इस मंत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जैसे हमारा मुख सिर के अग्र भाग में होता है, वैसे ही यान का संचालन यंत्र अग्रभाग में ही रखना चाहिए। इसे तीन आवरण वाला अर्थात सुरक्षा, गति व संचालन की दृष्टि से त्रिवृत्त कहा गया है।
संचालन कक्ष में संचालकों के बैठने व बाह्य प्रदेशों को देखने का स्थान है। इसी में यान के पंख, यान की ध्वनि, यान के अंग, विमान का तनू भाग, पुच्छ भाग आदि सहित यान के पृथिवी पर ठहरने का भाग भी वर्णित किया गया है।
यजुर्वेद (12/5) में विमान की गतियों का वर्णन किया गया है। वहां के विषय में वेदश्रमीजी का वर्णन इस प्रकार है-”यज्ञ अपने विचक्रमण के कारण अग्नि संयोग से सूक्ष्म एवं व्यापक होता है। अर्थात आयतन में विस्तार को प्राप्त होता है। जब यज्ञाग्नि द्वारा किसी एक छोटे ही स्थान में आहूति शक्ति से धूम्र या गैस विस्तार को प्राप्त होगी तो वह ऊपर को ही गति करती है। यदि वह अपनी शक्ति से उसके बाह्य शरीर युक्त आवरण को ऊपर ले जाने में समर्थ हो जाती है तो वह उस शरीर को अथवा यान को ऊपर ले जाएगी। यदि उसकी उस शक्ति का पात इतस्तत: किसी मार्ग से एक दिशा या एक स्थान पर किया जाए तो वही अत्यंत शक्ति से वहां से निर्गमन करेगी। यदि उस निर्गमन के मध्य में चालक यंत्र का संयोग कर दिया जाए तो वह शक्ति उस यंत्र को चलाने में समर्थ हो जाती है।”
इस प्रकार विमान विद्या को भी हमारे ऋषियों ने यज्ञ विज्ञान के माध्यम से सीखा। वास्तव में यज्ञ का अपना पूरा एक विज्ञान है, इस विज्ञान को जितना गहराई से समझ लिया जाएगा उतना ही हम वैदिक संस्कृति को समझने में सफल हो सकते हैं। वैदिक सामाजिक व्यवस्था हो चाहे सांस्कृतिक और धार्मिक व्यवस्था हो सभी पर यज्ञ विज्ञान का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा है।
आज के वैज्ञानिकों ने मनुष्य के जीवन से यज्ञों को निकाल बाहर कर दिया है। यह काल ‘बॉर्नविटा में विटामिन’ ढूंढऩे का काल है। इसमें गाय के दूध की बात करना तो अपने आपको पिछड़ा सिद्घ करना है। अत: आज के मनुष्य ने वैदिक यज्ञ-विज्ञान की सरसता को ठोकर मारकर भौतिक विज्ञान की निर्ममता को गले लगा लिया है। जिसका फल यह आ रहा है कि मनुष्य मानवता के लिए अपेक्षित सरस ज्ञान से दूर होता जा रहा है। वेद मंत्रों की उपरोक्त व्याख्या से स्पष्ट हो जाता है कि हमारा आज का ज्ञान-विज्ञान कितना छोटे स्तर का है?
जल विज्ञान
जिस प्रकार विमान विज्ञान का वर्णन वेदों में है। उसी प्रकार जल-विज्ञान का वर्णन भी वेदों में है। यजुर्वेद (4/2) में जल को माता के समान (पवित्र) माना गया है। इसका कारण ये है कि जैसे माता हमारे मलों को साफ करती है। वैसे ही जल भी हमारे मलों को साफ करता है। जल से हमारे रोगों का, विकारों का और दोषों का निवारण होता है। जल से पेड़ पौधों की पत्तियों की भी शुद्घि होती है। आंधी- अंधड़ या पर्यावरण प्रदूषण से जो पत्तियां अशुद्घ हो जाती हैं-उन्हें वर्षा जल जब धोता है तो उनकी चमक देखते ही बनती है। अत: जल अंतरिक्ष, पृथ्वी और द्युलोक को भी शुद्घ करता है।
इससे स्पष्ट है कि जल का पृथ्वी, अंतरिक्ष एवं द्युलोक में निवास है। पृथ्वी के गर्भ में भी जल है और पृथ्वी के ऊपर भी जल है। अंतरिक्ष को समुद्र भी कहा गया है। इसका कारण ये है कि समुद्रादि से जलवाष्प बनकर अंतरिक्ष में रहता है और बादलों के माध्यम से वर्षा कर पृथ्वी की प्यास बुझाता है। वेद ने जल को पृथ्वी, अंतरिक्ष व द्युलोक -तीनों स्थानों पर होने की बात कहकर विज्ञान की बड़ी गहरी बात कह दी है।
आज का वैज्ञानिक जब भी किसी गृहादि की खोज करता है तो वह वहां पर पानी को पहले खोजता है, पर वेद तो पहले ही घोष कर रहा है कि पानी सर्वत्र है। वह द्युलोक तक उपलब्ध है। वेदश्रमीजी कहते हैं-”यदि पृथिवी पर समुद्र न हो तो पृथिवी के जल के सोते सब सूख जावें। यदि अंतरिक्ष का समुद्र न हो तो वृष्टि, मेघ और पृथिवी के सुंदर-सुंदर जल प्रपात, झरने नदी, तालाब वन जीवनदायिनी कृषि तथा हिमाच्छादित पर्वतों की हिम सभी साकार न रहकर कल्पना की ही चर्चाएं रह जावें। यदि द्युलोकस्थ समुद्र न हो व सूर्यमण्डल के चारों ओर अर्णव रूप समुद्र न हो तो कालचक्र का संवत्सरात्मक जीवन क्रम हमारी दर्शन सामथ्र्य एवं जीवन नष्ट हो जावे।”
यजुर्वेद (1/24/8) में बताया गया है कि सूर्य के चारों ओर वरूण तत्व की उपलब्धता है। वरूण को हमारे ऋषियों ने जल का स्वामी माना है। यह वरूण ही उद्रजन अर्थात हाइड्रोजन है। जिस हाइड्रोजन की खोज का श्रेय आज का विज्ञान या पश्चिमी वैज्ञानिक लेता है। वह भी वास्तव में हमारे ऋषियों को पूर्व से ज्ञात था। हमारी आंखें सूर्य की प्रतिनिधि हैं। जैसे ये जल (आंसू) से अपना संबंध रखती हैं, वैसे ही वरूण का संबंध सूर्य से है।
यजुर्वेद (33/32) में कहा गया है कि-‘हे सूर्य! जिस प्रकार पवित्र दर्शक शक्ति से रक्षण करते हुए तुम प्रजा का पालन करते हो उस पवित्र दर्शक शक्ति से हे वरूण! तुम हमारे अन्दर नेत्रशक्ति में अवस्थित होने से देख रहे हो, अर्थात दर्शन शक्ति वरूण के आधीन है।’
अब एक व्यावहारिक बात पर भी विचार कर लिया जाए। जब हमारी नेत्र ज्योति में कोई विकार आता है तो उन्हें सूर्य एवं जल से ही बल मिलता है। चिकित्सक लोग ऐसी स्थिति में हमारी आंखों के वरूण तत्व व सूर्य तत्व को ही सक्रिय करते हैं। सूर्योदय के समय आंखों को उगते सूर्य (जब कुछ सफेद सा होने लगे) को देखने की बात कही जाती है। यह एक यौगिक क्रिया भी है। जिसे सूर्य को पानी देकर लोग प्रात:काल में पूर्ण करते हैं। पर वास्तव में यह क्रिया आपके हाथों के लोटे से गिरते पानी में से सूर्य को देखने के लिए की जाती है, जिससे हमारी नेत्रज्योति बढ़ती है। इसी प्रकार प्रात:काल उठने पर हम सबसे पहले अपनी नेत्रों पर ही पानी के छींटे मारते हैं। इस प्रकार सूर्य व जल से ही आंखों की ज्योति का उपचार किया जाता है। इस पर वेदश्रमी जी एक और भी प्रयोग बताते हैं। वह कहते हैं कि एक चीनी की थाली में जो एक इंच या पौन इंच किनारे वाली हो उसमें वर्षा का पानी भर दें। उसमें एक गोल आईना 4 गुना का डाल दें। इस आइने के ऊपर आधा इंच पानी रहे। इसमें सूर्य बिम्ब का दर्शन 15 मिनट प्रतिदिन करें तो नेत्रों में जो दर्शन एवं वरूण शक्ति है, वह सक्रिय हो जाने से नेत्रदृष्टि सुधर जाती है। इस प्रयोग में भी सूर्य और जल को ही लिया गया है। दोनों एक साथ मिलकर हमारी नेत्रज्योति को सुधारते हैं।
आज का विज्ञान या वैज्ञानिक जल को जीवन कहता है। पर इसके उपरान्त भी वह यज्ञ को मानने को तैयार नहीं हैं। यज्ञ को समस्त विश्व की आयु माना जाना चाहिए। यजुर्वेद (1/4) में कहा गया है कि इसमें विविध प्रकार की रचना होती है और वह समस्त विश्व का पोषण करने वाला है।
यही कारण है कि हमारे ऋषियों ने याज्ञिक क्रिया के माध्यम से पूर्णत: शोधित और रोग निवारक जल तैयार करने में भी सफलता प्राप्त कर ली थी। ऋषिजन यज्ञ द्वारा अनेक प्रकार के जलों की वृष्टि करा लेते थे। इनमें रोगनाशक जल और बौद्घिक शक्ति जनक जलों की वृष्टि अथवा वर्षा भी सम्मिलित थी। जब हम यज्ञ पर जल से आचमन करते हैं तो उस समय हमें अपने चित्त की शान्ति तो मिलती ही है, साथ ही संसार में भी शान्ति स्थापित रहे-इसके लिए भी हम मानसिक रूप से प्रार्थना के लिए तैयार होते हैं और हमारी उस भावना का सकारात्मक प्रभाव संसार पर पड़ता है। यजुर्वेद (18/55) में ऐसी विधि दी गयी है-जिसे अपनाकर वर्षा कराने व रोकने दोनों का ज्ञान एक साथ ही प्राप्त किया जा सकता है।
क्रमश:

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet güncel giriş
holiganbet güncel
holiganbet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
klasbahis giriş
klasbahis giriş
holiganbet güncel
imajbet güncel
holiganbet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betyap güncel
betpark giriş
betpark giriş
betyap giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
casinolevant giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
matbet giriş
matbet giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
matbet giriş
matbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
holiganbet giriş