images (7)

मेगास्थनीज उद्धृत कालक्रम
सिकन्दर के समकालीन तथा कुछ बाद के ग्रीक लेखकों ने भारत विषय में कुछ लिखा था जिसमें मेगास्थनीज को उद्धृत किया गया था। उन उद्धरणों का संकलन कर जर्मनी के श्वानबेक ने १८४६ ई. में मेगास्थनीज की इण्डिका लिखी।
इसमें भारतीय गणना के अनुसार २ प्राचीन घटनाओं का काल दिया है-
(१) भारत सभी प्रकार के अन्न तथा खनिज में स्वावलम्बी था, अतः भारत ने पिछले १५,००० वर्षों में किसी पर आक्रमण नहीं किया (पारा ३८)।
इसका अर्थ था कि सिकन्दर तथा उसके बाद अंग्रेजों तक के सभी आक्रान्ताओं ने केवल लूट के लिए आक्रमण किया था। अन्य अर्थ है कि भारत ने सिकन्दर से १५,००० वर्ष पूर्व कोई बृहत् आक्रमण विदेश पर किया था। इस वर्णन के अनुसार भारत की सभ्यता (जिस पर आक्रमण किया उसकी भी) कम से कम सिकन्दर के १५,००० वर्ष से पूर्व से थी। भारत का इतना प्राचीन कालक्रम अंग्रेजों को सहन नहीं हुआ तथा श्वानबेक के कुछ समय बाद मैक्समूलर ने १५,००० से एक शून्य हटा कर १५०० ईपू में वैदिक सभ्यता का आरम्भ घोषित कर दिया। १५०० ईपू समय का अन्य कोई आधार आज तक नहीं मिला है। इसमें समस्या हुई कि ग्रीक लेखकों ने १५०० ईपू अर्थात् सिकन्दर से १२०० वर्ष पूर्व या हेरोडोटस से ९०० वर्ष पूर्व भारत में बाहर से किसी जाति द्वारा आकर वैदिक सभ्यता का आरम्भ करने का कोई उल्लेख नहीं मिला। उस तथाकथित वैदिक आर्यों के आक्रमण के विषय में ३००० ईपू से सिकन्दर तक ईरान, सुमेरिया, असीरिया में किसी ने अहीं सुना था। वेद तथा पुराणों में भी केवल भारत का ही विस्तार से वर्णन है। अतः १५०० ईपू में पश्चिमोत्तर से वैदिक आर्य आक्रमण के लिए व्यापक जालसाजी की आवश्यकता थी। इसके लिए सिन्ध के २ स्थानों पर १९२० में खुदाई की गयी। ये दोनों स्थान जनमेजय के नाग यज्ञ से सम्बन्धित थे। तक्षशिला (अपभ्रंश टकसाल) के नागवंशी राजाओं की पाण्डवों से पुरानी शत्रुता थी। पहले अर्जुन ने खाण्डवप्रस्थ से नागों को भगा कर उस पर अधिकार किया जहां युधिष्ठिर ने इन्द्रप्रस्थ बना कर नगर का निर्माण किया। उसके प्रतिशोध के लिए तक्षशिला शासक ने परीक्षित (३१०२-३०४२ ईपू तक राज्य) की हत्या कर दी। उसके २७ वर्ष बाद परीक्षित पुत्र जनमेजय ने नागों पर आक्रमण कर उनको पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। २ नगर पूरी तरह श्मशान हो गये जिनके नाम हुए-मोइन जो दरो (= मृतकों का स्थान), हड़प्पा (हड्डियों का ढेर)। जहां पहली बार जनमेजय ने नागों को पराजित किया, वहां गुरु गोविन्द सिंह ने राम मन्दिर बनवा कर उसका उल्लेख किया था। अतः इनके बारे में १७०० ई तक कोई भ्रम नहीं था। जनमेजय द्वारा २ नगरों में नर संहार होने पर भारत के ऋषियों ने उनको युद्ध बन्द कर प्रायश्चित करने के लिए कहा। उसके बाद पुरी में २७-११-३०१४ ईपू में जब सूर्य ग्रहण हुआ, तो जनमेजय ने ५ स्थानों पर भूमिदान किया, जिनके पट्टे मैसूर ऐण्टिकुअरी के जनवरी १९०० अंक में प्रकाशित हुए थे। इनमें २ दानभूमि आज भी उपलब्ध हैं-केदारनाथ शिव मन्दिर, शृङ्गेरी से ११ किलोमीटर दूर तुंगा तट पर राम मन्दिर। जनमेजय की २ राजधानियों-हस्तिनापुर तथा किष्किन्धा से ये दान पत्र दिये गये थे। इस तिथि तथा उस दिन सूर्य ग्रहण की जांच २००७ में अमेरिका के डलास में आयोजित सम्मेलन हुई थी (Astronomical Dating of Events & Select Vignettes from Indian History, Volume I, Edited and compiled by Kosla Vepa, Published by-Indic Studies Foundation, 948 Happy Valley Rd., Pleasanton, Ca 94566, USA)।
अंग्रेजी इतिहास लेखन विधि (Hitoriography) के अनुसार यथा सम्भव मूल साक्ष्य नष्ट कर नयी झूठी कहानी बनाई गयी। मोइन-जो-दरो तथा हड़प्पा को भारत के मूल निवासियों का स्थान बता कर उनका नाश पश्चिमोत्तर से आये आर्यों द्वारा विनाश बताया गया। वे आर्य पृथ्वी के ही किसी स्थान से आये थे या मंगल ग्रह से, इसका पता लगाने की अंग्रेजों या उनके दासों ने आज तक आवश्यकता नहीं समझी है। ९ खण्डों का पूरा प्राचीन भारत वेद भूमि थी यह भूल कर आज तक केवल सिन्धु घाटी सभ्यता पर ही शोध चल रहा है। उस शोध की विधि है कि भारत के वेद-पुराण आदि जितने शास्त्र हैं, उनको झूठा माना जाय। जो लिपि कभी नहीं थी उसके लेख को सत्य कहा जाय। मिट्टी के खिलौनों को लेख मान कर प्रायः २० प्रकार से पढ़ा जा चुका है। अभी उसमें नया संशोधन हुआ है कि सिन्धु के साथ सरस्वती नदी को भी जोड़ दिया है। उसमें भी कुरुक्षेत्र से कच्छ की पश्चिमी धारा का ही उल्लेख होता है, पूर्व वाहिनी सरस्वती का गंगा-यमुना के साथ प्रयाग में भी संगम होता था, इसका उल्लेख इस डर से नही होता है कि कही पूरे भारत को वैदिक सभ्यता का केन्द्र नहीं मान लें। इन लोगों ने आज तक अपनी भाषा देखने का कष्ट नहीं किया है। इन्द्र पूर्व के लोकपाल थे, अतः उनके वैदिक शब्द ओड़िशा तट, असम से वियतनाम तथा इण्डोनेसिया तक प्रचलित हैं। उनका हाथी इरावती नदी क्षेत्र (बर्मा, थाइलैण्ड) का था अतः उसे ऐरावत कहते थे। पर इरावती का अर्थ केवल पंजाब की रावी करते हैं, जो मुख्य नदी नही, सिन्धु की सहायक नदी है। उसे श्वेत कहा गया है तथा आज भी थाइलैण्ड के हाथियों को ही श्वेत कहते हैं। कृषि तथा शक्ति सम्बन्धित शब्द मैथिली में हैं। पुरुरवा का यज्ञ प्रयाग में हुआ था अतः शिव क्षेत्र काशी राज्य में शिव तथा यज्ञ सम्बन्धित ५० शब्द केवल भोजपुरी में हैं, जिसे ऋग्वेद में दिवोदास का भोज राज्य कहा गया है। २००१ में श्रीशैलम के वैदिक सम्मेलन में लोकों की माप का वर्णन करते हुए कह दिया था कि भारत वेदभूमि है। इस पर अंग्रेजी माध्यम के १०-१५ संस्कृत विद्वान् क्रुद्ध हो गये और कहा कि केवल उत्तर भारत वेद भूमि है, आन्ध्र प्रदेश में वहां के आर्यों ने वेद थोप दिया था। पर इसके समर्थन में ऋग्वेद का एक मन्त्र कहा जिसके ३ शब्दों का प्रयोग केवल तेलुगू में होता है। किसी भी संस्कृत विद्वान् ने उसका अर्थ समझने का कष्ट नहीं किया। वे शब्द समुद्र से सम्बन्धित थे जिनका प्रयोग हड़प्पा या कुरुक्षेत्र में नहीं हो सकता है।
हड़प्पा-मोइनजोदरो का काल बिना आधार के १५०० ईपू कह दिया जिससे मैक्समूलर की तिथि का आधार बनाया जा सके। इसके बाद सिकन्दर से १५,००० पूर्व के भारत द्वारा आक्रमण का उल्लेख नष्ट करने के लिए मैक्रिण्डल ने मेगास्थनीज की नयी इण्डिका १८८७ में लिखी। मूल प्रमाण नष्ट करने के अतिरिक्त इसका अन्य कोई उद्देश्य नहीं था। इसका हिन्दी अनुवाद १९१६ में बाबू अवधबिहारी शरण द्वारा हुआ जिसे आरा नागरी प्रचारिणी सभा ने प्रकाशित किया।
सिकन्दर द्वारा भारत में कोई विजय नहीं हुयी थी, अतः उसका कोई उल्लेख भारत में नहीं है। ग्रीस के मेगास्थनीज को पाटलिपुत्र में राजदूत बनाने का कोई कारण नहीं था। उसने पलिबोथ्रि के बारे में सुना था जो यमुना नदी के तट पर था और वह नदी उसके बाद गंगा में मिलती थी। दिल्ली में पाण्डवों के समय से सैन्य छावनी थी जिसे परिभद्र कहते थे, उसे पलिबोथ्रि कहा है। इसके अतिरिक्त कई निराधार कल्पनायें की हैं-हेरोडोटस तथा मेगास्थनीज के अनुसार भारत में चींटियों द्वारा सोने की खुदायी होती थी। मेगास्थनीज के अनुसार भारत में ४ नहीं ७ वर्ण थे, यहां की स्त्रियां ६ वर्ष की आयु में सन्तान को जन्म देती थी, कुछ जातियों के केवल एक ही आंख होती है। ऐसी कहानियां कहने वालों को इतिहास का पिता कहा गया है।
विदेश पर सबसे चर्चित आक्रमण कार्त्तिकेय द्वारा क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका) पर था। महाभारत (१२/१४/२१-२५, १६/२५) में इसे मेरु के पश्चिम कहा है। बृहत् संहिता(१४/२४) तथा रामायण (४/४३/२८) इसे उत्तर बताते हैं। यह उत्तर अमेरिका है जिसमें क्रौञ्च पर्वत (राकी पर्वत) तथा द्वीप दोनों उड़ते पक्षी के आकार के हैं। क्रौञ्चद्वीपे गिरिः क्रौञ्चस्तस्य नाम्ना निगद्यते (मत्स्य पुराण, १२३/३७) कार्त्तिकेय काल में पृथ्वी के उत्तर ध्रुव की दिशा अभिजित् नक्षत्र से दूर हट रही थी जिसे अभिजित् का पतन कहा गया है। तब इन्द्र ने कार्त्तिकेय से कहा कि वह ब्रह्मा से सलाह कर वर्ष आरम्भ का पुनः निर्धारण करें। उसके बाद अभिजित् के बदले धनिष्ठा नक्षत्र से वर्ष आरम्भ हुआ। उस समय (प्रायः १५,८०० ईपू) । यह सिकन्दर से प्रायः १५,४५० वर्ष पूर्व है, जिसे ग्रीक लेककों ने १५,००० वर्ष लिखा है। उस समय धनिष्ठा से वर्षा आरम्भ होती थी। यह एक कारण हो सकता है कि संवत्सर को वर्ष भी कहा गया। यह वेदाङ्ग ज्योतिष की पद्धति है और उस समय माघ मास से वर्ष आरम्भ की पद्धति चल रही है। उसके पहले भी माघ मास से वर्ष आरम्भ होता था, किन्तु अभिजित् नक्षत्र से।
अभिजित् स्पर्धमाना तु रोहिण्या अनुजा स्वसा।
इच्छन्ती ज्येष्ठतां देवी तपस्तप्तुं वनं गता॥८॥
तत्र मूढोऽस्मि भद्रं ते नक्षत्रं गगनाच्युतम्।
कालं त्विमं परं स्कन्द ब्रह्मणा सह चिन्तय॥९॥
धनिष्ठादिस्तदा कालो ब्रह्मणा परिकल्पितः।
रोहिणी ह्यभवत् पूर्वमेवं संख्या समाभवत्॥१०॥
(महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)
माघशुक्ल प्रपन्नस्य पौषकृष्ण समापिनः।
युगस्य पञ्चवर्षस्य कालज्ञानं प्रचक्षते॥५॥
स्वराक्रमेते सोमार्कौ यदा साकं सवासवौ।
स्यात्तदादि युगं माघः तपः शुक्लोऽयनं ह्युदक्॥६॥
प्रपद्येते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक्।
सार्पार्धे दक्षिणार्कस्तु माघश्रवणयोः सदा॥७॥
(ऋग् ज्योतिष, ३२, ५,६, याजुष ज्योतिष, ५-७)
कार्त्तिकेय ने ६ शक्ति-पीठ (सैन्य क्षेत्र) बनाये थे जिनको उनकी ६ माता कहते थे। इसी प्रकार बाद में शंकराचार्य तथा गोरखनाथ ने ४-४ पीठ बनाये। कार्त्तिकेय के पीठों के नाम और स्थान हैं-१. दुला-ओड़िशा तथा बंगाल, २. वर्षयन्ती-असम, ३. चुपुणीका-पंजाब, कश्मीर (चोपड़ा उपाधि), ४. मेघयन्ती-गुजरात राजस्थान-यहां मेघ कम हैं पर मेघानी, मेघवाल उपाधि बहुत हैं। ५. अभ्रयन्ती-महाराष्ट्र, आन्ध्र (अभ्यंकर), ६. नितत्नि (नीचे फैली लता)-तमिलनाडु, कर्णाटक। अतः ओड़िशा में कोणार्क के निकट बहुत से दुला देवी के मन्दिर हैं। दुलाल = दुला का लाल कार्त्तिकेय।
अत्र जुहोति अग्नये स्वाहा, कृत्तिकाभ्यः स्वाहा, अम्बायै स्वाहा, दुलायै स्वाहा, नितत्न्यै स्वाहा, अभ्रयन्त्यै स्वाहा, मेघयन्त्यै स्वाहा, चुपुणीकायै स्वाहेति। (तैत्तिरीय ब्राह्मण ३/१/४/१-९)
क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका) पर आक्रमण के लिए कार्त्तिकेय ने जल-स्थल सेना का गठन किया तथा पहले शक्ति (मिसाइल) से प्रहार कर क्रौञ्च पर्वत को विदीर्ण किया था। अतः उनको क्रौञ्च दारण कहते हैं। उनकी सेना जल-स्थल-वायु में चल सकती थी अतः उसे मयूर कहा गया। उसके संगठन के लिए संक्षिप्त लिपि (शॉर्ट हैण्ड) की आवश्यकता थी अतः कार्त्तिकेय ने ब्राह्मी लिपि के स्पर्श वर्गों के प्रथम ४ अक्षर समान कर तमिल लिपि बनायी। वैज्ञानिक लेखन के लिए पूर्ण गाथा लिपि चलती रही। इस क्रम में संस्कृत के २,००० धातुओं में ५० के अर्थ बदल गये। मयूर सेना के सैनिकों के वंशज आज भी प्रशान्त महासागर में माओरी नाम से फैले हुए हैं। भाषा विज्ञान का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि हवाई द्वीप से न्यूजीलैण्ड तथा आस्ट्रेलिया तक माओरी लोगों की एक ही भाषा है, यद्यपि बीच में १५,००० किलोमीटर समुद्र है। यह कार्त्तिकेय के सैन्य संगठन का जीवित प्रमाण है।
(२) बाक्कस आक्रमण-भारत की कालगणना के अनुसार सिकन्दर से ६४५१ वर्ष ३ मास पूर्व, अर्थात् ६७७७ ईपू जुलाई में डायोनिसस या बाक्कस का आक्रमण हुआ था। इस अवधि में भारतीय राजाओं की सिकन्दर आक्रमण (गुप्त काल आरम्भ) तक १५४ पीढ़ियों ने शासन किया। मेगास्थनीज ने आन्ध्र वंश के अन्तिम २ राजाओं, उनके सेनापति घटोत्कच (अनुवाद केश काटने वाला), उसके वंशजों चन्द्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय का उल्लेख किया है। ये सभी ६ व्यक्ति उससे १३०० वर्ष पूर्व का एक ही व्यक्ति चन्द्रगुप्त मौर्य नहीं हो सकता है। मेगास्थनीज के समय भारत में सूर्य तथा चन्द्र वंशों की पूर्ण वंशावली तथा कालक्रम उपलब्ध था, नहीं तो वह भारतीय लेख उद्धृत नहीं कर सकता था। विदेशी आक्रमण में सूर्य वंश के राजा बाहु मारे गये थे जिनको व्यसनी कहा गया है। इसमें भारत के हैहय और तालजंघ राजाओं ने आक्रमणकारियों की सहायता की। उसके बाद बाक्कस ने देवनिकाय पर्वत (वर्तमान सुलेमान पर्वत) क्षेत्र में १५ वर्ष राज्य किया। उसने यव की मदिरा का प्रचलन किया जिसे बाक्कस मद्य (Whisky) कहते थे।
वाग्भट का अष्टाङ्ग सङ्ग्रह (सूत्र स्थान ६/११६)-जगल पाचनो ग्राही रूक्षस्तद्वच मेदक। बक्कसो हृतसारत्वाद्विष्टम्भी दोषकोपन॥
इसके बाद राजा बाहु के पुत्र सगर ने और्व ऋषि की सहायता और शिक्षा से यवनों तथा अन्य आक्रमणकारियों को भगाया। यवनों का सिर मुंडाया, अरब से भगा कर ग्रीस भेज दिया। हेरोडोटस ने भी लिखा है कि यवनों के वहां जाने के बाद ग्रीस का नाम इयोनिया (यूनान) हो गया। उनके मूल स्थान अरब की चिकित्सा पद्धति को आज भी यूनानी कहते है। पह्लवों को श्मश्रुधारी बनवाया जो आजकल बकरदाढ़ी के नाम से सम्मानित है।
विष्णु पुराण(३/३)- ततो वृकस्य बाहुर्यो ऽसौ हैहय तालजङ्घादिभिः पराजितो ऽन्तर्वत्न्या महिष्या सह वनं प्रविवेश॥२६॥ तस्यौर्वो जातकर्मादि क्रिया निष्पाद्य सगर इति नाम चकार॥३६॥ पितृ राज्यापहरणादमर्षितो हैहय तालजङ्घादि वधाय प्रतिज्ञामकरोत्॥४०॥ प्रायशश्च हैहयास्तालजङ्घाञ्जघान॥४१॥ शक यवन काम्बोज पारद पह्लवाः हन्यमानाः तत् कुलगुरुं वसिष्ठं शरणं जग्मुः॥४२॥ यवनान् मुण्डित शिरसो ऽर्द्ध मुण्डिताञ्छकान् प्रलम्ब केशान् पारदान् पह्लवाञ् श्मश्रुधरान् निस्स्वाध्याय वषट्कारानेतानन्यांश्च क्षत्रियांश्चकार॥४७॥
हैहयों द्वारा विदेशी आक्रमणकारियों की सहायता मुख्य कारण था कि भारत की १४ जातियों ने उसके उनमूलन में परशुराम की सहायता की थी। इन जातियों को कामधेनु से उत्पन्न कहा गया है–(१) पह्लव-पारस, काञ्ची के पल्लव। पल्लव का अर्थ पत्ता है। व्यायाम करने से पत्ते के रेशों की तरह मांसपेशी दीखती है। अतः पह्लव का अर्थ मल्ल (पहलवान) है। (२) कम्बुज हुंकार से उत्पन्न हुए। कम्बुज के २ अर्थ हैं। कम्बु = शंख से कम्बुज या कम्बोडिया। कामभोज = स्वेच्छाचारी से पारस के पश्चिमोत्तर भाग के निवासी। (३) शक-मध्य एशिया तथा पूर्व यूरोप की बिखरी जातियां, कामधेनु के सकृद् भाग से (सकृद् = १ बार उत्पन्न, या शकृद् = मल द्वार), (४) यवन-योनि भाग से -कुर्द के दक्षिण अरब के। (५) शक-यवन के मिश्रण, (६) बर्बर-असभ्य, ब्रह्माण्ड पुराण (१/२//१६/४९) इसे भारत ने पश्चिमोत्तर में कहता है। मत्स्य पुराण (१२१/४५) भी इसे उधर की चक्षु (आमू दरिया-Oxus) किनारे कहता है। (७) लोम से म्लेच्छ, हारीत, किरात (असम के पूर्व, दक्षिण चीन), (८) खुर से खुरद या खुर्द-तुर्की का दक्षिण भाग। (९) पुलिन्द (पश्चिम भारत-मार्कण्डेय पुराण, ५४/४७), मेद, दारुण-सभी मुख से। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ३/२४/५९-६४, ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/२९/१९-२१, स्कन्द पुराण, ६/६६/५२-५३)।
राजा बाहु से सिकन्दर समय के गुप्तवंशी राजा चन्द्रगुप्त प्रथम तक १५४ भारतीय राजा होते हैं-महाभारत तक सूर्यवंश गणना, उसके बाद मगध राजाओं की गणना। बाहु के बाद सूर्यवंश की वंशावली महाभारत की २५ पीढ़ी बाद सिद्धार्थ बुद्ध तक उपलब्ध है। चन्द्र वंश की वंशावली महाभारत से ५ पीढ़ी पूर्व तक है, उसके पूर्व खण्डित या लुप्त है। महाभारत के बाद मगध मुख्य राज्य था।
बाहु पुत्र सगर से राम तक-३१ राजा
राम से महाभारत के बृहद्बल तक ३५ राजा
मगध में बार्हद्रथ वंश-२२ राज
प्रद्योत वंश- ५ राजा
शिशुनाग वंश-१० राजा
नन्द वंश -२ पीढ़ी (महापद्मनन्द ८८ वर्ष, उसके ८ पुत्र १२ वर्ष)
मौर्य वंश-१२ राजा
शुंग वंश -१० राजा
कण्व वंश- ४ राजा
आन्ध्र वंश -३१ राजा-२४ पीढ़ी
कुल योग १५४ पीढ़ी
(इसमें थोड़ा अन्तर हो सकता है। चन्द्र तथा सूर्य वंश की पीढ़ी गणना में अन्तर हो सकता है। केवल सूर्य वंश या मगध राजाओं में भी कुछ राजाओं के के बाद उनके पुत्र नहीं पौत्र ने राज्य किया, जैसे राजा सगर के बाद। एक ही पीढ़ी के कई राजाओं ने भी राज्य किया है, जैसे आन्ध्र वंश में।
एक अन्य उल्लेख है कि बाक्कस से सिकन्दर तक ६४५१ वर्ष ३ मास हुए थे, किन्तु उसमें २ गणतन्त्र काल थे। एक काल ३ पीढ़ी का १२० वर्ष का था, दूसरा ३०० वर्ष या १० पीढ़ी का था। ३०० वर्ष का गणतन्त्र तो प्रसिद्ध मालव गण था जो शूद्रक शक (७५६ ईपू) से श्रीहर्ष शक (४५६ ईपू) तक था।
दूसरा गणतन्त्र १२० वर्ष का परशुराम काल में था जिसमें २१ बार क्षत्रियों का विनाश कहा गया है। २१ गणतन्त्रों के लिये २-२ वर्ष युद्ध हुये। आरम्भ में ८ x ४ वर्ष युद्ध तथा ६ x ४ वर्ष परशुराम द्वारा तप हुआ। बीच का कुछ समय समुद्र के भीतर शूर्पारक नगर बसाने में लगा जिसकी लम्बाई नारद पुराण के अनुसार ३० योजन तथा ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार २०० योजन है। रामसेतु का २२ किमी १०० योजन कहा जाता है, तो यह ४४ किमी. होगा। शूर्पारक = सूप। इस आकार की खुदई पत्तन बनाने के लिये या पर्वत का जल से क्षरण रोकने के लिये किया जाता है। इसे अंग्रेजी में शूट (Chute) कहते हैं। अतः कुल मिला कर १२० वर्ष होगा जिसका वर्णन मेगास्थनीज के समय रहा होगा। (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/४६/२९-३४, २/३/४७/२६-५४, २/३/५६/५६, २/३/५७/२७-५२, २/३/५८/३-३२, नारद पुराण, २/७४/२-३०)। इसकी पुष्टि मंगलोर तट के पास समुद्र के भीतर ३० किमी लम्बी दीवाल से होती है जिसका समय ६००० ई.पू. अनुमानित है।
✍🏻अरुण कुमार उपाध्याय

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
kralbet
otobet giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
otobet giriş
otobet giriş
otobet giriş
betyap giriş
betyap giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
betnano
betnano
betnano
kralbet
kralbet
kralbet
setrabet
setrabet
kralbet
betpark giriş
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş