सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 22 ( क ) राजपुरुषों का आचरण

सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश

राजपुरुषों का आचरण

स्वामी सत्यानंद जी महाराज ने “श्रीमद दयानंद प्रकाश” की भूमिका के अंत में लिखा है – “स्वामी जी महाराज पहले महापुरुष थे जो पश्चिमी देशों के मनुष्यों के गुरु कहलाए । … जिस युग में स्वामी जी हुए उससे कई वर्ष पहले से आज तक ऐसा एक ही पुरुष हुआ है जो विदेशी भाषा नहीं जानता था, जिसने स्वदेश से बाहर एक पैर भी नहीं रखा था, जो स्वदेश के ही अन्न जल से पला था, जो विचारों में स्वदेशी था, आचारों में स्वदेशी था, भाषा और वेश में स्वदेशी था ,परंतु वीतराग और परम विद्वान होने से सब का भक्ति भाजन बना हुआ था। …
महाराज निरपेक्ष भाव से समालोचना किया करते। सब मतों पर टीका टिप्पणी का चढ़ाते। परंतु इतना करने पर भी उनमें कोई ऐसी अलौकिक शक्ति और कई ऐसे गुण थे ,जिनके कारण वे अपने समय के बुद्धिमानों के सम्मानपात्र बने हुए थे।… महाराज के उच्चतम जीवन की घटनाओं का पाठ करते समय हमें तो ऐसा प्रतीत होने लगता है कि आज तक जितने भी महात्मा हुए हैं उनके जीवनों के सभी समुज्ज्वल अंश दयानंद में पाए जाते थे। वह गुण ही न होगा जो उनके सर्व संपन्न रूप में विकसित न हुआ हो। महाराज का हिमालय की चोटियों पर चक्कर लगाना, विंध्याचल की यात्रा करना, नर्मदा के तट पर घूमना, स्थान स्थान पर साधु-संतों के दर्शन और सत्संग प्राप्त करना, मंगलमय श्रीराम का स्मरण कराता है। करणवास में करणसिंह के बिजली के समान चमकते खड़ग को देखकर भी महाराज नहीं कांपे। तलवार की अति तीक्ष्ण धार को अपनी ओर झुका हुआ अवलोकन करके भी निर्भय बने रहे और साथ ही गंभीर भाव से कहने लगे कि आत्मा अमर है, अविनाशी है। इसे कोई हनन नहीं कर सकता । यह घटना और ऐसी ही अनेक अन्य घटनाएं ज्ञान के सागर श्री कृष्ण को मानस नेत्रों के आगे मूर्तिमान बना देती हैं। अपनी प्यारी भगिनी और पूज्य चाचा की मृत्यु से वैराग्यवान होकर वन वन में कौपीनमात्रावशेष दिगंबरी दिशा में फिरना घोर तपस्या करना और अंत में मृत्युंजय महौषध को ब्रह्म समाधि में लाभ कर लेना महर्षि के जीवन का अंश बुद्धदेव के समान दिखाई देता है।
दीन दुखियों अपाहिजों और अनाथों को देखकर श्रीमद दयानंद जी क्राइस्ट बन जाते हैं। धुरंधर वादियों के सम्मुख श्री शंकराचार्य का रूप दिखा देते हैं। एक ईश्वर का प्रचार करते और विस्तृत भ्रातृभाव की शिक्षा देते हुए भगवान दयानंद जी श्रीमान मोहम्मद जी प्रतीत होने लगते हैं। ईश्वर का यशोगान करते हुए स्तुति प्रार्थना में जब प्रभु इतने निमग्न हो जाते हैं कि उनकी आंखों से परमात्म प्रेम की अविरल धारा निकल आती है, गदगद कंठ और पुलकित गात हो जाते हैं तो संतवर रामदास, कबीर, नानक, दादू, चेतन और तुकाराम का समां बंध जाता है। वे संत शिरोमणि जान पड़ते हैं। आर्यत्व की रक्षा के समय प्रातः स्मरणीय प्रताप और शिवाजी तथा गोविंद सिंह जी का रूप धारण कर लेते हैं।”
कुल मिलाकर महर्षि दयानंद जी के भीतर भारत का पूरा इतिहास दिखाई देता है। इस इतिहास में भारत के सभी इतिहास नायक विराजमान दिखाई देते हैं। अधिकांश इतिहास नायक ऐसे हैं जिनमें से किसी में कोई एक गुण प्रबलता से है, किसी में दो गुण प्रबलता से हैं ,पर स्वामी दयानंद जी महाराज अकेले ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनके भीतर अधिकांश गुण प्रबलता से उपस्थित हैं। यदि उन्हें सर्वगुण संपन्न ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में निरूपित किया जाए तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ऐसे स्वामी जी महाराज के लिये यह कदापि संभव नहीं था कि वह अपने सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास का उल्लेख ना करें या उन्हें इतिहास को समझने, बनाने व रचने की इच्छा ना हो ।

भारत में नहीं थीं प्रतियोगी परीक्षाएं

   महर्षि मनु सहित भारत के किसी भी प्राचीन राजनीतिशास्त्री ने केवल पुस्तकीय ज्ञान के आधार पर डिग्री लेने वाले लोगों को उच्च पदों पर बैठाने का समर्थन नहीं किया है। इसके विपरीत उन्होंने ऐसे लोगों को उच्च पदों पर आसीन करने की व्यवस्था की है जो मानवीय सोच और मूल्यों में विश्वास रखते हैं। उच्च पदों पर बैठने वाले लोगों के लिए आईएएस ,आईपीएस या पीसीएस जैसी किसी परीक्षा की भी व्यवस्था भारतवर्ष में नहीं थी। आज व्यवस्था के अव्यवस्थित होने का कारण केवल एक है कि आईएएस, आईपीएस या पीसीएस जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से विचारों से गिरे हुए पथभ्रष्ट युवा भी सफलता प्राप्त कर लेते हैं। दारूबाज, नशेड़ी, चरित्रहीन ,पथभ्रष्ट और धर्मभ्रष्ट युवा भी इन प्रतियोगी परीक्षाओं को उत्तीर्ण कर  भारत के अधिकारी वर्ग में सम्मिलित होते रहे हैं। इन प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाले ये युवा जब उच्च पदों पर जाकर बैठते हैं तो वे जनता का शोषण करने का काम करते हैं, क्योंकि वह पथभ्रष्ट, धर्म भ्रष्ट व चरित्र भ्रष्ट होते हैं। पूरी व्यवस्था में कोई भी यह देखने वाला नहीं है कि इन परीक्षार्थियों में सफल होने वाले लोगों के चारित्रिक गुण क्या हैं? इसका कारण केवल एक है कि चारित्रिक गुणों को देखने पर हमारी वर्तमान शिक्षा नीति ध्यान नहीं देती। प्रतियोगी परीक्षाओं में तो इस प्रकार की शिक्षा का दूर-दूर तक कोई चिह्न दिखाई नहीं देता।
गाजियाबाद जनपद की मुझे याद है कि सपा सरकार में एक यादव जिलाधिकारी आए थे, उनके बारे में यह चर्चा आम रही थी कि उन्होंने अपनी पहली नियुक्ति में और वह भी एक बार में ही सौ बीघा से अधिक जमीन गाजियाबाद शहर में इकट्ठा कर ली थी। अपनी सरकार के माध्यम से उन जिलाधिकारी महोदय ने फिर उस जमीन को किसी अच्छी योजना के अंतर्गत सम्मिलित करवाया और उसका मोटा मुआवजा लेकर रातों-रात अरबपति हो गया। यदि उस अधिकारी के भीतर चारित्रिक गुण होते तो ऐसा नहीं करता। वह उच्च पद पर बैठकर जनसेवा को अपना जीवन लक्ष्य बनाता। पर यह तभी संभव था जब प्रतियोगी परीक्षाओं में अंकों की प्राप्ति को किसी प्रतियोगी के चयन का आधार न बनाकर उसके चारित्रिक गुणों को प्राथमिकता दी जाती।

अधिकारी और मनुस्मृति

इस विषय में सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानंद जी के द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि 'राजा जिन को प्रजा की रक्षा का अधिकार देवे वे धार्मिक सुपरीक्षित विद्वान् कुलीन हों उनके आधीन प्रायः शठ और परपदार्थ हरने वाले चोर डाकुओं को भी नौकर रख के उन को दुष्ट कर्म से बचाने के लिये राजा के नौकर करके उन्हीं रक्षा करने वाले विद्वानों के स्वाधीन करके उनसे इस प्रजा की रक्षा यथावत् करे।'
 किसी भी शासन को और किसी भी देश की राजनीति को घूस अर्थात उत्कोच सबसे अधिक पथभ्रष्ट करती है। चारित्रिक रूप से दुर्बल लोग अपनी आत्मा का हनन या पतन होने से रोकने में सर्वथा अक्षम होते हैं। जिन विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्ति के काल में चरित्र बल और नैतिकता का पाठ ही नहीं पढ़ाया गया हो उनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे बड़ी नौकरियों को पाने के पश्चात कहीं पर नैतिकता का प्रदर्शन करेंगे। यद्यपि अपवाद हर सिद्धांत के होते हैं परंतु इस समय अधिकांश स्थानों पर नकारात्मक परिवेश बना हुआ है। इसका कारण केवल एक है कि जीवन में इस प्रकार नौकरियां पाने वाले युवाओं का लक्ष्य केवल और केवल धन कमाना होता है। धन कमाने से समाज में मिलने वाले सम्मान को ही वे यश और कीर्ति का प्रतीक मान लेते हैं। यद्यपि गलत ढंग से कमाए गए पैसे से कभी भी यश और कीर्ति नहीं मिलते। इतना अवश्य हो सकता है कि लोगों के मध्य जाकर ऐसे व्यक्ति को तात्कालिक आधार पर सम्मान प्राप्त होने की भ्रांति हो जाए ।  कई बार लोग ऐसे धनपतियों से धन ऐंठने के लिए भी उनकी प्रशंसा कर दिया करते हैं। किसी स्कूल या संस्था में उनसे दान प्राप्त करने के लिए उनका गुणगान कर दिया करते हैं। इससे ऐसे धनपतियों को यह भ्रांति हो जाती है कि समाज में उनका सात्विक यश और कीर्ति फैल रही है। 
आजकल संसार में शासन और प्रशासन दोनों यदि किसी एक बिंदु पर मिलकर काम कर रहे हैं तो वह भ्रष्टाचार है। जनप्रतिनिधियों को नौकरशाही पर नकेल डालने के लिए चुने जाने की परंपरा विश्व में आरंभ हुई थी। जिस लोकपाल की मांग हम करने लगे हैं, वास्तव में भारत में तो लोकपाल की नियुक्ति की परंपरा उतनी ही पुरानी है जितना पुराना विश्व का इतिहास है। भारत की राजनीतिक और इतिहास परंपरा में ऐसा लोकपाल आत्मिक और वाचिक रूप से अत्यंत पवित्र होता था। उससे जनता के साथ किसी भी प्रकार के अन्याय या आर्थिक शोषण की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी। भारत की उसी परंपरा की अनिवार्यता को अनुभव करते हुए विश्व में फ्रांस, रूस, अमेरिका जैसे देशों में लोकतंत्र के लिए क्रांति हुई। उस क्रांति की मौलिक सोच केवल यह थी कि भारत की प्राचीन परंपरा को अपनाकर जनप्रतिनिधियों के माध्यम से फिर से लोकपाल नियुक्त किए जाएं जो प्रशासन में बैठे लोगों पर नकेल डालने का काम करें।

राकेश कुमार आर्य

मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

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