हाथ जोड़ झुकाये मस्तक वन्दना हम कर रहे

गुरू ने शिष्य से एक दांव छुपाकर रखा-यह उनका ‘यथायोग्य वत्र्ताव’ था। उन्होंने उसे सब कुछ सिखाने का प्रयास किया-यह उनका ‘प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार किया गया आचरण’ था। 
भारत का राष्ट्रीय अभिवादन ‘नमस्ते’ है। नमस्ते की सही मुद्रा है -व्यक्ति के दोनों हाथों का छाती के सामने आकर दूसरे व्यक्ति के लिए जुट जाना और उसी समय व्यक्ति के मस्तक का झुक जाना। ‘नमस्ते’ की यह मुद्रा जहां ‘नमस्ते’ करने वाले की शालीनता और विनम्रता को झलकाती है-वहीं उसके अहंकारशून्य व्यवहार की भी झलक देती है। ‘नमस्ते’ करने वाले व्यक्ति की इस अवस्था का अगले व्यक्ति पर बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। जैसे ‘नमस्ते’ करने वाला झुकता है वैसे ही ‘नमस्ते’ लेने वाला भी झुकता है, हाथों को एक साथ लाता है और मस्तक झुकाकर विनम्रता के साथ दूसरे की ‘नमस्ते’ का उत्तर देता है।
दिखने में तो नमस्ते के आदान-प्रदान की यह क्रिया-प्रक्रिया पूर्णत: एक औपचारिकता भर सी लगती है, लेकिन इस प्रकार ‘नमस्ते’ के आदान-प्रदान की इस क्रिया-प्रक्रिया पर यदि थोड़ा गंभीरता से चिंतन-मंथन किया जाए तो इसके बड़े ही सार्थक प्रभाव मानव समाज के स्वास्थ्य पर पड़ते हैं।
जब दो व्यक्ति आमने-सामने आते हैं और इस प्रकार अभिवादन करते हैं तो उनके मध्य किसी प्रकार के अहंकार की दीवार का विनाश होता है। मस्तक झुकने का अभिप्राय है-अहंकार का विनाश करना, अहम् को मिटा देना। संसार के अधिकांश विवादों का कारण अहम् का प्रश्न ही होता है, जो दो लोगों से लेकर दो परिवारों, दो समुदायों और दो राष्ट्रों में आग लगा देता है। अत: कितनी पावन पवित्र परम्परा है ‘नमस्ते’ की कि अहम् का प्रश्न उत्पन्न ही नहीं होने देती। विश्व के अन्य देशों में अहम् के प्रश्नों को सुलझाने के चक्कर में लोगों के मनों में असंतोष और असहमति की आग लगी पड़ी है, तो इसका कारण ये ही है कि उनका नमस्ते या अभिवादन करने का ढंग अवैज्ञानिक और अतार्किक है। जबकि भारत में सर्वाधिक शांति व्याप्त होने का कारण केवल ये है कि हम ‘नमस्ते’ को वैज्ञानिक ढंग से करते और लेते हैं। हम अहंकारों की दीवारों को नष्ट करते हैं, मिटाते हैं, गिराते हैं, भूमिसात करते हैं। इसीलिए यज्ञोपरांत भी सभी लोग वैदिक अभिवादन ‘नमस्ते जी’ कहकर यज्ञ समाप्त करते हैं। इसका अभिप्राय है कि कोई भी व्यक्ति यज्ञ प्रसाद के रूप में अहंकारशून्यता और शालीनता को अपने साथ लेकर जाए। इन दोनों गुणों के आ जाने से व्यक्ति विनम्रता का पुजारी बनेगा। जिससे सर्वत्र शांति व्याप्त होगी। जिस भजन की पंक्तियों की हम इस पुस्तक में व्याख्या करने लगे हैं, उसकी भी यह अंतिम से पहली पंक्ति है कि ‘हाथ जोड़ झुकाये मस्तक वंदना हम कर रहे’-इसका अभिप्राय भी यही है कि हम अंतिम पंक्ति से पूर्व पूर्ण अहंकारशून्यता का प्रदर्शन करें।
यह जो हमारा मस्तक है ना- इसकी अपनी ही विशेषता है। जिस व्यक्ति से हम राग करते हैं, उसे देखकर यह मुखरित होता है और इसके मुखरित हो जाने से या खिल जाने से हमारे चेहरे की भावभंगिमा भी दूसरे को प्रभावित और आकर्षित करने वाली बन जाती है। जबकि जिस व्यक्ति से हमें घृणा होती है, उसे देखते ही हमारे मस्तक में बल पड़ जाते हैं, माथे पर सलवटें आ जाती हैं। जिसे लोग ‘माथा ठनक जाना’ भी कहते हैं। इस अवस्था से व्यक्ति के चेहरे की भावभंगिमा बिगड़ जाती है, उस पर घृणा और द्वेष के भाव स्पष्ट दिखायी देने लगते हैं।
कहने का अभिप्राय है कि हमारे ज्ञानी-ध्यानी पूर्वजों ने बड़ी गंभीरता से इस बात पर चिंतन-मनन किया था कि इस मस्तक को प्रसन्नतादायक बनाने का उचित ढंग क्या है? इसका उत्तर उन्होंने खोजा ‘नमस्ते’ को। उसके पश्चात ‘नमस्ते’ की भी एक क्रिया-प्रक्रिया को निश्चित किया गया। ‘नमस्ते’ का शाब्दिक अर्थ है-‘मैं तुम्हारा मान-सम्मान करता हूं। मैं तुम्हारे लिए इस प्रकार झुकता हूं।’ हमारे यहां किसी को शॉल ओढ़ाकर या फूलों के हार पहनाकर या किसी अन्य रीति से उसका सम्मान करने से व्यक्ति को उतना सम्मान मिलता सा अनुभव नहीं होता, जितना उसे ‘नमस्ते’ से होता है। यदि आपको इसमें कोई संदेह है तो करके भी देख सकते हैं। किसी आगंतुक को आप ‘नमस्ते’ तो करें नहीं और वैसे उसे फूलों से लाद दें तो देखना कि उसका माथा ठनक जाएगा। वह आपसे प्रसन्न नहीं होगा। उसे कहीं कोई बात चुभती रहेगी, जो उसे कहती रहेगी कि तेरे सम्मान में कहीं कोई न्यूनता रह गयी है।
‘नमस्ते’ का एक मनोवैज्ञानिक लाभ और भी है। संसार के हर व्यक्ति का अपना एक आभामंडल है। इस आभामंडल को आप अपने अनुकूल तभी कर सकते हैं जब आप उससे ‘नमस्ते’ करें। ‘नमस्ते’ करते ही दूसरा व्यक्ति पहले से कुछ हल्का होता है, और उसका आभामंडल यदि आपके प्रति किसी प्रकार की घृणा से भरा था तो वह भी ‘नमस्ते’ की सकारात्मक ऊर्जा से संचरित हो उठता है। उसमें से नकारात्मकता के सारे तत्व निकल जाते हैं और व्यक्ति आपके साथ कुछ आत्मीयता के साथ बात करने लगता है। क्रमश:

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