नाथ करूणा रूप करूणा आपकी सब पर रहे

गतांक से आगे….
अर्थात हे अर्जुन! शुभकर्म करने वालों का न तो यहां इस लोक में और न ही परलोक में कभी विनाश होता है। हे प्रिय बन्धु! कोई शुभकर्म करने वाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है, कारण कि ईश्वर की करूणा उसकी निरन्तर रक्षा करती है, वह करूणानिधि उसका सदा सहायक बना रहता है। संसार के जितने महापुरूष हुए हैं-उन पर ईश्वर की विशेष कृपा होने के कारण वे संसार के लिए विशेष उपकारी सिद्घ हुए। उन्होंने अपना कल्याण तो किया ही-साथ ही विश्व कल्याण के लिए भी समय निकालते रहे। वैसे इस भारतवर्ष में एक  समय ऐसा था-जब यहां का हर निवासी देव था, (तैंतीस करोड़) देवों की मान्यता को कुछ इस प्रकार देखा जाना चाहिए कि यहां की जनसंख्या ऐसे देवपुरूषों से ही बनी थी। हर व्यक्ति एक दूसरे के कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित करके चलता था। तब हम पर ईश्वर की

करूणा का साक्षात प्रभाव था और हम इस रहस्य को जानते थे कि जैसे ईश्वर की करूणा हम सबके लिए समान रूप से उपलब्ध है वैसे ही हमारी करूणा भी सबके लिए समान रूप से उपलब्ध हो। इस शीर्षक पंक्ति से हम उस ईश्वर से ऐसी ही करूणा की प्रार्थना कर रहे  हैं जो हम सबके कल्याण के लिए हमें उपलब्ध हो जाए। 

महर्षि दयानंद जी महाराज को 18 घंटे की समाधि का अभ्यास था। गुरू बिरजानंद जी ने उन्हें अठारह घंटे की इस समाधि के आनंद को छोडक़र संसार के कल्याण के लिए परोपकारी बनने की प्रेरणा दी। दयानंद तो दया के आनंद के स्रोत में डुबकी लगा रहे थे, इसलिए उन्हें संसार के परोपकार का मार्ग पकडऩे में तनिक भी संकोच नहीं हुआ और गुरू की प्रेरणा को ईश्वरीय प्रेरणा मानकर वह संसार के कल्याण के मार्ग पर चल निकले। उनकी करूणा ने परोपकार को ही मुक्ति के मार्ग की संज्ञा दी। 
स्वामीजी प्रयाग में गंगा तट पर पहुंचे। वहां एक वृद्घ सन्त पहले से ही रहते थे। जब स्वामी जी का उन सन्त महाराज से परिचय हुआ तो वे सन्त स्वामी जी को बच्चा कहकर सम्बोधित करने लगे। एक दिन वे सन्त स्वामीजी से बोले-”बच्चा! यदि आप पहले से ही निवृत्ति मार्ग पर स्थिर रहकर कार्य करते और परोपकार के झगड़े में न पड़ते तो आपकी इसी जन्म में मुक्ति हो जाती। अब तो आपको एक और जन्म लेना पड़ेगा। तब कहीं जाकर मुक्ति के अधिकारी बनोगे।” 
स्वामीजी ने सन्त महाराज के इस प्रश्न को बड़ी गंभीरता से सुना और फिर उसी गंभीरता से बोले-”महात्मन! अब मुझे अपनी मुक्ति का कुछ भी ध्यान नहीं है। जिन लाखों मनुष्यों की चिंताएं मेरे चित्त को चलायमान कर रही हैं उनकी मुक्ति हो जाए मुझे भले ही कई जन्म क्यों न धारण करने पड़ें, मैं परमपिता परमात्मा के पुत्रों को दु:ख के त्रास से, दीनदशा से और दुर्बल अवस्था से मुक्ति दिलाते हुए अपने आप ही मुक्त हो जाऊंगा।” 
करूणा जमी हुई बरफ को पिघला देती है, क्योंकि वह संवेदनशील होती है। वह संकीर्ण हृदय को विशाल कर देती है-क्योंकि वह सर्वमंगलकारी होती है। करूणा बंधे हुए हाथों को खोल देती है-क्योंकि वह आपके हाथों अनेकों का कल्याण कराना चाहती है। ऐसी करूणा ईश्वर की भक्ति से मिलती है और भक्ति का रोग सत्संग से चढऩा आरंभ होता है, इसलिए करूणा जैसे ईश्वरीय गुणों की प्राप्ति के लिए सत्संग अनिवार्य माना गया है। कवि की पंक्तियां कहती हैं :- 
‘बहे सत्संग की गंगा अरे मन चल नहा आयें।
घड़ी आधी घड़ी जीवन की चिन्ताएं मिटा आयें।।’
सत्संग की गंगा बह रही हो और मन उसमें नहाने का अभ्यासी बन जाए तो जीवन की चिन्ताएं तो मिटती ही हैं, साथ ही जगत की चिन्ताएं भी मिटती हैं। जब ईश्वर की करूणा का हम पर प्रकटन होने लगता है तो कोई भीतर से ही कहने लगता है :-
”सत्संग की गंगा बहती तू नहाता क्यों नहीं?
भाग्य तेरा सो रहा इसको जगाता क्यों नहीं?
देख कितने पतित जीवन धुलके सुंदर हो गये
लक्ष्य उनको अपने जीवन का बनाता क्यों नहीं?
तू तो अमृत पुत्र है भगवान का भेजा हुआ
समझकर कत्र्तव्य को बिगड़ी बनाता क्यों नहीं?”
करूणानिधि ईश्वर की करूणा की अनुभूति पाकर व्यक्ति को अपनी सीमाओं और कमियों का बोध होने लगता है। जैसे-जैसे हमें अपने इष्ट के गुणों का आधान अपने भीतर होता हुआ अनुभव होता है, वैसे-वैसे ही हम अपने अवगुणों की केंचुली को त्यागने के लिए तत्पर हो उठते हैं। इसीलिए हम उस दयानिधान से कह रहे हैं कि-”नाथ करूणा रूप करूणा आपकी सब पर रहे।” 
ईश्वरीय गुणों के विषय में अथर्ववेद का यह मंत्र दृष्टव्य है :-
अकामो धीरो अमृत: स्वयंभू रसेन तृप्तो न कुतश्चनोन:।
तमेव विद्वान न बिभाय मृदत्योरात्मानम् धीरमजरं युवानम्।
(अथ. 10.8.44)
क्रमश:

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