Categories
गीता का कर्मयोग और आज का विश्व डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-97

गीता का अठारहवां अध्याय

इन्हीं की ओर संकेत करते हुए श्रीकृष्ण जी उपदेश दे रहे हैं कि अहंकार, दर्प, बल, काम, क्रोध और धन सम्पत्ति को छोडक़र ममता से रहित होकर जो शान्त स्वभाव का हो जाता है-वह -‘ब्रह्मभूय’- अर्थात ब्रह्म के साथ एकाकार होने के योग्य हो जाता है।
इस प्रकार मानव जीवन के लिए उसका उद्देश्य निहित कर दिया गया है। गीताकार मनुष्य जीवन की साधना का अन्तिम उद्देश्य मानव को -‘ब्रह्मभूय’- अर्थात ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाने को घोषित करता है। इसी अवस्था में जाकर साधक को वास्तविक आनन्द की प्राप्ति होती है।
‘ब्रह्मभूय’- अर्थात ब्र्हम के साथ एकाकार होने पर साधक को क्या मिलता है? इस पर गीता कहती है कि ‘ब्रह्मभूत’ साधक प्रसन्नात्मा हो जाता है। उसके भीतर का सारा अज्ञान मिट जाता है। अंधकार छंट जाता है, उसे ना तो कोई शोक रहता है और ना ही कोई किसी प्रकार की इच्छा रहती है। वह शोकातीत हो जाता है, इच्छातीत हो जाता है। ऐसा शोकातीत और इच्छातीत व्यक्ति सब प्राणियों को समदृष्टि से देखने लगता है और फिर ईश्वर की परमशक्ति को प्राप्त कर लेता है। उसके लिए पाने के लिए संसार में कुछ नहीं रहता। संसार के सारे ऐश्वर्य ऐसी प्रसन्नात्मा को नीरस और फीके लगने लगते हैं।
संसार के लोग जिन ऐश्वर्यों को लेकर आज लट्ठम-लट्ठा खेल रहे हैं, रक्त बहा रहे हैं और सर्वत्र अशान्ति फैला रहे हैं- वे सारे ऐश्वर्य हमारे प्रसन्नात्मा साधक के लिए सर्वथा हेय और त्याज्य हो जाते हैं, तुच्छ और नगण्य हो जाते हैं। उनसे वह बहुत ऊपर उठ चुका हो जाता है। वास्तव में ‘ब्रह्मभूय’ और ब्रह्मभूत का एक अर्थ विद्वानों ने यह भी माना है कि जब व्यक्ति का आत्मा विशाल होने के मार्ग पर चल पड़ता है और जब उसकी दृष्टि अपने तक सीमित न होकर संपूर्ण विश्व में ही आत्मानुभूति करने लगती है।
ऐसी उच्चता और महानता को प्राप्त कर लेने को भारत ने हर व्यक्ति के लिए एक ‘सिला’ के रूप में जीवनरूपी मैदान में गाड़ दिया है। यह है भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की वास्तविक अवधारणा। जब हम ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’-की बात करते हैं तो उसका अर्थ यही होता है कि भारत के लोगों को और फिर विश्व के लोगों को ‘ब्रह्मभूय’ और ब्रह्मभूत का रहस्य समझा देना और संपूर्ण मानव जाति को सम्पूर्ण विश्व में आत्मानुभूति करने के लिए प्रेरित करना। इस आदर्श को अपनाने के लिए जिस दिन भारत उठ खड़ा होगा-उस दिन उसे विश्वगुरू बनने से कोई रोक नहीं पाएगा। जिस मानव की आत्मा में विशालता आने लगती है और दृष्टिकोण व्यापक तथा विस्तृत होता जाता है-ऐसा व्यक्ति ‘भक्ति के द्वारा’ इस बात को जान लेता है कि मैं तात्विक रूप में कितना हूं, और कौन हूं? गीता के अनुसार ऐसा जान लेने से मनुष्य कभी भी अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं करता, वह सदा अपनी मर्यादाओं में रहता है और मर्यादाओं को पहचानकर ही अपने निर्णय लेता है। ऐसा व्यक्ति जब तत्त्वदर्शी हो जाता है तो वह परमपिता परमेश्वर का साक्षात्कार कर लेता है। इसे श्रीकृष्णजी ने ऐसा कहा है कि मुझे तत्व रूप में जान लेने पर वह मुझ में प्रवेश पा जाता है।
आत्मा को विशाल कर सुन मनवा नादान।
इसी से कल्याण हो जीवन बने महान।।
जो जन ईश्वर का आश्रय प्राप्त कर लेते हैं, अर्थात ईश्वर का संरक्षण जिन्हें मिल जाता है उन्हें क्या लाभ होता है? इस पर गीताकार का कहना है कि ऐसा व्यक्ति मेरा आश्रय पाकर सदा सब प्रकार के कर्मों को करता हुआ मेरे प्रसाद से, मेरी कृपा से शाश्वत अमर पद को प्राप्त करता है। इस प्रकार ईश्वर का आश्रय या संरक्षण प्राप्त करने से शाश्वत अमर पद की प्राप्ति होती है।
संकटों से पार होने का उपाय
अपने चित्त से सब कर्मों को मुझे समर्पित करके, अर्थात शुद्घ अन्त:करण से और पवित्र मन से अपने किये हुए सब कर्मों को जो लोग ईश्वर को समर्पित करके, उसे ही अपना लक्ष्य समझ लेते हैं अर्थात ईश्वर की प्राप्ति को जीवन का परम पवित्र उद्देश्य घोषित कर देते हैं, और ‘बुद्घियोग’ का आश्रय लेकर आगे बढ़ते हैं-वह ईश्वर के चित्त वाले हो जाते हैं, उनका चित्त ईश्वर में लगने लगता है। हर मनुष्य का लक्ष्य प्रकृति न होकर परमात्मा है। जो परमात्मा को खोजते हैं-वही प्रकृति को छोड़ते हैं और जो प्रकृति को पूजते हैं उनसे परमात्मा अपने आप छूट जाता है। संसार के इस नियम को हमें सदा ही ध्यान रखना चाहिए।
जो लोग अपने चित्त को ईश्वर में लगा देते हैं-उनके साथ क्या होता है? अथवा पुन: ऐसा करने का क्या लाभ मिलता है? इस पर गीताकार का कहना है कि अपने चित्त को मुझमें लगाकर तू मेरी कृपा से सब संकटों को पार कर जाएगा। श्रीकृष्णजी की बात सही है। जिसका चित्त ईश्वर में लग जाता है -उसे फिर हर स्थान पर उस परम प्यारे परमात्मा के साक्षात दर्शन होने लगते हैं। वह संसार की किसी अन्य वस्तु को खरीदने या पाने के लिए तो कहीं इधर-उधर भटक सकता है, परन्तु परमपिता परमात्मा को लेकर उसका भटकाव समाप्त हो जाता है। अपने चित्त को मुझमें लगाकर अर्थात ईश्वर में लगाकर तू (साधक) मेरी अर्थात ईश्वर की कृपा से सब संकटों को पार कर जाएगा। ऐसे साधक या व्यक्ति का संसार के आंधी, तूफान कुछ नहीं बिगाड़ सकते। उन्हें अपनी मंजिल मिलती है और वे मंजिल पाकर ही चैन की सांस लेते हैं। श्रीकृष्णजी आगे कहते हैं कि जो व्यक्ति अहंकार के कारण उनकी (परमपिता परमेश्वर की) बात को सही प्रकार नहीं मानता है-वह संसार में अधिक देर तक जीवित नहीं रह पाता और एक दिन वह नष्ट हो ही जाता है। इस प्रकार अहंकार मनुष्य का एक महाशत्रु है, इस शत्रु से बचने का मनुष्य को हरसम्भव प्रयास करते रहना चाहिए। यदि हमने अपने अन्त:करण में किसी एक महाशत्रु को भी रहने का अवसर उपलब्ध करा दिया तो हमारा यह कार्य आत्मविनाश का कार्य होगा।
प्रकृति का वेग क्या है?
यदि अहंकार के वश में होकर कोई साधक यह मानने लगे कि मैं ऐसा नहीं कर सकता या वैसा नहीं कर सकता-तो यह निश्चय व्यर्थ है। गीता का मानना है कि यदि अहंकार के वश में होकर अर्जुन तू यह मान रहा है कि मैं युद्घ नहीं करूंगा तो तेरा यह निश्चय व्यर्थ है, ‘प्रकृतिस्त्वाम् नियोक्ष्यति’-अर्थात संसार का संचालन करने वाली सत्ता तुझसे जो काम लेना चाहती है-उस काम में तुझे तेरे मन की इच्छा के विपरीत जाकर भी जबरदस्ती जोत देगी, या तेरी प्रकृति अर्थात तेरा स्वभाव तुझे युद्घ करने के लिए विवश कर देंगे।
हे कौन्तेय! अर्थात कु न्ती के पुत्र अर्जुन हमारे शरीर में हृदय नाम की वस्तु बहुत ही पवित्र होती है। उसे मनुष्य अपनी मलीन वासनाओं से जैसा चाहे बना ले, पर उसकी वास्तविक पवित्रता तो नितान्त आवश्यक है। श्रीकृष्णजी कहते हैं कि अर्जुन तू मोहवश जिस काम को करना नहीं चाहता-उसे तू अपने स्वभाव से उत्पन्न होने वाले कर्म से बंधा हुआ विवश होकर करेगा।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
alobet
vegabet giriş
vegabet giriş
restbet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
roketbet giriş
imajbet giriş
ikimisli giriş
roketbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
begaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
roketbet giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
Betkolik giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
Safirbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
roketbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
İmajbet güncel
Safirbet resmi adres
Safirbet giriş