शिशु स्वत: ही धार्मिक, मत बना तू बेईमान

बिखरे मोती-भाग 200
गतांक से आगे….
केकैयी ने अपना स्वार्थ सिद्घि के लिए भगवान राम को वनवास दिलाया और अपने पुत्र भरत को अयोध्या का राज दिलाया। इतना ही नहीं, अपने पति दशरथ की प्राणघातिनी का आरोप भी उस पर लगता है। यह उसकी नकारात्मक सोच और स्वार्थ-सिद्घि की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है? यह चरित्र का अवमूल्यन नहीं तो और क्या है? यह आत्मा का हनन नहीं तो और क्या है? रामचरित मानस के इस पात्र की सभी कवि और लेखकों ने इसीलिए घोर निंदा की है। जबकि परमार्थ हृदय की विशालता उदारता तथा सकारात्मक सोच (Positive Thinking) का परिचायक है, जिसका जन्म सत्य अर्थात सत्याचरण से, प्रेम अर्थात हृदय (चित्त) की वह वृत्ति जिसमें किसी के प्रति विशिष्ट अनुराग के साथ-साथ त्याग और समर्पण के भाव का समावेश हो उसे प्रेम कहते हैं। करूणा अर्थात दूसरों के दु:खों को देखकर दु:खी होना और यथाशक्ति उनकी मदद करना करूणा कहलाती है। सारांश यह है सत्य प्रेम और करूणा का विस्तार ही परमार्थ कहलाता है। परमार्थी व्यक्ति की दृष्टि अपने तक सीमित नहीं होती, अपितु जीवमात्र का कल्याण करना उसका स्वभाव होता है। जैसा कि महात्मा बुद्घ, ईसामसीह, गुरूनानक, देव दयानंद इत्यादि।
स्वार्थपरता का मार्ग आसुरी संपत्ति का मार्ग है, जो मनुष्य को घोर नरक में भी धकेल सकता है, जबकि परमार्थ का मार्ग-दैवी संपदा का मार्ग है, जो स्वर्ग का ‘नेशनल हाइवे’ है, जिसके जीवन आवागमन के क्रम से छूट जाता है, केेवल्य को प्राप्त होता है। अत: मनुष्य को जीवन पर्यन्त स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ पर अधिक ध्यान देना चाहिए, तभी आत्म कल्याण संभव है। इसके लिए भगवान राम का जीवन अनुकरणीय है, अभिनंदनीय है, वंदनीय है।
शिशु स्वत: ही धार्मिक,
मत बना तू बेईमान।
सीख गया अपराध तो,
करेगा नित परेशान ।। 1134 ।।
व्याख्या :-
प्राय: बच्चों का बालमन बड़ा सरल और सुकोमल होता है। उनके हृदय में सदभावों की अधिकता होने के कारण वे दिव्य गुणों (ईश्वरीय गुणों) से अर्थात सत्य, प्रेम, करूणा, प्रसन्नता (आनंद/मस्ती) ऋजुता (सरलता अर्थात मन का छल कपट और कुटिलता से रहित होना) उदारता, श्रद्घा, समर्पण, निष्ठा, सौहार्द, सहचर्य इत्यादि सदगुणों से स्वत: ही सज्जित होते हैं, अलंकृत होते हैं, भगवान के करीब होते हैं। इसीलिए बच्चों को भगवान का रूप कहा जाता है। परमपिता परमात्मा की इस विलक्षण और प्राकृतिक देन को विकृत करने की भयंकर भूल हम करते हैं, हमारा समाज करता है, जैसे कोई परिजन (माता-पिता, भाई-बहन) घर पर हो और उनका फोन आ रहा हो तो धीरे से बच्चे को बुलाकर उसके कान में कहते हैं बेटा इनसे कह दो-वे (अमुक व्यक्ति) घर पर नहीं हैं। यह झूठ बोलना किसने सिखाया? हम सिखाते हैं, हमारा समाज सिखाता है। खाद्य पदार्थों में मिलावट कर उन्हें बेचकर अधिक पैसे कमाने का क्रूर कार्य सिखाकर उन्हें निर्दयी और बेईमान बनने का प्रशिक्षण (Training) भी तो हम ही देते हैं। पैर छूकर हत्या, लूट, छल कपट, द्वेष और जेब काटने के कुकृत्य भी तो हम ही सिखाते हैं।
शिशु स्वत: ही धार्मिक, मत बना तू बेईमान

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