गुरू तो बादल की तरह है, शहद की मक्खी की तरह है। जैसे-शहद की मक्खी न जाने कितने प्रकार के असंख्य पुष्पों के गर्भ से शहद के महीन कणों को अपनी सूंडी से चूसकर शहद के छत्ते में डाल देती है, उसे शहद से सराबोर कर देती है, ऐसे बादल भी न जाने कितने पोखरों, तालाबों, झरने, नदियों और सागरों से वाष्प के रूप में जलकणों को एकत्र कर आपके आंगन में बरसाता है। ठीक इसी प्रकार ‘सद्गुरू’ भी न जाने कितने ग्रंथों, पुस्तकों का गहन अध्ययन कर तथा अपने अनुभव से संचित ज्ञान का रस मनुष्य के मन-मस्तिष्क में हमेशा-हमेशा के लिए उॅंडेल देता है। जिससे मनुष्य का जीवन जटिल न रहकर सहज, सरल और रूचिकर हो जाता है। ‘गुरू’ वास्तव में एक दिव्य शक्ति है। जिस प्रकार सूर्य अपनी स्वर्णिम रश्मियों से रात्रि के गहन अंधकार को दूर कर धरती पर नया सबेरा लाता है तथा सोयी हुई और अलसायी हुई प्रकृति में नई स्फूत्र्ति, नई ऊर्जा प्रदान कर नूतन जीवन शक्ति का संचार करता है। ठीक इसी प्रकार ‘गुरू’ अपनी दिव्यशक्ति की ज्ञान रश्मियों से अज्ञान और अविद्या के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश करता है। एक अच्छा गुरू मनुष्य के मन-मस्तिष्क में सोयी हुई दिव्य शक्तियों को जाग्रत करता है, मुखरित करता है और अपने शिष्य के जीवन को दीप्तिमान करता है। 


गुरू शब्द अपने आप में गुरूतम है, पूजनीय है, वंदनीय और अभिनंदनीय है। गुरू जब अपनी विरल दिव्यता में जीता है, तो वह ज्ञान और तेज का भास्कर होता है, न जाने अपनी ज्ञान रश्मियों से कितने दीपों को प्रज्वलित करता है, ऊर्जावान करता है। इसलिए गुरू का जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अतुलनीय महत्व है। यदि गुरू की महत्ता न होती तो चौदह कलाओं के अवतार कहलाने वाले मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाने वाले भगवान राम को गुरू वशिष्ठ के आश्रम में शिक्षार्थ जाने की क्या आवश्यकता थी? इतना ही नहीं सोलह कलाओं के अवतार कहलाने वाले आप्त-पुरूष और योगेश्वर कहलाने वाले भगवान कृष्ण को भी महर्षि संदीपन के आश्रय में शिक्षार्थ जाने की क्या आवश्यकता थी? इससे स्पष्टï होता है कि गुरू का महत्व अतुलनीय है, अद्वितीय है।

आचार्य चाणक्य ने एक सामान्य बालक चंद्रगुप्त को भारत का सम्राट बना दिया, खंडित भारत को अखण्ड भारत बना दिया। इतना ही नहीं, जिसके बल और पराक्रम का लोहा विश्व विजेता यूनानी सम्राट सिकंदर ने भी माना और सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस ने अपनी बेटी कार्नहेलिया का विवाह चंद्रगुप्त के साथ कर शत्रुता भूलकर मित्रता स्थापित करली।

गुरू प्रभु-प्रदत्त एक प्रेरक शक्ति है। इसका उत्कृष्टïतम उदाहरण देखिये-घोर गरीबी के थपेड़े खाता हुआ बालक नरेन्द्र गुरू रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आने से, उनकी पावन प्रेरणा से प्रतिभापुंज स्वामी विवेकानंद बन गया। उसकी सोयी हुई दिव्य शक्तियों को अपनी दिव्यता में जीने वाले गुरू रामकृष्ण परमहंस ने पहचाना और उन्हें मुखरित किया, अपनी दिव्यता से भासित किया। बालक नरेन्द्र में कुशाग्र बुद्घि हृदय में उदारता, ऋजुता समाज और राष्टï्र के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा, वाकपटुता, वाकसंयम, प्रत्युत्तर मति और बहुमुखी प्रतिभा अप्रतिम थी, जिसे उनके गुरू रामकृष्ण परमहंस ने और भी धारदार बना दिया।

क्रमश: 

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