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अयोध्या के प्राचीन और नवीन प्रवेशद्वारों का परिचय

डा. राधे श्याम द्विवेदी
अयोध्या का क्षेत्रफल 12 योजन अर्थात 84 किलोमीटर लंबा और तीन योजन अर्थात 21 किमी. चौड़ा है. इसके उत्तरी छोर पर सरयू और दक्षिणी छोर पर तमसा नदी अवस्थित हैं. इन दोनों नदियों के बीच की औसत दूरी लगभग 20 किलोमीटर है. माना जाता है कि अयोध्या शहर मछली के आकार का है, जिसका अगला सिरा सरयू नदी के गुप्तार घाट को माना जाता है, इसका पिछला सिरा पूर्व में बिल्हर घाट पर स्थित है.राजधानी अयोध्या पुरी के चारों ओर प्राकार ( कोट ) भी था । प्राकार के ऊपर नाना प्रकार के ‘शतनी’ आदि सैकड़ों यन्त्र रक्खे हुये रहते थे ।
अयोध्या नगरी के चार प्राचीन प्रवेश द्वार :-
1. अयोध्या का पश्चिमद्वार वैजयन्तद्वार :-
अयोध्या नगरी की पश्चिमी सीमा बडी कठिनाई से निश्चित समझी जा सकती है। उत्तरकोशल और अयोध्या को स्थिति तो आजकल का लखनऊ शहर तक आ जायगा और इस प्रकार से लक्ष्मणपुरी (लखनऊ) अयोध्या का पश्चिम द्वार हो सकती है । वैसे धर्म ग्रंथों में पश्चिम के ओर के द्वार का नाम “वैजयन्तद्वार” मिलता है। शत्रुघ्न सहित राजकुमार भरत जब मातुलालय (मामा के घर) गिरिग्रज नगर से अयोध्या में आये थे तब इसी द्वार से प्रविष्ट हुये थे। यथा — ” द्वारेण वैजयम्तेन प्राविशञ्छान्तवाहनः”।
2.अयोध्या नगरी का पूर्वी विडहर द्वार ;-
नगरी से जो पूर्व की ओर द्वार था, उसी से विश्वामित्र के साथ राम-लक्ष्मण सिद्धाश्रम वा मिथिला नगरी को गये थे।
यह भी कहा जाता है कि इस नगर का पूर्व द्वार फैजाबाद जिले में आजमगढ़ को सीमा पर विडहर में था। पास ही में दशरथ की समाधि भी बनी है।
3.अयोध्या नगरी का दक्षिणी द्वार ;-
दक्षिण का द्वार राम-लक्ष्मण और सीता की विषादमयी स्मृति के साथ अयोध्या- वासियों को चिरकाल तक याद रहा था। क्योंकि इसी द्वार से रोती हुई नगरी को छोड़ कर राम-लक्ष्मण और सीता दण्डक-वन को गये थे। और इसी द्वार से रघुनाथ जी की कठोर आशा के कारण जगजननी किन्तु मन्दागिनी सीता को लक्ष्मण वन में छोड़ कर आये थे।
4. अयोध्या नगरी का उत्तरी मख द्वार :-
उत्तर की ओर जो द्वार था उसके द्वारा पुरवासी सरयू तट पर पाया जाया करते थे। राम कोट के नीचे जल से भरी हुई परिग्या (खाई ) थी। पुरी के उत्तर भाग में सरयू का प्रवाह था । सुतरां, उधर परिखा का कुछ भी प्रयोजन न था । उधर सरयू का प्रबल प्रवाह ही परिवा का काम देता था, किन्तु नदी के तट पर भी सम्भव है कि नगरी का प्राकार हो । नदी के तीन और जो खाई थी अवश्य वह जल से भरी रहती थी। क्योंकि नगरी के वर्णन के समय महर्षि वाल्मीकि ने उसका ‘दुर्गगम्भीर-परिखा’ यह विशेषण दिया है। टीकाकार स्वामी गमानुजाचार्य ने इसकी व्याख्या में कहा है कि ” जलदुर्गेण गम्भीग श्रगाधा परिया यन्याम्” । इससे समझ में आता है कि जलदुर्ग से नगरी की समस्त परिवा अगाध जल से परिपूर्ण रहती थी । इस प्रकार अयोध्या ‘कोट खाई ‘ से घिर कर सचमुच ‘अयोध्या’ हो रही थी।
नई अयोध्या की प्रस्तावित 6 बाह्य प्रवेशद्वार:-
अथर्ववेद में वर्णित अष्ट चक्र और नव द्वार वाली अयोध्या के स्वरूप को रामनगरी के पुनर्निमाण में भी प्रमुखता से स्थान देने का प्रयास चल रहा है. प्राचीन 9 द्वारों में 6 द्वारों के निर्माण की रूपरेखा तैयार कर ली गई है. रामनगरी के पुनर्निमाण को लेकर संतों की राय पर इसे साकार करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है. इन प्रवेश द्वार की डिजाइन सिक्स लेन, फोर लेन तथा टू लेन सड़कों को ध्यान में रखकर की जा रही है. एक प्रवेश द्वार की अनुमानित लागत 10 से 15 करोड़ रुपये आने की संभावना है. ये 6 प्रवेशद्वार 6 जिलों को अयोध्‍या से जोड़ने का काम करेंगे। सभी 6 ‘द्वारों’ के किनारे एक- एक वाटिका तैयार की जाएगी. इन बागों को ‘रामायण वाटिका’ कहा जाएगा. अयोध्या शहर को भव्य धार्मिक रूप देने के लिए सभी प्रवेश बिंदुओं पर भव्य द्वार या राम द्वार बनाए जाएंगे. उन्होंने बताया कि यह पहल पवित्र शहर को एक छोटे से शहर से एक नए शहर में बदलने की योजना का एक हिस्सा है, जो आधुनिक सुविधाओं से लैस और संस्कृति के अनुकूल हैं. हर एक प्रवेश द्वार पांच हेक्टेयर भूमि में बनेगा। प्रवेश द्वार के साथ यहां यात्री सुविधाएं जैसे पार्किंग, रुकने के लिए, रेस्टोरेंट, दुकान आदि की व्यवस्था होगी। आइए जानते हैं कौन से होंगे ये 6 बाह्य प्रवेश द्वार कौन कौन हैं। उत्तर प्रदेश शासन से छह प्रवेश द्वार के लिए 25 करोड़ रुपये जारी कर चुका हैं। प्रवेश द्वार के निर्माण पर कुल 65 करोड़ रुपये की लागत आनी है।राम नगरी में प्रस्तावित प्रवेश द्वारों का नाम और रूपरेखा कुछ इस प्रकार तैयार की जा रही है।
1.श्रीराम द्वार लखनऊ से आने जाने के लिए:-
राम नगरी में प्रवेश करने के लिए निर्मित किए जाने वाले 6 द्वारों में से एक प्रवेश द्वार लखनऊ रोड पर फिरोजपुर के पास, भगवान राम के नाम पर ही होगा। वही पर्यटक जो लखनऊ की सैर करने आएंगे वह आसानी से सड़क मार्ग से जाकर श्रीराम की नगरी अयोध्‍या में दर्शन कर सकते हैं।
2. लक्ष्मण द्वार गोंडा से आने जाने के लिए :-
भगवान राम के हमेशा साथ रहने वाले छोटे भइया लक्ष्मण जी के नाम पर भी एक द्वार का निर्माण किया जाएगा. इस द्वार का निर्माण गोंडा रोड पर कटरा भोगचंद के पास
निर्मित किया जाना है . मतलब गोंडा से आने वाले श्रद्धालुओं को लक्ष्मण द्वार से रामनगरी में प्रवेश मिलेगा. गोंडा का बड़ा प्राचीन और ऐतिहासिक महत्व भी है. गोंडा के बारे में ऐसा माना जाता है कि यहां त्रेतायुग में अयोध्‍या से गौवंश चरने आया करते थे. मान्‍यता है कि यहां पर भगवान विष्‍णु के वाराह अवतार का भी प्राकट्य हुआ था.
3.भरत द्वार प्रयागराज से आने जाने के लिए: –
प्रभु श्रीराम के अनुज और कैकयी के पुत्र भरत के नाम पर इस द्वार का नाम भरत द्वार रखा जाएगा और यह द्वार सुल्तानपुर रोड पर मैैनुद्दीनपुर के पास प्रस्तावित है। यह संगम नगरी प्रयागराज को अयोध्या से जोड़ने का काम करेगा. तीर्थ राज प्रयाग ये पर्यटक सीधे सड़क मार्ग से अयोध्‍या पहुंचकर रामलला के दर्शन का पुण्‍य पा सकेंगे.
4. जटायु द्वार वाराणसी मार्ग से आने जाने के लिए: – अयोध्या में प्रवेश के अंबेडकरनगर रोड पर राजेपुर उपरहार के पास लिए चौथे द्वार का नाम जटायु द्वार होगा. ये द्वार राम नगरी को बाबा विश्वनाथ की नगरी यानी वाराणसी से जोड़ने का कार्य करेगा. काशी से आने वाले रामभक्तों को इसी द्वार से प्रवेश करना होगा. रामायण में जटायु ने प्रभु श्रीराम की उस वक्त मदद की थी. जब वे सीता को खोज रहे थे. जटायु ने माता सीता को बचाने के लिए रावण से युद्ध भी किया था, जिसमें रावण ने बड़ी निर्दयता से उसके पंखों को काट दिया था. प्रभु श्रीराम को रावण की जानकारी देकर जटायु ने अपने प्राण त्याग दिए थे.
5. हनुमान द्वार गोरखपुर से आने जाने के लिए : –
अयोध्या को गोरखपुर से जोड़ने का काम बस्ती रोड पर इस्माइलपुर के पास हनुमान द्वार करेगा। अयोध्‍या के राजा भगवान राम को माना जाता है तो अयोध्‍या के रक्षक आज भी हनुमानजी ही कहलाते हैं. यहां पर हनुमानजी का मंदिर हनुमानगढ़ी विश्‍व भर में विख्‍यात है. यहां हनुमानजी की प्रतिमा बाल रूप में विराजमान है. रामायण में हनुमान जी ने ही सबसे पहले लंका जाकर माता सीता का पता लगाया था. इतना ही नहीं युद्ध में जब भइया लक्ष्मण मेघनाथ के हाथों घायल हो जाते हैं तो हनुमान जी ने संजीवनी लाकर उनके प्राण बचाए थे. श्रीराम जी को हनुमान जी काफी प्रिय हैं. रामभक्तों में हनुमान जी का नाम सबसे पहले लिया जाता है. धर्मग्रंथों के अनुसार हनुमान जी को अजर-अमर का वरदान है और वे आज भी जीवित हैं.
6. गरुड़ द्वार रायबरेली से आने जाने के लिए :-
अयोध्या में प्रवेश करने वाले 6 द्वारों में एक गरुड़ द्वार भी है. ये द्वार रायबरेली मार्ग प्रवेश द्वार रायबरेली रोड पर सरियावां के पास बनाया जाएगा. गरुड़ पक्षी को भगवान विष्णु का वाहन कहा जाता है. रामायण में भी गरुड़ जी का वर्णन है. भगवान राम और भइया लक्ष्मण को जब मेघनाथ ने नागपाश में बांध दिया था. तो हनुमान जी गरुड़ जी को ही लेकर आए थे. गरुड़ जी ने ही भगवान को नागपाश के बंधन से मुक्त किया था. इस तरह से राम-रावण युद्ध में गरुड़ ने भगवान की सहायता की थी.
मुख्य राम मंदिर के लिए प्रस्तावित पांच अंदरूनी द्वार:-
मुख्य राम मंदिर के अंदर प्रवेश के लिए पांच प्रवेशद्वार प्रस्तावित है – सिंहद्वार, नृत्यमंडप, रंग मंडप, पूजा-कक्ष, और गर्भगृह हैं। रामलला की मूर्ति भूतल पर ही विराजमान होगी।मंदिर के चारों दिशाओं में 800 मीटर परकोटा आयताकार बनाया जाएगा। परकोटे में छह मंदिर बनाए जाएंगे। चारों दिशाओं में एक-एक मंदिर होगा। इसके अलावा उत्तर व दक्षिण दिशा में बीच में भी एक-एक मंदिर बनेगा। साथ ही परकोटे की दीवारों पर देेवी-देवताओं सहित रामकथा से संबंधित 150 चित्र उकेरे जाएंगे।
रामनगरी का रामकोट मोहल्ला पौराणिक एवं ऐतिहासिक मान्यताओं को समेटे है। अयोध्या की जो विशेषता है वह राम जन्मभूमि के कारण है। राम जन्मभूमि की रक्षा के लिए लिए चारों तरफ कोट (दुर्ग) बनाए गए थे। कोटेश्वर महादेव, मतगजेंद्र, क्षीरेश्वरनाथ सहित धनयक्षकुंड स्थापित किए गए। इसी कारण राम जन्मभूमि के चारों ओर के क्षेत्र को रामकोट कहा गया। रामकोट साधकों की भूमि रही है। बड़े-बड़े साधकों ने यहां तप, तपस्या और साधना की। इसी रज पर भगवान राम का बचपन बीता। ऐसी मान्यता है कि रामकोट में अदृश्य रूप में शक्तियां विराजती हैं। इसी मान्यता के चलते रामकोट की परिक्रमा का भी विधान है।
दीपोत्सव 2022 के आकर्षण के लिए बने स्वागतद्वारः –
दीपोत्सव 2022 के अवसर पर उत्तर प्रदेश सरकार के निर्देश पर रामायण कालीन प्रसंगों की याद दिलाने वाले विविध द्वार भी बनाए गए थे जिससे लोग अयोध्या में प्रवेश कर त्रेतायुग वाली दीपावली का अहसास किए। ये द्वार हैं – निषादराज द्वार, अहिल्या द्वार, राम द्वार, दशरथ द्वार, लक्ष्मण द्वार, सीताद्वार, रामसेतु द्वार, शबरी द्वार, हनुमान द्वार, भरत द्वार, लव कुश द्वार, सुग्रीव द्वार, जटायु द्वार, तुलसी द्वार, और गुरुकुल द्वार आदि।

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