जीने का अधिकार और पानी का प्रश्न

रमेश सर्राफ धमोरा
जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मनुष्य चांद से लेकर मंगल तक की सतह पर पानी तलाशने की कवायद में लगा है, ताकि वहां जीवन की संभावना तलाशी जा सके। पानी की महत्ता को हमारे पूर्वज भी अच्छी तरह जानते थे। जीवन के लिए इसकी आवश्यकता और उपयोगिता का हमारी तमाम प्राचीन पुस्तकों व धार्मिक कृतियों में व्यापक उल्लेख मिलता है। जल न हो तो हमारे जीवन का आधार ही समाप्त हो जाएगा। दैनिक जीवन के कई कार्य बिना जल के संभव नहीं हैं। लेकिन धीरे-धीरे धरती पर जल की कमी होती जा रही है। जलाभाव की मूल वजह यह है कि उपलब्ध जल की काफी मात्रा प्रदूषित हो चुकी है।
पीने का पानी कैसा हो इस विषय पर वैज्ञानिकों ने काफी प्रयोग किए हैं और पानी की गुणवत्ता को तय करने के मापदंड बनाए हैं। पीने के पानी का रंग, गंध, स्वाद सब अच्छा होना चाहिए। ज्यादा कैल्शियम या मैगनेशियम वाला पानी कठोर जल होता है और पीने के योग्य नहीं होता। पानी में हानिकारक रसायनों की मात्रा पर भी अंकुश आवश्यक है। आर्सेनिक, लेड, सेलेनियम, मरकरी तथा फ्लोराइड, नाइट्रेट आदि स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालते हैं। पानी में कुल कठोरता तीन सौ मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा होने पर पानी शरीर के लिए नुकसानदेहहो जाता है। पानी में विभिन्न बीमारियों के कीटाणुओं का होना, हानिकारक रसायनों का होना, कठोरता होना उसे पीने के अयोग्य बनाता है।
धरती की सतह के लगभग सत्तर फीसद हिस्से में उपलब्ध होने के बावजूद अधिकांश पानी खारा है। स्वच्छ पानी धरती के लगभग सभी आबादी वाले क्षेत्रों में उपलब्ध है। फिर भी, भारत में पेयजल की समस्या काफी विकट है। यहां दस करोड़ की आबादी को स्वच्छ जल सहज उपलब्ध नहीं है, जो किसी भी देश में स्वच्छ जल से वंचित रहने वाले लोगों की सर्वाधिक संख्या है। इतना ही नहीं, विशेषज्ञों ने इस स्थिति के और गंभीर होने की आशंका जताई है, क्योंकि भारत में भूमिगत जल के काफी हिस्से का दोहन किया जा चुका है। इसका मतलब है कि हमने पुनर्भरण क्षमता से अधिक जल का उपयोग कर लिया है। स्वच्छ जल के सबसे बड़े स्रोत छोटी नदियां और जलधाराएं सूख चुकी हैं, जबकि बड़ी नदियां प्रदूषण से जूझ रही हैं। इस सब के बावजूद हम कुल बारिश का सिर्फ बारह फीसद जल संरक्षित कर पाते हैं। ‘वाटरएड’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कुल आबादी का छह प्रतिशत हिस्सा स्वच्छ जल से वंचित है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भूमिगत जल से कुल पेयजल के 85 फीसद की आपूर्ति होती है, लेकिन देश के 56 फीसद हिस्से में भूमिगत जल के स्तर में चिंताजनक गिरावट आई है।
सरकार का कहना है कि 2030 तक देश के हर घर को पेयजल की आपूर्ति करने वाले नल से जोड़ दिया जाएगा। दावा कुछ भी किया जाए, हालत यह है कि देश के लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध करा पाना आज भी एक बड़ी चुनौती है। अधिसंख्य आदिवासी नदियों, जोहड़ों, कुओं और तालाबों के पानी पर ही निर्भर हैं। आदिवासी बहुल इलाकों में विकास की रोशनी आजादी के इतने सालों बाद भी नहीं पहुंच पाई है। कई ग्रामीण इलाकों में कुओं और ट्यूबवेलों के पानी का उपयोग करने वाले लोगों को यह भी पता नहीं होता है कि वे जीवित रहने के लिए जिस पानी का उपयोग कर रहे हैं, वही पानी धीरे-धीरे उन्हें मौत के मुंह में ले जा रहा है।
नदियों के किनारे बसे शहरों की स्थिति तो और भी खराब है। इन नदियों में कल-कारखानों और स्थानीय निकायों द्वारा फेंका गया रासायनिक कचरा, मल-मूत्र और अन्य अवशिष्ट उन्हें प्रदूषित कर रहे हैं। इन नदियों के जल का उपयोग करने वाले कई गंभीर रोगों के शिकार हो रहे हैं। इससे बचने का एक ही रास्ता है कि लोगों को नदियों को गंदी होने से बचाने के लिए प्रेरित किया जाए। उन्हें यह समझाया जाए कि उनके द्वारा नदियों और तालाबों में फेंका गया कूड़ा-कचरा उनके ही पेयजल को दूषित करेगा। कल-कारखानों के मालिकों को इसके लिए बाध्य करना होगा कि वे प्रदूषित और रासायनिक पदार्थों को नदियों में कतई न जाने दें। यदि कोई ऐसा करता पाया जाए, तो उसे कठोर दंड दिया जाए।
जब तक हम जल की महत्ता को समझते हुए नदियों को साफ रखने की मुहिम का हिस्सा नहीं बनते हैं, तब तक नदियों को कोई भी सरकार साफ नहीं कर सकती, न साफ रख सकती है। गंगा सफाई योजना के तहत हजारों करोड़ रुपए खर्च हो गए लेकिन अब तक नतीजा सिफर ही निकला है। भले ही सरकारी नीतियां दोषपूर्ण रही हों, लेकिन इसके लिए आम आदमी भी कम दोषी नहीं है। प्राचीनकाल में पर्यावरण, पेड़-पौधों और नदियों के प्रति सद्भाव रखने का संस्कार मां-बाप अपने बच्चों में पैदा करते थे। वे अपने बच्चों को नदियों, पेड़-पौधों और संपूर्ण प्रकृति से प्रेम करना सिखाते थे। वे इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि नदियां, झीलें, कुएं, तालाब हमारे समाज की जीवन रेखा हैं। इनके बिना जीवन असंभव हो जाएगा, इसीलिए लोग पानी के स्रोत को गंदा करने की सोच भी नहीं सकते थे। वह संस्कार आज समाज से विलुप्त हो गया है। अपने फायदे के लिए बस जल का दोहन करना एकमात्र लक्ष्य रह गया है।
आबादी के तेजी से बढ़ते दबाव के साथ ही जल संरक्षण की कोई कारगर नीति न होने से पीने के पानी की समस्या साल-दर-साल गंभीर होती जा रही है। इससे प्रतिव्यक्ति साफ पानी की उपलब्धता घट रही है। फिलहाल देश में प्रतिव्यक्ति एक हजार घनमीटर पानी उपलब्ध है जो वर्ष 1951 में चार हजार घनमीटर था। जबकि प्रति व्यक्ति 1700 घनमीटर से कम पानी की उपलब्धता को संकट माना जाता है। अमेरिका में यह आंकड़ा प्रति व्यक्ति 8 हजार घनमीटर है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि दुनिया में इस समय दो अरब लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। दूषित पानी हैजा, टाइफाइड, पोलियो और पेचिश आदि का कारण बन रहा है जिससे हर साल कम से कम पांच लाख लोग मर रहे हैं। इनमें सबसे ज्यादा हैजा-पीडि़त होते हैं। हालांकि रिपोर्ट में इस बात का स्वागत किया गया है कि पिछले तीन साल में अधिकतर देशों ने साफ पानी की आपूर्ति के बजट में वृद्धि की है। लेकिन अब भी अस्सी प्रतिशत देश खुद स्वीकार कर रहे हैं कि जलापूर्ति पर उनका व्यय पर्याप्त नहीं है।
भारत नदियों का देश है, पर यहां की ज्यादातर नदियों का पानी पीने लायक नहीं है और कई जगह तो नहाने लायक भी नहीं है। सिंचाई के लिए मनमाने तरीके से भूजल का दोहन होता है। इससे जल-स्तर तेजी से घट रहा है। कुछ ऐसी ही हालत शहरों में भी है, जहां तेजी से बढ़ते कंकरीट के जंगल जमीन के भीतर स्थित पानी के भंडार पर दबाव बढ़ा रहे हैं। अब समय आ गया है कि हमें पानी का दुरुपयोग रोकने और पानी को प्रदूषित होने से रोकने के लिए संकल्पित होना होगा। कुछ साल पहले हमारी संसद ने खाद्य सुरक्षा अधिनियम बनाया था। भोजन के अधिकार की तरह ही स्वच्छ पेयजल के अधिकार को भी कानूनी शक्ल दी जाए और उस पर संजीदगी से अमल हो। तभी जीने के अधिकार को सार्थक बनाया जा सकेगा, जिसकी गारंटी संविधान के अनुच्छेद इक्कीस में दी गई है।

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