गीता का आठवां अध्याय और विश्व समाज

मोक्ष कब तक मिला रहता है
अब हम इस विषय पर विचार करते हैं कि मनुष्य को मोक्ष कब मिलता है? गीता के आठवें अध्याय में ही इस पर प्रकाश डालते हुए योगीराज श्रीकृष्णजी ने स्पष्ट किया कि ब्रह्म का एक दिन मानव के एक हजार युगों का होता है और उसकी रात्रि भी एक हजार युगों की होती है। सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग चारों युगों की एक चतुर्युगी में 43,20,000 वर्ष हुए, इनमें 1000 की गुणा करें तो सृष्टि की आयु निकल आती है जो कि 4,32,00,00,000 (चार अरब बत्तीस करोड़) वर्ष हुए। यह ब्रह्म का एक दिन है। इतने ही काल की प्रलय होती है, जिसे ब्रह्म की एक रात्रि कहा जाता है। इसी वैदिक विचार को श्रीकृष्णजी ने ब्रह्म का एक हजार युगों का एक दिन और एक हजार युगों की रात्रि कहा है। इस विज्ञान को शेष संसार आज तक भी नहीं समझा है और हमने उसे समझाने का प्रयास नहीं किया है। जबकि श्रीकृष्ण जी ने ऐसा कहकर गीता में वेद-विज्ञान की बहुत बड़ी बात कह दी है। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम आंख मूंदकर विदेशियों के ज्ञान-विज्ञान के दीवाने न बनें। हमें अपने आर्श ग्रन्थों का अध्ययन करने वाला बनना चाहिए और उनके गूठ अर्थों को समझने का प्रयास करना चाहिए।
जिस समय यह बात श्रीकृष्णजी कही थी या जिस समय गीता बनी थी-उस समय हमारे देश के लोगों के लिए यह बड़ी बात नहीं थी, क्योंकि इस विज्ञान को उस समय देश का बच्चा-बच्चा जानता था। बाद में जब भारत से विज्ञानवाद के स्थान पर अवैज्ञानिकता का प्रवेश हुआ तो उस समय इस विज्ञान को समझने का प्रयास नहीं किया गया और आज हम पश्चिम के विज्ञान के सामने सिर झुकाये खड़े हैं और अपने आपको भूल गये हैं। इससे देश और विश्व का अहित हो रहा है।
योगेश्वर श्रीकृष्णजी इसी विज्ञान पर प्रकाश डालते हुए अगले श्लोक में स्पष्ट कर रहे हैं कि ब्रह्म के दिन अर्थात सृष्टि के प्रारम्भ होने पर सब व्यक्त पदार्थ अव्यक्त प्रकृति से उत्पन्न हो जाते हैं, ब्रह्म की रात्रि अर्थात प्रलय के आने पर फिर वे सब व्यक्त पदार्थ अव्यक्त कही जाने वाली प्रकृति में लीन हो जाते हैं। आज का वैज्ञानिक जब भारत के इस विज्ञान पर खोज करता है तो वह आश्चर्य चकित रह जाता है कि सच तो यही है, जिसे भारत के योगेश्वर श्रीकृष्ण जैसे अनेकों महामानव पूर्व में ही कह गये हैं। श्रीकृष्णजी कहते हैं कि अर्जुन ब्रह्म के ये दिन रात के आने जाने का क्रम बार-बार चलता है।
युजुर्वेद (13/4) में ‘हिरण्यगर्भ: समवत्र्तताग्रे …..’ कहकर स्पष्ट किया गया है कि ब्राह्म दिवस का शुभारम्भ हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति से ही होता है। संध्या में हम जब ‘ऋतं च सत्यं चाभिद्वात्तसो अध्यजायत….’ कहते हैं तो वहां भी यही बात याद करते हैं कि सम्पूर्ण ज्ञान और विज्ञान से भरपूर इस विस्तृत जगत का आदि कारण वह परमेश्वर ही है। उसी के तप से ऋत और सत्य एक साथ मिलकर इस सारे जग प्रपंच का कारण बन रहे हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि छोटे से छोटे कार्य को करने के लिए भी तप की आवश्यकता पड़ती है। यह जो ऋत और सत्य के वशीभूत होकर यह सारा जग प्रपंच चल रहा है। यह भी तप का परिणाम है। अत: तप ऋत और सत्य का भूल है। जिसे भारत के वेदों ने स्थापित किया और गीता जैसे महान ग्रन्थों ने उसका विस्तार किया।
क्या ही अच्छा हो कि सृष्टि उत्पत्ति और प्रलय के इस सूक्ष्म ज्ञान को हमारे कलाकार अपनी कथाओं में ले आयें तो हमारा देश पुन: विश्वगुरू बन जाएगा। बालक-बालक की जुबान पर जब तक विज्ञान के रहस्य चढक़र नहीं बैठेंगे तब तक हम अपने इस लक्ष्य में सफल नहीं हो सकेंगे। श्रीकृष्णजी कहते हैं कि इस अव्यक्त प्रकृति से भी परे एक सत्ता (ब्रह्म) है, जो अक्षर ‘ओ३म्’ कहलाता है, वह अविनाशी है-उसी को परमगति कहते हैं। हमारे यहां एक कहावत है कि व्यक्ति समाप्त हो जाता है पर नाम तो सदा रहता है। आज के गुरूडमवाद में भी नाम लेने की परम्परा इसीलिए है कि नाम सदा रहता है-उस नाम को लो और भजो, और यह नाम ‘ओ३म्’ ही है।
अविनाशी जगदीश का अजर अमर है नाम।
यजन-भजन करते रहो पाओगे सुखधाम।।
इसे चाहे कोई पाखण्डवश कुछ भी कहे, पर यह नाम अर्थात ‘ओ३म्’ ही भवत्राता है। सारा संसार आज इसीलिए दु:खी है कि वह इस नाम से दूर चला गया है। उसे नाम रहस्य का आज तक पता नहीं चला है। वह नहीं जानता कि नाम जाप करने से कितना लाभ होता है? श्रीकृष्ण जी इसे ‘परमपुरूष’ कहते हुए बता रहे हैं कि इसे अनन्यभक्ति द्वारा पाया जा सकता है। अनन्य भक्ति का अभिप्राय है कि भक्त की भक्ति सिर चढक़र बोलने लगे।
क्या है शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष
श्रीकृष्णजी गीता के आठवें अध्याय के अन्त में कहते हैं कि हे भरतकुल में श्रेष्ठ अर्जुन! जिस काल में संसार से चल पडऩे के पश्चात योगी लोग फिर इस संसार में लौटकर नहीं आते और जिस काल में संसार से चल पडऩे के बाद वे लौट आते हैं उस काल का मैं अब वर्णन करूंगा। देखो अर्जुन! जब अग्नि प्रज्ज्वलित हो रही हो, उसका प्रकाश फैल रहा हो तो समझना चाहिए कि इस समय शुक्ल पक्ष चल रहा हो, उत्तरायण के छह माह का काल चल रहा हो, उस समय इस संसार से प्रस्थान करने वाले ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म तक पहुंच जाते हैं।
अग्नि से धुंआ उठ रहा हो, रात्रि का समय हो कृष्ण पक्ष हो-दक्षिणायन के छह माह चल रहे हों, उस समय संसार से प्रस्थान करने वाला योगी चन्द्रमा की ज्योति प्राप्त करके वापस आ जाता है। कृष्णजी शुक्ल पक्ष अर्थात प्रकाशमान तथा कृष्णपक्ष अर्थात अन्धकारमय इन दो मार्गों को मानते हैं। एक मार्ग इनमें से ऐसा है-जिस पर जाने वाले लौट आते हैं और एक ऐसा है जिस पर जाने वाले लौटकर नहीं आते।
हमारे ऋषियों ने और वैज्ञानिक पूर्वजों ने शुक्ल पक्ष उसे माना जो प्रकाशमान हो, शुभ कर्म इस प्रकाशमान होने के प्रतीक हैं। जिसका जीवन शुभकर्मों से प्रकाशमान हो-वह शुक्ल पक्ष में ही रहता है। शुभकर्मों के प्रकाश में संसार से प्रस्थान करने वाले लौटकर इसलिए नहीं आते कि उनकी मुक्ति हो जाती है। जबकि अशुभ कर्म करने वालों का जीवन अंधकारमय होता है-उनके काले कारनामों से उनके जीवन में अंधकार छा जाता है। उनके अशुभ कार्यों से वह कर्मबंधन में फंस जाते हैं और उन्हें एक अपराधी की भांति इस संसार रूपी जेल में पुन:-पुन: आना पड़ता रहता है। श्रीकृष्णजी के समय तक लगता है शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष की यही परिभाषा बनी रही। उनके पश्चात चन्द्रमा की गति के आधार पर शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की परिभाषा बना ली गयी। उनमें भी शुक्ल पक्ष में चांदनी का प्रकाश तो कृष्ण पक्ष में अन्धकार होता है। भारत शुक्लपक्ष की चांदनी का उपासक देश है, उसे कृष्णपक्ष के अन्धकार से कोई मोह नहीं है। यही स्थिति सूर्य की दो गतियों की है।
क्रमश:

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