाह’ ने अपने नाम पर रखा लिया और आज भी वह ‘हाजीपुर’ कहलाता है। ‘सिंहजानी’ का नाम ‘जमाल बाबा’ ने अपने नाम पर रख लिया और अब वह जमालपुर कहलाता है’। वैदिक शहर ‘विदेहपुर’ का नाम बर्बर मुजफ्फर खान ने अपने नाम पर रख लिया और अब वह ‘मुजफ्फरपुर’ कहलाता है। इसी तरह ऐतिहासिक शहर ‘कर्णावती’ का नाम अहमद शाह ने अपने नाम पर रख लिया और वह आज भी ‘अहमदाबाद’ कहलाता है।

विनाशकारी युद्ध को टालने के लिए भगवान कृष्ण ने प्रस्ताव दिया था कि यदि कौरव 5 गाँव [इंद्रप्रस्थ (दिल्ली), स्वर्णप्रस्थ (सोनीपत), पानप्रस्थ (पानीपत), व्याघ्रप्रस्थ (बागपत) और तिलप्रस्थ (फरीदाबाद)] देते हैं तो पांडव और अधिक मांग नहीं करेंगे। ‘तिलप्रस्थ’ का नाम क्रूर आक्रमणकारी ‘शेख फरीद’ ने अपने नाम पर रख लिया और वह आज भी फरीदाबाद कहलाता है। जहांगीर ने अपनी आत्मकथा ‘जहांगीरनामा’ में लिखा है कि क्रूर शेख फरीद ने किस प्रकार मंदिरों को नष्ट कर दिया था और हजारों हिंदुओं का धर्मांतरण किया था लेकिन पूर्व सरकारों ने फरीदाबाद का नाम बदलने के लिए कुछ नहीं किया।

ऐतिहासिक शहर ‘भृगनापुर’ का नाम बर्बर शेख बुरहान-उद-दीन ने अपने नाम पर रख लिया और अब उसे ‘बुरहानपुर’ कहते हैं। धार्मिक शहर ‘नर्मदा पुरम’ का नाम क्रूर होशंग शाह ने अपने नाम पर रख लिया था और अब उसे ‘होशंगाबाद’ कहते हैं। क्रूर होशंग शाह ने सैंकड़ों घुड़सवारों, हाथी सवारों और विशाल सेना के साथ ‘भृगनापुर’ पर हमला किया था और युद्ध के बाद हजारों हिंदू महिलाओं ने बलात्कार से बचने के लिए अपनी जान दे दी थी। शाजापुर का नाम शाहजहां के नाम पर पड़ा। अहमद निजाम शाह ने युद्ध जीतने के बाद अंबिकापुर का नाम अहमद नगर कर दिया। सैंकड़ों हिंदू मंदिरों को नष्ट करने वाले क्रूर मुहम्मद बिन तुगलक ने देवगिरि का नाम बदलकर दौलताबाद कर दिया था।

धार्मिक शहर धाराशिव का नाम उस्मान अली खान ने अपने नाम पर रख लिया और अब उसे उस्मानाबाद कहते हैं। यहां यह बताना जरूरी है कि विद्रोह के डर से निजाम ने रजाकारों (अर्धसैनिक) को हर संभव तरीके से हिंदू विद्रोह दबाने का निर्देश दिया था और फिर रजाकारों ने हिंदुओं का जातीय नरसंहार शुरू कर दिया। रजाकार गाँव-गाँव जाकर अपहरण और बलात्कार करते थे। उन्होंने लड़कियों को नग्न घुमाया और नृत्य करने के लिए मजबूर किया था। पुरुषों की हत्या करने के बाद हजारों हिंदू महिलाओं से बलात्कार किया गया था और आतंक से बचने के लिए बहुत से लोग कुओं में कूद गए और इस तरह भाग्यनगर (हैदराबाद) एक मुस्लिम बहुल शहर बन गया।

प्राचीन शहर “मोकलहर” को बाबा फरीद ने अपने नाम पर रख लिया और आज भी उसे फरीदकोट कहते हैं। महाभारत कालीन शहर ‘विराट’ को क्रूर होशियार खान ने अपने नाम पर रख लिया और वह होशियारपुर कहलाता है। करीमनगर का नाम क्रूर सैयद करीमुद्दीन के नाम पर है। महबूबनगर का नाम लुटेरे महबूब अली खान के नाम पर है। निजामाबाद का नाम हैदराबाद के निजाम के नाम पर रखा गया था जबकि यह राजा इंद्रदत्त द्वारा स्थापित इंदूर था। अलीपुर का नाम गद्दार मीर जाफर अली के नाम पर है जिसने प्लासी के युद्ध में अंग्रजों की मदद किया था। बंगाल में आज भी ‘मीर जाफ़र’ शब्द विश्वासघात का पर्याय माना जाता है। माँ दुर्गा के 51 शक्ति पीठों में से एक प्रमुख शक्तिपीठ ‘किरीतेश्वरी’ को बर्बर मुर्शिद खान ने तोड़ा था और अपने नाम पर उस पवित्र स्थान का नाम मुर्शिदाबाद रख दिया था।

नजफ खान ने रामगढ़ को अलीगढ़ बना दिया। अंबिकानगर बाद में अमरोहा बन गया और आर्यमगढ़ अब आजमगढ़ कहलाता है। जसनौल अब बाराबंकी कहलाता है। महाभारत कालीन ‘पांचाल’ को फर्रुख ने अपने नाम पर फर्रुखाबाद बना दिया। इब्राहिम शाह ने भिटौरा को फतेहपुर बना दिया। गाजी-उद-दीन ने गजप्रस्थ को गाजियाबाद बना दिया। गाजीपुर का नाम सैय्यद मसूद गाजी के नाम पर है जो क्रूरता का प्रतीक है। जमदग्नि पुरम को जौना खान ने अपने नाम पर जौनपुर रख दिया। प्रसिद्ध विंध्याचल शक्तिपीठ को लुटेरे मिर्जा ने मिर्जापुर बना दिया और रामगंगा नगर को मुराद ने मुरादाबाद बना दिया।

लक्ष्मी नगर को लुटेरे मुजफ्फर खान ने अपने नाम पर मुजफ्फरनगर बना दिया और गोमती नगर को शाहजहाँ ने अपने नाम पर शाहजहाँपुर बना दिया। इसी तरह लखनऊ में अमीनाबाद, आलमबाग, हुसैनाबाद, खुर्रमनगर, मौलवीगंज, अकबरी गेट जैसे कई वार्ड हैं। कानपुर में नायबगंज, फजलगंज; आगरा में शाहगंज, सिकंदरा, ताजगंज, फतेहाबाद; गाजियाबाद में सादिकपुर, साहिबाबाद, सहनी खुर्द; प्रयागराज में अहमद रोड, मुजफ्फर रोड; बरेली में अब्दुल्लापुर, आजमपुर, आलमपुर, अहमदपुर; अलीगढ़ में नौरंगाबाद, वाजिदपुर, मसूद नगर, सलेमपुर; मुजफ्फरनगर में आलमगीरपुर, अलीपुर, मुस्तफाबाद, नसरुल्लापुर, सैदपुर; अमृतसर में हुसैनपुर, मुस्तफाबाद; राजस्थान में मिर्जा रोड, जिन्ना रोड; मध्य प्रदेश में हबीबगंज, जहांगीराबाद हैं। इस प्रकार के गांव, वार्ड, कस्बों और शहरों की संख्या लगभग 1000 है लेकिन पूर्व सरकार ने उनका नाम बदलने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

भारत का संविधान भारतीय संप्रदाय, भारतीय भाषा, भारतीय रीति-रिवाज, भारतीय परंपरा, भारतीय इतिहास, भारतीय ज्ञान विज्ञान और भारतीय धार्मिक स्थलों की रक्षा करने और उनका प्रचार प्रसार करने का निर्देश देता है न कि लुटेरे बलात्कारी आक्रांताओं की निशानी के संरक्षण का।

आक्रमणकारियों ने जानबूझकर प्राचीन ऐतिहासिक सांस्कृतिक धार्मिक स्थलों का नाम बदल दिया था और उनकी निरंतरता हमारी संप्रभुता के साथ साथ अनुच्छेद 21, 25, 29 के तहत मिले गरिमायुक्त जीवन के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और संस्कृति के अधिकार के खिलाफ है इसलिए प्राचीन, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक शहरों के वास्तविक नाम का पता लगाने के लिए एक “पुनःनामकरण आयोग” बनाने का निर्देश दें।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं और भारत के पीआईएल मैन के रूप में जाने जाते हैं)

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