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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 7 क , आर्ष -अनार्ष ग्रंथ और महर्षि दयानंद

आर्ष -अनार्ष ग्रंथ और महर्षि दयानंद

हमें क्या पढ़ना चाहिए ?- यह बात सृष्टि प्रारंभ से ही बड़ी महत्वपूर्ण रही है। कई लोग उपन्यास आदि के पढ़ने में भी समय लगाते हैं, परंतु उनका वह पुरुषार्थ व्यर्थ ही जाता है। उल्टे उनके मन मस्तिष्क में वासनात्मक बीजारोपण करके उनका अहित और कर जाता है । आज के समाज की दुरावस्था का एक कारण यह भी है कि अधिकतर लोग यह नहीं जानते कि उन्हें क्या पढ़ना चाहिए ? जीवन में सार्थकता का संचार करने वाला साहित्य ही हमारे लिए कल्याणकारी हो सकता है। अतः हमें ऐसे साहित्य के अध्ययन के लिए ही समय निकालना चाहिए। हमारे ऋषि पूर्वजों ने स्वाध्याय के लिए नित्य समय निकालने का नियम हमारे लिए निर्धारित किया है। जो व्यक्ति इस नियम का पूर्ण निष्ठा के साथ पालन करते हैं, उनके जीवन में भारी परिवर्तन आते देखे गए हैं।

समकालीन साहित्य और इतिहास

महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश को पढ़ने से पहले सत्य की खोज के लिए हजारों ग्रंथों का अध्ययन किया था, पर उन्हें उनमें आत्मिक शांति प्राप्त नहीं हुई । इस बात से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय कितनी बड़ी संख्या में अनार्ष ग्रंथ प्रकाशित हो रहे थे ? यदि आज की बात करें तो आज तो ऐसे अनार्ष ग्रंथों की बाढ़ आ चुकी है। बहुत से प्रकाशक और लेखक ऐसे हैं जो पाठकों के समय की हत्या करने और उनकी जेब पर डाका डालने के लिए पुस्तकों का प्रकाशन कर रहे हैं। उनको पढ़ने पर ऐसा कुछ भी नहीं होता जिसे सार तत्व के रूप में ग्रहण किया जा सके। मेरे पास बहुत सी पुस्तकें समीक्षा के लिए आती हैं। जिन्हें मैं कई बार लौटा देता हूं। इसका कारण केवल एक होता है कि वे पुस्तकें समाज के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालने वाली होती हैं। उनके लेखक की अनावश्यक प्रशंसा करना मैं उचित नहीं मानता।
समकालीन साहित्य का इतिहास पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जैसा साहित्य प्रकाशित हो रहा होता है वैसा ही समाज बन रहा होता है। साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। इसे यहां थोड़ी देर के लिए हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि साहित्य इतिहास का दर्पण होता है। प्राचीनकालीन इतिहास को लिखने में समकालीन साहित्य हमारी बहुत अधिक सहायता करता है। यदि इस साहित्य में उत्कृष्टता का अभाव है तो समझ लो कि तत्कालीन समाज भी वैसा ही था । जैसा समाज व साहित्य होगा वैसा ही इतिहास लिखा जाएगा।
यदि बच्चे को ‘अ’ से अनार ना पढ़ाकर ‘अग्नि ऋषि’ पढ़ाया जाएगा और ‘क’ से कबूतर न पढ़ाकर ‘कपिल ऋषि’ पढ़ाया जाएगा तो इसका अलग ही प्रभाव पड़ेगा। मध्यकालीन भारत में हमारे साहित्य में मिलावट होते होते बहुत भयानक स्तर की गिरावट आ गई । जिससे साहित्य में विकृतिकरण अत्यधिक बढ़ गया।

महर्षि दयानंद ने निर्धारित किया पाठ्यक्रम

महर्षि दयानंद जी महाराज ने इस बात को गंभीरता से समझा इसलिए उन्होंने यह निर्धारित किया कि -प्रथम पाणिनिमुनिकृतशिक्षा जो कि सूत्ररूप है उस की रीति अर्थात् इस अक्षर का यह स्थान, यह प्रयत्न, यह करण है। जैसे ‘प’ इस का ओष्ठ स्थान, स्पृष्ट प्रयत्न और प्राण तथा जीभ की क्रिया करनी करण कहाता है। इसी प्रकार यथायोग्य सब अक्षरों का उच्चारण माता, पिता, आचार्य सिखलावें। तदनन्तर व्याकरण अर्थात् प्रथम अष्टाध्यायी के सूत्रें का पाठ जैसे ‘वृद्धिरादैच्’ फिर पदच्छेद जैसे ‘वृद्धिः, आत्, ऐच् वा आदैच्’, फिर समास ‘आच्च ऐच्च आदैच्’ और अर्थ जैसे ‘आदैचां वृद्धिसंज्ञा क्रियते’ अर्थात् आ, ऐ, औ की वृद्धि संज्ञा है। ‘तः परो यस्मात्स तपरस्तादपि परस्तपरः’ तकार जिस से परे और जो तकार से भी परे हो वह तपर कहाता है। इस से क्या सिद्ध हुआ जो आकार से परे त् और त् से परे ऐच् दोनों तपर हैं। तपर का प्रयोजन यह है कि ह्र्रस्व और प्लुत की वृद्धि संज्ञा न हुई। उदाहरण (भागः) यहां ‘भज्’ धातु से ‘घञ्’ प्रत्यय के परे ‘घ्, ञ्’ की इत्संज्ञा होकर लोप हो गया। पश्चात् ‘भज् अ’ यहां जकार के पूर्व भकारोत्तर अकार को वृद्धिसंज्ञक आकार हो गया है। तो भाज् पुनः ‘ज्’ को ग् हो अकार के साथ मिलके ‘भागः’ ऐसा प्रयोग हुआ।”
महर्षि दयानंद जी महाराज बच्चे के कोमल मन पर ऐसे संस्कार अंकित कर देने के समर्थक थे जिससे वह बचपन से ही विद्वता की राह पकड़ ले। उनकी मान्यता थी कि जीवन शूद्रत्व की प्राप्ति के लिए प्राप्त नहीं हुआ है अपितु द्विज बनकर मोक्ष की प्राप्ति की जाए, इसके लिए हमें यह दुर्लभ मानव तन प्राप्त हुआ है। यही कारण था कि उन्होंने अष्टाध्यायी, धातु पाठ आदि के माध्यम से बच्चों की शिक्षा आरंभ करने की बात सत्यार्थ प्रकाश में कही है। प्रत्येक बालक के भीतर असीम ऊर्जा होती है। वह अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करते हुए यदि उसे सद ग्रंथों के अध्ययन में व्यय कर दे तो उसका जीवन धन्य हो जाता है। उसके भीतर की शूद्रता समाप्त होकर उसके पवित्र संस्कार उजागर होने लगते हैं और वह आर्यत्व की श्रेणी में आ जाता है।
संस्कृत भाषा के संबंध में हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि संसार की यही एक मात्र भाषा है जो वैज्ञानिक है। इसकी व्याकरण के सिद्धांत भी पूर्णतया वैज्ञानिक हैं, जबकि अन्य भाषाओं के साथ ऐसा नहीं है।

महाभाष्य पढ़ना भी अनिवार्य है

महर्षि कहते हैं कि तदनन्तर महाभाष्य पढ़ावे। अर्थात् जो बुद्धिमान्, पुरुषार्थी, निष्कपटी, विद्यावृद्धि के चाहने वाले नित्य पढ़ें-पढ़ावें तो डेढ़ वर्ष में अष्टाध्यायी और डेढ़ वर्ष में महाभाष्य पढ़ के तीन वर्ष में पूर्ण वैयाकरण होकर वैदिक और लौकिक शब्दो का व्याकरण से, पुनः अन्य शास्त्रो को शीघ्र सहज में पढ़ पढ़ा सकते हैं। किन्तु जैसा बड़ा परिश्रम व्याकरण में होता है वैसा श्रम अन्य शास्त्रों में करना नहीं पड़ता। और जितना बोध इनके पढ़ने से तीन वर्षों में होता है उतना बोध कुग्रन्थ अर्थात् सारस्वत, चन्द्रिका, कौमुदी, मनोरमादि के पढ़ने से पचास वर्षों में भी नहीं हो सकता , क्योंकि जो महाशय महर्षि लोगों ने सहजता से महान् विषय अपने ग्रन्थों में प्रकाशित किया है वैसा इन क्षुद्राशय मनुष्यों के कल्पित ग्रन्थों में क्योंकर हो सकता है?
इसके पश्चात दयानंद जी महाराज यास्कमुनिकृत निघण्टु और निरुक्त और तदनन्तर पिंगलाचार्यकृत छन्दोग्रन्थ को पढ़ाने की बात करते हैं। इस समय में वृत्तरत्नाकर जैसी पुस्तकें विद्यालयों में प्रचलित रही होंगी इसलिए वह इन पुस्तकों में व्यर्थ को पढ़ने में व्यर्थ ऊर्जा नष्ट करने से बचने का परामर्श देते हैं।

महर्षि की बौद्धिक महानता

स्वामी दयानंद जी महाराज एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक संस्था थे । उन्होंने एक संस्था के रूप में पूरे देश के विद्यार्थियों के लिए उस समय अपनी ओर से विद्यालयों के पाठ्यक्रम का पूरा खाका ही प्रस्तुत कर दिया है। जिससे उनकी बौद्धिक क्षमताओं और बौद्धिक मांगता का पता चलता है। यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि इस कार्य के लिए आज की सरकारों को बड़े-बड़े आयोग गठित करने पड़ते हैं। आयोगों पर सरकार को करोड़ों रुपया खर्च करना पड़ता है। सरकार का उद्देश्य होता है कि इन आयोगों के माध्यम से राष्ट्र निर्माण और व्यक्ति निर्माण की श्रेष्ठतम अध्ययन विधि का अनुसंधान आयोग के सदस्य करेंगे। परंतु जब से देश स्वाधीन हुआ है तब से लेकर आज तक ऐसा कोई भी आयोग ऐसी अध्ययन विधि स्थापित नहीं कर पाया है जिससे व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की सरकार की मंशा पूर्ण हो सके।
ऐसे आयोगों द्वारा की गई संस्तुतियों के आधार पर निर्धारित किए गए पाठ्यक्रम अपने आप में पूर्ण नहीं बन पाए हैं । आज के विद्यालयों में जारी पाठ्यक्रम में भी ऐसी अनेक कमी हैं। जो कि बच्चों के सर्वांगीण विकास में बाधा बन रही हैं। इसका कारण केवल एक है कि आज के विद्यालयों में जारी किए गए पाठ्यक्रम में तुष्टीकरण का खेल खेला जाता है। बच्चों के सर्वांगीण मानसिक विकास पर दृष्टि न रखकर इस प्रकार के पाठ्यक्रम के निर्धारण में लगे लोगों का मस्तिष्क इस बात पर अधिक काम करता है कि कैसे देश के सभी संप्रदायों को संतुष्ट किया जाए और उनकी स्वीकृति प्राप्त कर पाठ्यक्रम लागू किया जाए ? प्राचीन भारत में ऐसी तुष्टीकरण की नीति राज्य व्यवस्था में कहीं पर भी परिलक्षित नहीं होती। सर्वोत्कृष्ट विद्वानों का मंडल जनहित या प्रजाहित और प्राणी मात्र के हित में ऐसे ठोस निर्णय देते थे जिनसे बालक और बालिकाएं राष्ट्र के संस्कारित नागरिक बनकर विद्यालयों से बाहर आएं। समाज और राष्ट्र के निर्माण के प्रति पूर्णतया संकल्पित और जिम्मेदार नागरिक के रूप में आये इन विद्यार्थियों को समाज द्विज कहकर सम्मानित करता था। द्विज की उपाधि हर किसी को नहीं मिलती थी। यह उपाधि उन्हीं सम्मानित और श्रेष्ठ नागरिकों को प्राप्त होती थी जो वैदिक अहिंसक समाज की स्थापना के प्रति संकल्पित होते थे।

मनुस्मृति , बाल्मीकि रामायण और महाभारत

स्वामी दयानंद जी महाराज भी यहां पर प्राचीन भारत की उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए विद्यालयों के लिए अपनी ओर से पाठ्यक्रम निर्धारित कर रहे हैं। वह छात्र छात्राओं को शिक्षा प्राप्ति के उपरांत पैसे कमाने की मशीन बनाकर छोड़ देने के समर्थक नहीं थे। अपने उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने यह भी लिखा है कि मनुस्मृति, वाल्मीकि रामायण और महाभारत के उद्योगपर्वान्तर्गत विदुरनीति आदि के अच्छे-अच्छे प्रकरण जिनसे दुष्ट व्यसन दूर हों और उत्तमता सभ्यता प्राप्त हो वैसे को काव्यरीति से अर्थात् पदच्छेद, पदार्थोक्ति, अन्वय, विशेष्य विशेषण और भावार्थ को बच्चों को समझाने के लिए अध्यापकों को विशेष निर्देश देते हैं। 
ऋषि दयानंद जी की इच्छा थी कि विद्यालयों में बच्चों को पूर्वमीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त अर्थात् जहाँ तक बन सके वहाँ तक ऋषिकृत व्याख्यासहित अथवा उत्तम विद्वानों की सरल व्याख्यायुक्त छः शास्त्र अभी पढ़ाये जाएं उनकी यह भी मान्यता थी कि विद्यालयों में छात्र छात्राओं को  ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक इन दश उपनिषदों का अध्ययन भी कराया जाए। उपनिषद वास्तव में भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बहुत बड़ी धरोहर हैं। अनेक विदेशी विद्वानों ने भी इनके भीतर प्रदान की गई विद्या की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। शॉप इन हावड़ा पिन हावर जैसा विदेशी विद्वान जमीन के मर्म को समझ गया था तो इनको सिर पर रखकर के नाचा था। क्योंकि उसको यह पता चल गया था कि जीवन जिस उद्देश्य के लिए प्राप्त हुआ है उसको समझने में केवल और केवल यह उपनिषद ही सहायक हो सकते हैं। औरंगजेब जैसे क्रूर मुस्लिम मुगल बादशाह का भाई दारा शिकोह इन ग्रंथों के पढ़ने से अत्यंत उदार चित वाला हो गया था और उसने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए इनका अरबी फारसी में अनुवाद भी करवाया था।
ऋषि इन सभी ग्रंथों के अध्ययन का काल भी निश्चित करते हैं।  ऐतरेय, शतपथ, साम और गोपथ ब्राह्मणों के सहित चारों वेदों के स्वर, शब्द, अर्थ, सम्बन्ध तथा क्रियासहित पढ़ने पढ़ाने को भी वह आवश्यक बताते हैं ।

आयुर्वेद और धनुर्वेद की अनिवार्यता

सब वेदों को पढ़ के आयुर्वेद अर्थात् जो चरक, सुश्रुत आदि ऋषि मुनि-प्रणीत वैद्यक शास्त्र है, उस को अर्थ, क्रिया, शस्त्र, छेदन, भेदन, लेप, चिकित्सा, निदान, औषध, पथ्य, शारीर, देश, काल और वस्तु के गुण ज्ञानपूर्वक 4 वर्ष के भीतर पढ़ें पढ़ावें।
आजकल मनुष्य का स्वास्थ्य चौपट हो गया है। इसका कारण केवल एक है कि विद्यालयों में चरक सुश्रुत आदि वैद्यक शास्त्रों को पढ़ाने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है। मानव स्वास्थ्य नीलाम करके किन्हीं खास कंपनियों के नाम कर दिया गया है। वे कंपनियां अपना मुनाफा कमाने के उद्देश्य से प्रेरित होकर मानव के स्वास्थ्य को चौपट करने की नई नई विधियों पर काम करती रहती हैं। आज की इस विश्व व्यवस्था में सब चीजों का व्यापारीकरण हो गया है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि मानव का स्वास्थ्य भी व्यापारीकरण की इस प्रक्रिया की भेंट चढ़ गया है।
तदनन्तर धनुर्वेद अर्थात् राजसम्बन्धी काम करना है । इसके दो भेद, एक निज राजपुरुषसम्बन्धी और दूसरा प्रजासम्बन्धी होता है। राजकार्य में सब सेना के अध्यक्ष शस्त्रास्त्रविद्या नाना प्रकार के व्यूहों का अभ्यास अर्थात् जिसको आजकल ‘कवायद’ कहते हैं। जो कि शत्रुओं से लड़ाई के समय में क्रिया करनी होती है उन को यथावत् सीखें और जो जो प्रजा के पालने और वृद्धि करने का प्रकार है उन को सीख के न्यायपूर्वक सब प्रजा को प्रसन्न रक्खें दुष्टों को यथायोग्य दण्ड, श्रेष्ठों के पालन का प्रकार सब प्रकार सीख लें।
इस राजविद्या को दो-दो वर्ष में सीख कर गान्धर्ववेद कि जिस को गानविद्या कहते हैं। उस में स्वर, राग, रागिणी, समय, ताल, ग्राम, तान, वादित्र, नृत्य, गीत आदि को यथावत् सीखें परन्तु मुख्य करके सामवेद का गान वादित्रवादनपूर्वक सीखें और नारदसंहिता आदि जो-जो आर्ष ग्रन्थ हैं उनको पढ़ें परन्तु भड़वे वेश्या और विषयासक्तिकारक वैरागियों के गर्दभ शब्दवत् व्यर्थ आलाप कभी न करें।

अर्थवेद पर स्वामी जी के विचार

स्वामी दयानंद जी महाराज किसी भी प्रकार से निकृष्टता का बोध कराने वाली शिक्षा को देने के पक्षधर नहीं थे। विषय वासना और अश्लीलता को प्रोत्साहित करने वाले साहित्य को वह साहित्य ही नहीं मानते थे । सच भी यही है कि जिस साहित्य से युवाओं का चरित्र निर्माण न होकर चरित्र भ्रष्ट होता हो वह साहित्य साहित्य होता ही नहीं है।
स्वामी जी महाराज ने अर्थ की प्राप्ति के लिए भी विधान किया है। वैसे भी अर्थ हमारे जीवन संचालन के लिए बहुत आवश्यक है। इसके उपरांत भी अर्थ की शुचिता पर महर्षि दयानंद ने विशेष ध्यान दिया है। इस संबंध में उनका कहना है कि अर्थवेद कि जिस को शिल्पविद्या कहते हैं उस को पदार्थ गुण-विज्ञान क्रियाकौशल, नानाविध पदार्थों का निर्माण, पृथिवी से लेके आकाश पर्यन्त की विद्या को यथावत् सीखके अर्थ अर्थात् जो ऐश्वर्य को बढ़ाने वाला है, उस विद्या को सीख के दो वर्ष में ज्योतिषशास्त्र सूर्यसिद्धान्तादि जिस में बीजगणित, अंक, भूगोल, खगोल और भूगर्भविद्या है इस को यथावत् सीखें। तत्पश्चात् सब प्रकार की हस्तक्रिया, यन्त्रकला आदि को सीखें, परन्तु जितने ग्रह, नक्षत्र, जन्मपत्र, राशि, मुहूर्त आदि के फल के विधायक ग्रन्थ हैं उन को झूठ समझ के कभी न पढ़ें और पढ़ावें।
ऐसा प्रयत्न पढ़ने और पढ़ाने वाले करें कि जिस से तीस व चौंतीस वर्ष के भीतर समग्र विद्या उत्तम शिक्षा प्राप्त होके मनुष्य लोग कृतकृत्य होकर सदा आनन्द में रहें। जितनी विद्या इस रीति से तीस वा चौंतीस वर्षों में हो सकती है उतनी अन्य प्रकार से शत-वर्ष में भी नहीं हो सकती। ऋषिप्रणीत ग्रन्थों को इसलिये पढ़ना चाहिये कि वे बड़े विद्वान् सब शास्त्रवित् और धर्मात्मा थे और अनृषि अर्थात् जो अल्पशास्त्र पढ़े हैं और जिन का आत्मा पक्षपातसहित है, उनके बनाए हुए ग्रन्थ भी वैसे ही हैं। पूर्वमीमांसा पर व्यासमुनिकृत व्याख्या, वैशेषिक पर गोतममुनिकृत, न्यायसूत्र पर वात्स्यायनमुनिकृत भाष्य, पतञ्जलिमुनिकृतसूत्र पर व्यासमुनिकृत भाष्य, कपिलमुनिकृत सांख्यसूत्र पर भागुरिमुनिकृत भाष्य, व्यासमुनिकृत वेदान्तसूत्र पर वात्स्यायनमुनिकृत भाष्य अथवा बौधायनमुनिकृत भाष्य वृत्ति सहित पढ़ें पढ़ावें। इत्यादि सूत्रें को कल्प अंग में भी गिनना चाहिये।

डॉ राकेश कुमार आर्य

मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

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