प्रार्थना सीढ़ी शिखर की, इसे करनी मत भूल

बिखरे मोती-भाग 205

गतांक से आगे….
सर्वदा याद रखो, मां-बाप के आंसू आपके हंसते-खेलते खुशहाल जीवन पर कभी भी आसमानी बिजली की तरह टूट पड़ेंगे, इसलिए जितना हो सके इन दो फरिश्तों (माता-पिता) का आशीर्वाद लीजिए, अभिशाप नहीं। यह अटल सत्य है कि मां-बाप के दिल से निकली हुई दुआएं कभी खाली नहीं जाती हैं। जब माता-पिता प्रसन्न होकर सच्चे दिल से आशीर्वाद देते हैं तो परमात्मा की रहमत (कृपा) के खजाने खुलते हैं। संसार में ऐसी संतान धन्य होती हैं अर्थात परम सौभाग्यशाली होती हंै-जिनके माता-पिता जीवित होते हैं और अपनी संतान की सेवा -सुश्रुषा और सत्कार्यों से प्रसन्न होकर ये चेतन देवता मुस्काते रहते हैं। सच पूछो, तो ऐसा घर घर नहीं, अपितु धरती का स्वर्ग होता है। इसलिए वेद ने ठीक ही कहा है :-
‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव’
प्रभु-प्रार्थना का महत्व 
प्रार्थना सीढ़ी शिखर की, 
इसे करनी मत भूल।
प्राप्त होय देवत्व को,
जीवन बनै अमूल ।। 1138।।
व्याख्या :-जब प्राप्तव्य को पुरूषार्थ से प्राप्त करना संभव न हो, तो उसे प्राप्त करने के लिए मनुष्य सुकोमल हृदय की भाव तरंगों से परमपिता परमात्मा से जो अनुनय-विनय करता है, उसे प्रार्थना कहते हैं। संसार में आज तक जितने भी महापुरूष हुए हैं उनमें से अधिकांशत: प्रभु-प्रार्थना से जुड़े रहे हैं-जैसे महात्मा गांधी जी प्रार्थना के संदर्भ में कहते थे- ”मैं भोजन के बिना रह सकता हूं, किंतु प्रार्थना के बिना नहीं रह सकता। प्रार्थना याचना नहीं, समर्पण है। समर्पण के उपरांत ही परमात्मा की अनेक अनुकम्पाएं बरसती हैं।”
प्रार्थना वह सीढ़ी (निसैनी) है जो मनुष्य को सफलता के शिखर पर पहुंचाती है। प्रार्थना आपके हृदय की भाव तरंगों को पवित्र, सुकोमल, और संवेदनशील बनाने का वह सशक्त माध्यम है जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है। यहां तक कि प्रार्थना आत्मा का भोजन है। प्रार्थना आत्मबल का मूल स्रोत है। सरल शब्दों में कहें तो, भोजन से शरीर को रस मिलता है जबकि प्रार्थना से आत्मा को रस मिलता है। मैं भोजन के बिना रह सकता हूं, किंतु प्रार्थना के बिना नहीं रह सकता। प्रार्थना याचना नहीं, समर्पण है। समर्पण के उपरांत ही परमात्मा की अनेक अनुकंपाएं अविरल बरसती हैं।”
समर्पण के संदर्भ में हृदय को स्पर्श करने वाला गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगौर का एक दृष्टांत देखिये-गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगौर की विश्वविख्यात रचना ‘गीतांजलि’ पर जब उन्हें विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार ‘नोबेल प्राइज’ मिला तो एक पत्रकार ने उनसे पूछा,-‘गुरूदेव! गीतांजलि की कौन सी पंक्ति आपको सबसे अधिक प्रिय लगती है?’ गुरूदेव ने उत्तर दिया:-
तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो,
मेरे करूणामय स्वामी।
इससे बड़ा समर्पण का दृष्टांत और क्या होगा? प्रार्थना मनुष्य में आध्यात्मिक विवेक, आध्यात्मिक ईमानदारी, चेतनता,  तथा आध्यात्मिक पवित्रता  का विकास करती है। व्यक्ति को सज्जन, निष्कपट, चरित्रवान बुद्घिमान और विचारवान  बनाती है। भाग्य को सौभाग्य बनाना है तो उसे दिव्य करो, इससे रूबरू होओ, उसका सिमरन करो।
क्रमश:

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