Categories
गीता का कर्मयोग और आज का विश्व डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-51

गीता का आठवां अध्याय और विश्व समाज

परमपुरूष अर्थात परमात्मा को पाने का सच्चा साधन योगेश्वर श्रीकृष्ण ‘अभ्यास योग’ को ही बताते हैं। वह कहते हैं कि जो साधक ‘अभ्यास योग’ के माध्यम से चित्त को एकाग्र कर उसे कहीं दूसरी जगह भागने नहीं देता है-वह निरन्तर चिन्तन करते रहने से दिव्य परमपुरूष को पा जाता है। संसार के अधिकांश लोगों की सोच यह होती है कि ईश्वर का ध्यान तो अन्तिम समय में कर लिया जाएगा। अभी से उसको याद करने की क्या आवश्यकता है? ऐसे लोगों की जवानी संसार के विषय भोगों में व्यय हो जाती है और वे अपने परमपिता परमात्मा से परिचय नहीं बढ़ा पाते। जब अन्त समय आता है तो जीवन भर की वासनाओं से बने कुसंस्कारों की कीचड़ में चित्त लथपथ हो जाता है? तब उस पर ईश नाम का जप कोई लेपन नहीं कर पाता। उस समय का किया जप भी व्यर्थ ही जाता है। क्योंकि उस समय चित्त जीवन भर के कुसंस्कारों के कारण विषय वासनाओं की कीचड़ में इतना सन चुका होता कि उसे साफ करना तब सर्वथा असंभव ही हो जाता है। जिससे चित्त विकृत हो जाता है और ऐसा व्यक्ति जैसे कीचड़ में लिपटा हुआ (बच्चा जेर में लिपटा हुआ जन्मता है) जन्म लेता है वैसे ही कीचड़ में (विषय वासनाओं में) लिपटा हुआ जीवन जीता है और अन्त में इसी कीचड़ (चित्त की अपवित्रता) में लिपटा या सना हुआ होकर ही संसार से चला जाता है।
संसार के लोगों को संभलने की और अपने आपको सुधारने की चेतावनी देते हुए श्रीकृष्ण जी ने यहां स्पष्ट किया है कि संसार के लोगों को ‘अभ्यास योग’ का सहारा लेकर चित्त को एकाग्रता में ढालते हुए परमपुरूष को पाना चाहिए। उसके बिना जीवन की गति नहीं है। मनुष्य ब्रह्म में लीन तभी हो सकता है जब मृत्यु काल में ब्रह्म तथा आत्मा की एकता हो जाएगी। जीवन के अन्तिम क्षणों में अर्थात अन्तकाल में मृत्यु के समय यदि मोक्ष की भावना बन जाएगी तो अगला जीवन (मरणशील देह) मिल जाएगा। निरन्तर अभ्यास से व्यक्ति का कर्मक्षय होता है जिससे पुन:-पुन: जन्म मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है। तिलक जी का मत है कि ज्ञानाग्नि में कर्म तिनके की तरह जल जाते हैं। अत: अभ्यास से ज्ञानाग्नि को प्रज्ज्वलित किये रखना चाहिए।
परम पुरूष का वर्णन
अब प्रश्न आता है कि वह परमपुरूष है कौन? जिसका अन्तकाल में स्मरण करना है। उसका रूप कैसा है?
श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि उस परमात्मा परमपुरूष का ध्यान करने के लिए व्यक्ति को अन्त समय में इस संसार से प्रस्थान करते समय अचल मन से अर्थात भक्ति से सराबोर होकर योगबल से भृकुटी के बीच में अच्छी तरह प्राण को स्थापित करके उस क्रान्तदर्शी (कवि) पुरातन, नियन्ता, अणु से भी अणु, सबके पालनहार, अचिन्त्य सूर्य के समान तेजस्वी, अन्धकार से दूर उस भगवान का स्मरण करता है वह उस दिव्य परम पुरूष को प्राप्त करता है। श्रीकृष्णजी यह उपदेश देते समय वेद (यजुर्वेद 31/18) वेद के आदेश को ही दोहरा रहे हैं। वहां वेद का ऋषि कहता है कि-
वेदाहमेतम् पुरूषं महान्तम् आदित्यवर्णम् तमस: परस्तात्।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्य: पन्था विद्यते अयनाय।।
अर्थात मैं इस अन्धकार से रहित, प्रकृति से बहुत परे उत्कृष्ट सूर्य सम तेजस्वी महान पुरूष को जानता हूं, मनुष्य उसे ही जानकर मृत्यु को लांघ जाता है। सद्गति के लिए मुक्ति के लिए अन्य कोई मार्ग नहीं है। वेद ने ऐसे परमपुरूष की विशेषताएं भी स्पष्ट की हैं। अथर्ववेद (10 /8/44) में आया है-
अकामो धीरो अमृत: स्वयंभू रसेन
तृप्तो न कुतश्चनोन:।
तमेव विद्वान न बिभाय मृत्योरात्मानम्
धीरमजरं युवानम्।।
अर्थात वह भगवान, परमपुरूष, परमात्मा निष्काम, धीर, अविनाशी, स्वयंभू आनन्द से भरपूर है, उसमें किसी प्रकार की त्रुटि नहीं है। उसी धीर, अजर, सदा जवान, आत्मा (परमात्मा) को जानने वाला मृत्यु से नहीं डरता।
वेद की इसी भाषा को श्रीकृष्ण जी ने यहां प्रयोग किया है। वे भी ईश्वर को आदित्यवर्ण=सूर्यसम तेजस्वी और तमस: परस्तात्=अन्धकार से परे या दूर बता रहे हैं। वेद जिस प्रकार ईश्वर को ‘पुरूषं महान्तम्’ कह रहा है-उसी प्रकार श्रीकृष्णजी भी उसे परमपुरूष कह रहे हैं। वेद के इस सनातन ज्ञान को श्रीकृष्ण जी महाभारत के कुरूक्षेत्र के युद्घक्षेत्र में अपने शिष्य अर्जुन को दे रहे हैं।
अपने उपदेश को आगे बढ़ाते हुए श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि वे-”वेदों के मर्मज्ञ लोग जिस ईश्वर को ‘अक्षर’ (ओमकार) नाम से पुकारते हैं, वीतराग यति लोग जिसमें प्रवेश करते हैं, ब्रह्मचारी लोग जिसकी प्राप्ति की इच्छा से ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस ओंकार पद का मैं तेरे लिए संक्षेप से वर्णन करूंगा।”
इस श्लोक में सीधे साफ शब्दों में श्रीकृष्णजी ने ‘ओंकार’ को सर्वोपरि माना है। इसका अभिप्राय है कि वह स्वयं को भी उसी ओंकार का उपासक मान रहे हैं-जिसने यह चराचर जगत बनाया है। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह स्वयं को भगवान घोषित नहीं कर रहे हैं। इसलिए गीता को ‘अवतारवाद’ की घोषणा करने वाला ग्रन्थ सिद्घ करना स्वयं श्रीकृष्ण जी की भावनाओं के नितान्त विपरीत होगा।
श्रीकृष्णजी ‘ओ३म्’ के जप को कितना महत्व देते हैं? इसका पता अगले श्लोक में चलता है। जिसमें वह स्पष्ट कर रहे हैं कि एक सच्चा साधक अपनी समस्त इन्द्रियों के द्वारों को संयम में रखकर मन को हृदय में रोककर प्राण को अपने मूर्धा अर्थात मस्तक में रखकर या स्थिर करके योग द्वारा समाधि में बैठकर -‘ओ३म्’ इस एक अक्षर रूपी ब्रह्म का उच्चारण और मेरा चिन्तन करता हुआ जो देह का त्याग करता हुआ संसार से प्रयास करता है-वह परमगति को प्राप्त करता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण जी ने ओंकार की उपासना का महत्व और उसका फल दोनों को ही स्पष्ट कर दिया है। यह ओंकार हमारे आर्षग्रंथों में सर्वप्रथम पूजनीय माना गया है। उसकी सर्वोच्च सत्ता का सम्पूर्ण वैदिक वांग्यमय में परचम लहरा रहा है। तैत्तिरीय-उपनिषद का ऋषि (तैत्ति 2/8/1) में कहता है कि इस (ओंकार) के भय से वायु चलता है, सूर्य मानो इसी के भय से उदय होता है। अग्नि और विद्युत भी मानो इसी के भय से क्रिया करते हैं। मौत भी मानो इसी के भय से क्रिया करते हैं। मौत भी मानो इसके डर से दौड़ रही है। कहने का अभिप्राय है कि सम्पूर्ण प्राकृतिक शक्तियां उसी के डर से कार्य कर रही हैं। उसी एकाक्षर ब्रह्म को जो लोग हृदय से पुकारते हैं-वे उच्चगति को अर्थात परमगति को प्राप्त होते हैं।
श्रीकृष्णजी का मानना है कि जो व्यक्ति ‘अनन्य चित्त’ होकर अर्थात अपने चित्त को इधर उधर न भटकाकर नित्य उसी ओंकार में (सदा मुझमें) रमा रहता है। ऐसे योगी के लिए सुलभ है अर्थात उन्हें मैं बड़ी सुविधा से और सहजता से मिल जाता हूं। जो लोग इस ओंकार को खोज लेते हैं और उसके साथ मिलकर उसके परमानन्द के भागी बन जाते हैं-उनका फिर पुनर्जन्म नहीं होता। कहने का अभिप्राय है कि वे मोक्ष को पा लेते हैं। मुक्ति से पुनरावृत्ति भी आर्य सिद्घान्त है। इस प्रकार वे पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते, इसका अर्थ यह नहीं कि वे फिर सदा के लिए ही पुनर्जन्म के फेर से मुक्त हो जाते हैं। उनका पुनर्जन्म तो होता है-पर बहुत देर के पश्चात होता है। यह पुनर्जन्म कब होता है? इस पर भी श्रीकृष्ण जी ने भली प्रकार प्रकाश डाल दिया है। इसे उन्होंने आगे स्पष्ट कर दिया है।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
kralbet
betnano
betnano
betnano
kralbet
kralbet
kralbet
setrabet
setrabet
kralbet
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla Lenf Drenaj
Kolaybet Giriş
Betgaranti Giriş
kralbet
kralbet
betnano
betnano
Hititbet Giriş
kralbet
betnano
kralbet
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
kralbet
kralbet
betnano
betnano
kralbet
kralbet
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
kralbet
kralbet
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
atlasbet
atlasbet
betnano
betnano
kralbet
hititbet
hititbet
betgaranti giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
xslot giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
xslot giriş
betgaranti giriş
hitbet giriş
hitbet giriş