वेदमंत्र जो कुछ कहता है उसकी व्याख्या वेदश्रमीजी इस प्रकार करते हैं-”हे अग्नि! तुम वृष्टि से हमारी रक्षा करो। अर्थात वृष्टि करके हमारा पालन करो और अति वृष्टि को रोककर भी वृष्टि से हमारी रक्षा करो। इस प्रकार दोनों प्रकार की प्रक्रियाओं के प्रति इसकी संगति होती है। किस प्रकार रक्षा या पालन करें इसके लिए मंत्र बताता है कि द्युलोक, अंतरिक्षलोक मेघ और पृथिवी मेें जहां-जहां भी जलों की स्थिति है, उन-उन स्थानों से वृष्टि को कराना और जब-जब रोकने की आवश्यकता हो तब-तक वृष्टि जल रोकना चाहिए।”
वेद में औषजन (ऑक्सीजन) और उद्जन (हाइड्रोजन) को मित्र और वरूण की संज्ञा से पुकारा गया है और इन दोनों से प्रार्थना की गयी है कि तुम हमारी वृष्टि से रक्षा करो। वेद की बात साफ है कि ये मित्र और वरूण ही तो वर्षा का कारण हैं। वेद का यह गम्भीर विज्ञान है जिसे उसने एक मंत्र के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत कर दिया है। औषजन और हाइड्रोजन दोनों की उत्पत्ति यज्ञ की आहुति से भली प्रकार होती है। जिससे वृष्टि होती है और उस वृष्टि से जीवधारियों का कल्याण होता है। वेद ने कितनी बड़ी बात कह दी-औषजन और उद्जन को मित्र और वरूण की संज्ञा देकर। जिसे यदि गहराई से समझा जाए तो यही कहा जाएगा कि वेद विज्ञानसम्मत और सही बात कह रहा है।
हमारे ऋषियों ने वृष्टि कराने के लिए द्रव्यों की आहुति बनाने की खोज की। उनका वह कार्य भी कम महत्वपूर्ण और बुद्घिपरक नहीं है। उन्होंने ऐसे द्रव्यों की आहुतियों की खोज तो की ही साथ ही अपने उस ज्ञान को तर्कसंगत बनाकर अगली पीढिय़ों के लिए अपनी धरोहर के रूप में भी छोड़ा। इन लोगों ने आहुतियों का भी एक निश्चित अनुपात निर्धारित किया कि इतने अनुपात में ही आहुतियां दी जाएं?
”यज्ञ प्रारंभ होने पर इन यज्ञाहुतियों का सर्वप्रथम प्रभाव वायु पर ही पड़ता है। यज्ञस्थान की वायु में ऊष्मा की वृद्घि होती और उससे वायु नीचे से ऊपर की ओर गति करती है। वेदश्रमी जी का कथन है कि जब नीचे की वायु ऊपर जाती है तो नीचे के खाली स्थान में आसपास की वायु प्रवेश करने लगती है और वह वायु भी उष्ण होकर ऊपर की ओर गति करती है। वायु में उष्णता से प्रसारण क्रिया होती है। प्रसारण से घनत्व की न्यूनता तथा घनत्व की न्यूनता से अपेक्षाकृत भार की न्यूनता होने से वह वायु ऊपर गतिशील हो जाता है। इस कारण से यज्ञाग्नि की निरंतर क्रिया से पृथिवी से अंतरिक्ष तक वायु की ऊध्र्व, शीर्ष गति लम्ब रूप से प्रारंभ हो जाती है। यह गति प्रारंभ में कुछ दूर तक अनुमानत: एक घंटे में बीस किलोमीटर की गति से प्रारंभ होकर उत्तरोत्तर गति में न्यूनता प्राप्त करती जाती है। इस प्रकार अंतरिक्ष में जितनी ऊंचाई तक यह वायु नीचे से ऊपर की ओर गति करने लगती है। इस प्रकार यज्ञस्थान से वायु मंडल के एक विशाल तथा ऊध्र्व क्षेत्र में वायु का चक्र चलने लगता है, और यज्ञ में प्रयुक्त आहूत द्रव्यों को वाष्प, धूम्र एवं सूक्ष्म अंश युक्त परमाणुओं से वह स्थान पूरित हो जाता है तथा क्रमश: अपने समीप के क्षेत्र को भी प्रभावित कर विशाल होता जाता है।”
इस वैज्ञानिक क्रिया को अपनाने से अंतरिक्ष में बादल बनने लगते हैं। इसी को शुद्घ और वैदिक रीति से संपन्न करने पर वृष्टि हो जाती है। इस प्रकार के विज्ञान को समझने में पश्चिमी जगत के वैज्ञानिक आज भी असफल हैं। उनकी असफलता का प्रमाण यही है कि वे यज्ञ विज्ञान पर अब कुछ अनुसंधान तो कर रहे हैं पर उसे भारतीय परम्परा के अनुसार अपनाने से आज भी उचक रहे हैं। इस प्रकार यज्ञों से वृष्टि की यह क्रिया पूर्णत: वैज्ञानिक और तार्किक है।
अब जो लोग यज्ञाहुतियों से वर्षा के होने पर संदेह उठाते हैं और इसे पूर्णत: अवैज्ञानिक व अतार्किक प्रक्रिया कहकर अपनी भड़ास निकालते हैं-उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आजकल उद्योगों का प्रदूषण तथा मोटर वाहनों के तेलादि का प्रदूषण जब धुएं के रूप में जब ऊपर जाता है तो उसके विषय में हम सब यह मान रहे हैं कि इससे विश्व का वायुमण्डलीय ताप बढ़ रहा है जो अनावृष्टि की स्थिति उत्पन्न कर रहा है। इसे आजकल के वैज्ञानिक भूमंडलीय ताप (ग्लोबल वार्मिंग) कहकर लोगों को डरा रहे हैं। इन्हें तनिक सोचना चाहिए कि उद्योगों व मोटरों के धुएं आदि का प्रदूषण यदि बारिश रोक सकता है (जो कि पूर्णत: एक प्रकार का तामसिक यज्ञ ही है) तो वैदिक विधि से किया गया सात्विक यज्ञ वर्षा क्यों नहीं करा सकता? गलत कार्य की पुष्टि करने में तो आज के वैज्ञानिकों को कोई आपत्ति नहीं है, परंतु सही और वैज्ञानिक कार्य की पुष्टि करने में आपत्ति हो रही है। यद्यपि अब नासा इस विषय में गम्भीरता दिखा रहा है और वैदिक ढंग से की जाने वाली वृष्टि पर अपने गहन अनुसन्धान कर रहा है।
वेद ने तो ‘याज्ञिक पर्जन्य विज्ञान’ पर अपना आख्यान दिया है। यजुर्वेद (16/38) में तो एक अद्भुत घोषणा ही कर दी गयी है। वहां 8 प्रकार के ऐसे वैज्ञानिकों को गिनाया गया है जिनका संबंध याज्ञिक पर्जन्य विज्ञान से है। वहां बताया गया है कि कूप निर्माण में कुशल व्यक्तियों के लिए कूप्याय, जलगर्त निर्माण कार्य में कुशल व्यक्तियों के लिए अवट्याय, अवर्षणशील मेघों को कुशल व्यक्तियों के लिए ‘वीध्रयाय’ वर्षणशील मेघों के निर्माण में कुशल के लिए ‘मेघयाय’, वर्षा निमित्त विद्युत विज्ञान में कुशल वैज्ञानिक के लिए ‘विद्युत्याय’, वर्षा कराने में कुशल व्यक्ति के लिए ‘वष्र्याय’ और वर्षा को रोकने के कार्य में कुशल व्यक्ति के लिए ‘अवष्र्याय’ कहा जाता है।
यजुर्वेद के इस मंत्र को आज के विज्ञानियों को भी अपनाना चाहिए। वेद का यह मंत्र स्पष्ट करता है कि सृष्टि क्रम को पूर्णत: शुद्घ और पवित्र बनाये रखने के लिए हमारे ऋषि वैज्ञानिकों के पास कितना सटीक चिन्तन था। उन्होंने पर्यावरण संतुलन को बनाये रखने पर गहन अनुसन्धान किया और उसे व्यवहार में उत्तम बनवाये रखने का भी बड़ा कार्य किया।
जबकि आजकल हम देख रहे हैं कि मानव द्वारा स्वयं ही सारा सृष्टिक्रम विकृत कर दिया गया है और अब उसका उपाय खोजने के स्थान पर भूमण्डलीय तापवृद्घि के नाम पर वैज्ञानिकों द्वारा लोगों को डराया जा रहा है। आज धरती पर जलाभाव होता जा रहा है जो कि संपूर्ण मानवजाति के अस्तित्व के लिए संकट की ओर संकेत करता है। मानवता को ही नहीं अनेकों जीव-जन्तुओं को भी अस्तित्व का संकट घेर चुका है। कितनी ही प्रजातियां नष्ट हो गयीं हैं और कई नष्ट होने के कगार पर हैं। इस स्थिति से मानवता और प्राणिमात्र को बचाने के लिए भारत का वैदिक ज्ञान ही विश्व का मार्गदर्शन कर सकता है। भारत सरकार को चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र में इस संबंध में अपनी ओर से विशेष कार्य योजना प्रस्तुत करे और विश्व समुदाय को चाहिए कि वह इस कार्य योजना को क्रियान्वित करने में सच्चे मन से योगदान करे। इस समय किसी एक देश के लिए या किसी क्षेत्र विशेष के लोगों के लिए ही संकट नहीं है। संकट सारे भूमण्डलवासियों पर है। जिसमें सभी को अपना-अपना सहयोग करने की आवश्यकता है।
भारत जो कि याज्ञिक पर्जन्य विज्ञान का जनक रहा है-में भी स्थिति बड़ी दयनीय है। लोगों ने अपने काल से स्वयं ही शत्रुता मोल ले ली है और अनेकों गांवों, कस्बों व शहरों के तालाबों को मिट्टी भराव करके उन पर अवैध कब्जा कर लिया है या भवन बना लिये हैं। इससे भूगर्भीय जल संरक्षण की व्यवस्था बिगड़ी है। क्रमश:

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