वहां कहा गया है-”ओ३म् अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्।।” (ऋ. 1/1/1)
यहां पर अग्नि को सर्वत: हित करने में अग्रणी मानते हुए उसकी स्तुति करने की बात कही गयी है। इसका अभिप्राय है कि वेद का ऋषि अग्नि के गुणों से परिचित था। तभी तो उसने उसकी स्तुति का उपदेश दिया है। अग्नि तत्व को हमारे ऋषियों ने हमारे लिए इतना उपयोगी माना है कि उसे हमारे लिए सर्वत्र ही देखने का प्रयास किया है। हमारे शरीर में भी यदि अग्नि तत्व ना रहे तो जठराग्नि के मन्द पड़ते ही अपच से मृत्यु तक हो सकती है। सौर जगत में सूर्य अपनी अग्नि से हमारी सुरक्षा कर रहा है तो बादलों से बिजली की गडग़ड़ाहट उन्हें तोडक़र बरसने के लिए बाध्य करती है। इन सारी बातों को समझने में शेष विश्व को चाहे जितना समय लगा हो पर भारत ने तो इन्हें सृष्टि प्रारंभ में ही समझ लिया था।
हमारे भाषा शास्त्रियों ने ‘अग्नि’ का महत्व समझते हुए अपनी वर्णमाला का प्रथम अक्षर ‘अ’ भी अग्नि=अग्रणी=सबसे आगे, सर्वप्रथम के प्रतीक के रूप में ही लिया। ‘अ’ अखिलेश्वर परमपिता परमात्मा का भी प्रतीक है। उपरोक्त मंत्र की विवेचना से पता चलता है कि इस भूमंडल पर चल रहा ऋतुचक्र भी अग्नि के कारण ही चल रहा है। भू-तत्व में अग्नि की प्रधानता है और भूगर्भ में स्वर्ण, रत्न, तांबा, लौह आदि की निर्माण की प्रक्रिया भी अग्नि के सहयोग से ही पूर्ण होती है। पृथ्वी इन रत्नों को या पदार्थों को धारण करती है, इसलिए उसे ‘रत्नधातमम्’ कहा गया है। ऋतु विज्ञान का संचालक अग्नि है-इसलिए उसे ‘ऋत्विजम्’ भी कहा गया है।
इन शब्दों में हमें ‘अग्निविज्ञान’ छिपा हुआ दिखायी देता है। अग्नि की प्रधानता को स्वीकार करते हुए हमारे ऋषियों ने अग्नि को यज्ञों में भी प्रमुखता दी। हर संस्कार में अग्निदेव की पूजा का विधान किया गया। विज्ञान का मूल केन्द्र अग्नि को स्वीकार किया गया। यह सारा कुछ अनायास या संयोगवश या हमारे ऋषि वैज्ञानिकों की अज्ञानता के कारण नहीं हो गया था, अपितु इसके पीछे पूरा विज्ञान और तर्क छिपा हुआ था।
यज्ञाग्नि यज्ञ में आहूत पदार्थों को सूक्ष्म कर दूर देशों तक उनका विस्तार करती है और यज्ञरूप होकर प्रभु के संदेश को दिग-दिगंत तक फैलाती है। हम ईश्वर को भी यज्ञरूप मानते हैं, क्योंकि प्रभु की प्रत्येक रचना प्राणियों के हित में संलग्न है और नि:स्वार्थ भाव से उनकी सेवा कर रही है। वह अपने त्याग का त्याग कर रही है-इसलिए प्रभु स्वयं यज्ञरूप है। इस यज्ञ से सृष्टि में ऊर्जा का संभरण होता है और प्रकृति का कण-कण ऊर्जान्वित होकर कार्य करने लगता है।
यज्ञों द्वारा असमय में अंतरिक्ष में सोम भरा जा सकता है। जिससे मेघों का निर्माण होता है और वे यज्ञनिर्मित मेघ यथेच्छ स्थानों पर बरसकर प्राणियों का कल्याण करते हैं। यज्ञाग्नि अतिवृष्टि को रोकने में भी सहायक होती है। ये दोनों विज्ञान हमारे ऋषियों को ज्ञात थे। अनावृष्टि और अतिवृष्टि दोनों पर नियंत्रण होने से हमारे ऋषियों का ऋतु विज्ञान पर भी पूर्ण नियंत्रण था। इस क्षेत्र में अभी आज का विज्ञान केवल रेंग रहा है। अभी वह इस विषय का अपने आपको कुशल खिलाड़ी या विजेता सिद्घ नहीं कर सका है।
यह देखा जाता है कि जो भूमि मरूभूमि बनने लगती है-उसमें सामान्यतया बबूल के वृक्ष उत्पन्न होने लगते हैं। यह प्रकृति की स्वाभाविक प्रक्रिया है। वीरसेन वेदश्रमी जी कहते हैं कि मरूपन पृथ्वी का क्षयरोग है। इस क्षयरोग की चिकित्सा यज्ञ द्वारा हो सकती है। यदि नियत क्षेत्र में बबूल के वृक्ष लगाये जाएं और 5 वर्ष तक परीक्षण का अवसर प्राप्त हो तो इसमें सफलता प्राप्त की जा सकती है। वह कहते हैं कि यज्ञ द्वारा राष्ट्र की खनिज संपदा की भी वृद्घि हो सकती है। पृथ्विी और अंतरिक्ष व द्युलोक के पदार्थों का सूक्ष्म एवं बीजात्मक अंश विविध प्रकार की वनस्पतियों में भी केन्द्रित होता रहता है। इस प्रकार विविध तत्वों से प्रधान रूप से युक्त औषधि वनस्पतियों के यज्ञ के द्वारा उनके धूम के अंतरिक्ष एवं पृथ्वी में प्रसारित होने से उन-उन प्रकार की खानों में उसी प्रकार के खजिन द्रव्यों के सूक्ष्म अंश को स्थूल रूप में अपने केन्द्र के साथ संग्रहीत होने में सहायक होती है, और खनिज द्रव्यों में उन्हीं पदार्थों की वृद्घि होती रहती है।
अग्नि की सृष्टि में सर्वत्र पहुंच होने के उसे दूत कहा गया है। जो चीज आपके अन्य वाहन नहीं पहुंचा सकते, उसे लोक-लोक लोकान्तरों में अग्नि के माध्यम से पहुंचाने में हमें सहायता मिलती है। अग्नि पर शोध करने वाले हमारे ऋषियों ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि इसमें तरंगें भी होती हैं। साथ ही यह भी कि अग्नि ध्वनि का जनक, धारक व वाहक है। वाणियों का वक्ता और धारक है। अग्नि हव्य वाहन है। वह हवि को ले जाने का कार्य करता है। अग्नि परोक्ष का भी दर्शक है। अग्नि में पवमान=बहने का गुण है। जिससे अग्नि के माध्यम से अथवा उसके पवमान गुण के कारण अंतरिक्ष और द्युलोक से भी वार्तालाप किया जाना संभव है। अग्नि पर शोध करते-करते हमारे ऋषियों ने यह भी पता लगाया कि विद्युत की तरंगे अंतरिक्ष में चल रही हैं। अत: अग्नि हमारे जीवन की नाभि है। इस ब्रह्मण्ड की नाभि है। यही कारण है कि इसे हम यज्ञ करते समय यज्ञवेदी के मध्य में रखते हैं। इसका अभिप्राय है कि अग्नि यज्ञ की नाभि है। हमारे प्राचीन ऋषियों ने वेदज्ञान को आधार बनाकर अग्नि के रहस्य को समझा और उससे अनेकों प्रकार के यंत्रों का आविष्कार किया। इनमें स्वशक्ति चालित विमान भी सम्मिलित थे। अब हम विमान विज्ञान पर ही आते हैं।
विमान विज्ञान
विमान विद्या भी हमारे वेदों से ही ली गयी है। यजुर्वेद (18/52) में आया है कि-”हे अग्ने! इस यंत्रमय विमानरूपी शरीर में जिसमें आरूढ़ होकर हम अंतरिक्ष में जाना चाहते हैं-उसके यह जो उत्तर एवं दक्षिणभाग में दो सुदृढ़ पंख हैं, जो कि पतत्रिणौ-जिनके द्वारा इधर-उधर नीचे ऊपर गमन होता है और उन पंखों से उड्डयन की विघ्न बाधाओं का संरक्षण होता है। उनके आश्रय से हम उन उत्तम कर्ममय लोकों को प्राप्त हों, जहां पर कि पहले के ऋषि मेधावीजन विज्ञान के आश्रय से जा चुके हैं जैसा कि यत्र ऋषयोजग्यु: प्रथमजा: पुराणा: इन शब्दों से स्पष्ट है।”
इससे स्पष्ट है कि भारत की विमान विद्या सनातन है। वह वेदों में वर्णित होने से पूर्व की सृष्टियों में भी रही है और आने वाली सृष्टियों में भी यथावत रहेगी-ऐसा मानना चाहिए।
यजुर्वेद (12/4) में विमान के अन्य अंगों के नामों का वर्णन किया गया है। उस मंत्र की व्याख्या करते हुए वीरसेन वेदश्रमीजी कहते हैं-”गरूत्मान संज्ञक विमान शोभन पंख वाला है अत: उसकी सुपर्ण संज्ञा भी है। प्राचीन समय में सुपर्णचित याग एवं श्येनचिति याग द्वारा इसप्रकार के विमान बनाने का शिक्षण प्रदर्शन व कार्य किया जाता था। इन यागों द्वारा किस प्रकार उन यानों की इष्टकाओं-अंगरूप भागों का यन्त्रादि चयन करना, उनका परस्पर संयोग करना, यान का अगभाग कैसा और कैसे बनाना, पंख कैसे बनाना, अग्नि का स्थापन कहां होना आदि सब बातों का दिग्दर्शन कराया जाता था तथा उसको पृथ्वी मंडल के कक्ष में ही परिक्रमण कराते रहना, अन्य लोक लोकान्तर में भेजनादि कार्य यज्ञशाला रूपी बृहत्प्रयोगशाला से अथवा केन्द्रीय शाला में किये जाते थे। सुपर्णचित विमान लोक लोकान्तरों में गमन करने वाले होते हैं। अत: मंत्र में उनके द्वारा लोक लोकान्तर गमन का वर्णन है। परंतु श्येनचित यान छोटे होते हैं।”
क्रमश:

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