सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 2 क गर्भाधान संस्कार का महत्व

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गर्भाधान संस्कार का महत्व

प्राचीन भारत में संतानोत्पत्ति कोई खेल खेल में किया गया कार्य नहीं होता था, अपितु इस क्रिया को इस प्रकार संपन्न किया जाता था कि जैसे यह माता-पिता का विशेष और सबसे पवित्र कर्तव्य हो। जिसके निर्वाह के माध्यम से समाज और संसार को उत्तम संतान देकर वे एक महान ऋण से उऋण हो रहे हैं। बच्चे के निर्माण की योजना पर गर्भाधान संस्कार से ही उस समय कार्यारंभ हो जाता था । जबकि आजकल हम उसे विद्यालय में भेजने के पश्चात ही उसके निर्माण पर ध्यान देते हैं। भारत के ऋषि महात्माओं ने इस बात को बड़ी गंभीरता से समझा कि आने वाला बच्चा राष्ट्र का एक जिम्मेदार नागरिक बनेगा, जिसके लिए माता-पिता परिवार और समाज के सभी लोग मिलकर आने वाले अतिथि के स्वागत की तैयारी करते थे। वे इस बात पर पूरा ध्यान रखते थे कि वह बच्चे समाज की एक महत्वपूर्ण और सम्मानित इकाई कैसे बने ? एक बच्चे के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की उस योजना पर प्रकाश डालते हुए महर्षि दयानंद हमें यह बताते हैं कि उस समय के भारत में माता और धाय मां के स्वस्थ और उत्तम गुणकारी दूध पर घर परिवार के लोग विशेष ध्यान देते थे। जिसके लिए मां और धाय को विशेष मेवे आदि खिलाए जाते थे।
महर्षि दयानंद लिखते हैं कि :- “ऐसा पदार्थ उस की माता वा धायी खावे कि जिस से दूध में भी उत्तम गुण प्राप्त हों। प्रसूता का दूध छः दिन तक बालक को पिलावे। पश्चात् धायी पिलाया करे परन्तु धायी को उत्तम पदार्थों का खान पान माता-पिता करावें।”

माता का कर्तव्य

माता अपनी संतान को सुसभ्य और सुसंस्कारित बनाने के लिए किस प्रकार एक प्राचार्या या विश्वविद्यालय की कुलपति का कर्तव्य निर्वाह कर सकती है ? – इसको स्पष्ट करते हुए स्वामी जी लिखते हैं :-
“बालकों को माता सदा उत्तम शिक्षा करे, जिससे सन्तान सभ्य हों और किसी अंग से कुचेष्टा न करने पावें। जब बोलने लगें तब उसकी माता बालक की जिह्वा जिस प्रकार कोमल होकर स्पष्ट उच्चारण कर सके वैसा उपाय करे कि जो जिस वर्ण का स्थान, प्रयत्न अर्थात् जैसे ‘प’ इसका ओष्ठ स्थान और स्पृष्ट प्रयत्न दोनों ओष्ठों को मिलाकर बोलना; ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत अक्षरों को ठीक-ठीक बोल सकना। मधुर, गम्भीर, सुन्दर स्वर, अक्षर, मात्र, पद, वाक्य, संहिता अवसान भिन्न-भिन्न श्रवण होवे। जब वह कुछ-कुछ बोलने और समझने लगे तब सुन्दर वाणी और बड़े, छोटे, मान्य, पिता, माता, राजा, विद्वान् आदि से भाषण, उनसे वर्त्तमान और उनके पास बैठने आदि की भी शिक्षा करें जिस से कहीं उन का अयोग्य व्यवहार न हो के सर्वत्र प्रतिष्ठा हुआ करे। जैसे सन्तान जितेन्द्रिय, विद्याप्रिय और सत्संग में रुचि करें वैसा प्रयत्न करते रहें। व्यर्थ क्रीडा, रोदन, हास्य, लड़ाई, हर्ष, शोक, किसी पदार्थ में लोलुपता, ईर्ष्या, द्वेषादि न करें। उपस्थेन्द्रिय से स्पर्श और मर्दन से वीर्य की क्षीणता, नपुंसकता होती और हस्त में दुर्गन्ध भी होता है इससे उसका स्पर्श न करें। सदा सत्यभाषण शौर्य, धैर्य, प्रसन्नवदन आदि गुणों की प्राप्ति जिस प्रकार हो, करावें।
जब पांच-पांच वर्ष के लड़का लड़की हों तब देवनागरी अक्षरों का अभ्यास करावें। अन्य देशीय भाषाओं के अक्षरों का भी। उसके पश्चात् जिन से अच्छी शिक्षा, विद्या, धर्म, परमेश्वर, माता, पिता, आचार्य, विद्वान्, अतिथि, राजा, प्रजा, कुटुम्ब, बन्धु, भगिनी, भृत्य आदि से कैसे-कैसे वर्त्तना इन बातों के मन्त्र, श्लोक, सूत्र, गद्य, पद्य भी अर्थ सहित कण्ठस्थ करावें। जिन से सन्तान किसी धूर्त के बहकाने में न आवें और जो-जो विद्या, धर्मविरुद्ध भ्रान्तिजाल में गिराने वाले व्यवहार हैं उनका भी उपदेश कर दें , जिस से भूत प्रेत आदि मिथ्या बातों का विश्वास न हो ।”
आज के भारत के समाज के संदर्भ में यह बात बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज की पढ़ी-लिखी महिलाएं भूत प्रेत और अंधविश्वासों में भटकी हुई हैं। जब उनका मानस स्वयं ही भटकाव का शिकार है तो वह कैसे सुसंस्कारित बच्चों का निर्माण कर सकती हैं ? यह बात विचारणीय है। माता इस प्रकार के भटकाव का शिकार न हों, इसलिए हमारे प्राचीन ऋषियों ने माता बहनों को वेद पढ़ने का अधिकार पहले दिन से दिया था। जिसे कुछ मक्कार लोगों ने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए बीच में आकर छीन लिया। महर्षि दयानंद का नारी शक्ति पर यह बहुत बड़ा उपकार है कि उन्होंने नारी को फिर से वेद पढ़ने का अधिकार प्रदान किया।

भूत किसे कहते हैं ?

महर्षि दयानंद ने भारत के प्राचीन उत्कृष्ट समाज के बारे में बताते हुए कहा है कि उस समय लोग जब शरीर का दाह हो चुका होता था तो उसे भूत कहते थे अर्थात अमुक नामक व्यक्ति था। वह कहते हैं कि :-

गुरोः प्रेतस्य शिष्यस्तु पितृमेधं समाचरन्।
प्रेतहारैः समं तत्र दशरात्रेण शुद्ध्यति।। मनु०।।

अर्थ-जब गुरु का प्राणान्त हो तब मृतक शरीर जिस का नाम प्रेत है उस का दाह करनेहारा शिष्य प्रेतहार अर्थात् मृतक को उठाने वालों के साथ दशवें दिन शुद्ध होता है। और जब उस शरीर का दाह हो चुका तब उस का नाम भूत होता है अर्थात् वह अमुक नामक पुरुष था। जितने उत्पन्न हों, वर्त्तमान में आ के न रहें वे भूतस्थ होने से उन का नाम भूत है। ऐसा ब्रह्मा से लेके आज पर्यन्त के विद्वानों का सिद्धान्त है।”
इसका अभिप्राय है कि प्राचीन भारतीय समाज में जिस प्रकार आज भूत प्रेत की व्याख्या की जाती है या उनका अस्तित्व माना जाता है, ऐसा कोई पाखंड या ढोंग नहीं था। आज जो लोग इस प्रकार के ढोंग पाखंड में फंसे हुए हैं, उनके इस प्रकार के पाखंडी आचरण से अंधविश्वास को प्रोत्साहन मिलता है। जिससे समाज में लोगों की मानसिकता भी कायरता वाली बनती है। भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के भूत प्रेत संबंधी महर्षि दयानंद जी द्वारा उल्लिखित वैदिक और बुद्धि संगत अर्थ को हमें समझने की आवश्यकता है। इसको समझने से यह स्पष्ट हो जाएगा कि भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में भूत प्रेत जैसी भ्रांतिजनक अवधारणाओं के लिए कोई स्थान नहीं था।
दितीय समुल्लास के माध्यम से महर्षि दयानंद ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि राजा और प्रजा दुखी हैं तो वे ग्रहों का फल न होकर पाप पुण्य के फल के कारण दुखी हैं। जिसका अभिप्राय है कि प्राचीन भारत किसी भी प्रकार के ग्रहों आदि के चक्कर में नहीं पड़ता था, बल्कि पुरुषार्थ और उद्यमशीलता पर विश्वास रखता था ।

ग्रह – चाल, जन्मपत्री आदि

महर्षि ग्रहों की चाल से मुक्त कर समाज को पुरुषार्थी और उद्यमशील बनाने के लिए ऐसा लिखते हैं और साथ ही यह भी बताते हैं कि इस संबंध में ज्योतिष शास्त्र के साथ फलित ज्योतिष को जोड़ना भी पूर्णतया झूठ है। ज्योतिष शास्त्र में अंक बीज रेखागणित यह सब विद्या हैं ,अन्य मिथ्या है।
जन्मपत्री बनाने को भी महर्षि दयानंद प्राचीन भारत की सनातन परंपरा के विरुद्ध मानते हैं। जन्मपत्री से जुड़े पाखंड और अंधविश्वासों की वह जमकर आलोचना करते हैं। उनकी आलोचना का उद्देश्य केवल एक है की वर्तमान भारत के लोग इस प्रकार के पाखंड और अंधविश्वास से मुक्त हों।
स्वामी जी द्वितीय समुल्लास में लिखते हैं कि सब मिथ्या व्यवहारों को छोड़ कर धार्मिक, सब देश के उपकारकर्त्ता, निष्कपटता से सब को विद्या पढ़ाने वाले, उत्तम विद्वान् लोगों का प्रत्युपकार करना जैसा वे जगत् का उपकार करते हैं, इस काम को कभी न छोड़ना चाहिये। और जितनी लीला रसायन, मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि करना कहते हैं उन को भी महापामर समझना चाहिये।
इत्यादि मिथ्या बातों का उपदेश बाल्यावस्था ही में सन्तानों के हृदय में डाल दें कि जिससे स्वसन्तान किसी के भ्रमजाल में पड़ के दुःख न पावें और वीर्य की रक्षा में आनन्द और नाश करने में दुःखप्राप्ति भी जना देनी चाहिये। जैसे- ‘देखो जिस के शरीर में सुरक्षित वीर्य रहता है तब उस को आरोग्य, बुद्धि, बल, पराक्रम बढ़ के बहुत सुख की प्राप्ति होती है। इसके रक्षण में यही रीति है कि विषयों की कथा, विषयी लोगों का संग, विषयों का ध्यान, स्त्री का दर्शन, एकान्त सेवन, सम्भाषण और स्पर्श आदि कर्म से ब्रह्मचारी लोग पृथक् रह कर उत्तम शिक्षा और पूर्ण विद्या को प्राप्त होवें। जिसके शरीर में वीर्य नहीं होता वह नपुंसक महाकुलक्षणी और जिस को प्रमेह रोग होता है वह दुर्बल, निस्तेज, निर्बुद्धि, उत्साह, साहस, धैर्य, बल, पराक्रमादि गुणों से रहित होकर नष्ट हो जाता है। जो तुम लोग सुशिक्षा और विद्या के ग्रहण, वीर्य की रक्षा करने में इस समय चूकोगे तो पुनः इस जन्म में तुम को यह अमूल्य समय प्राप्त नहीं हो सकेगा। जब तक हम लोग गृहकर्मों के करने वाले जीते हैं तभी तक तुम को विद्या-ग्रहण और शरीर का बल बढ़ाना चाहिये।’ इसी प्रकार की अन्य-अन्य शिक्षा भी माता और पिता करें।”

बालकों की जीवन चर्या

महर्षि ने ‘मातृमान् पितृमान्’ शब्द के माध्यम से स्पष्ट किया है कि जन्म से ५वें वर्ष तक बालकों को माता, ६ वर्ष से ८वें वर्ष तक पिता शिक्षा प्रदान करें और ९वें वर्ष के आरम्भ में द्विज अपने सन्तानों का उपनयन करके आचार्य कुल में अर्थात् जहां पूर्ण विद्वान् और पूर्ण विदुषी स्त्री शिक्षा और विद्यादान करने वाली हों वहां लड़के और लड़कियों को भेज दें और शूद्रादि वर्ण उपनयन किये विना विद्याभ्यास के लिये गुरुकुल में भेज दें। प्राचीन काल में हमारी यही सामाजिक व्यवस्था थी। बच्चों के संस्कारों के निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाता था। जिसके लिए सबसे पहले माता-पिता और उसके पश्चात आचार्य का दायित्व निर्धारित किया गया था। सुशिक्षित और सुसंस्कारित संतान के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की योजना को फलीभूत किया जाता था। परिवार राष्ट्र का लघु स्वरूप था। समाज में ये संस्कार फलीभूत होते थे। इसका लाभ राष्ट्र और राष्ट्रवासियों को मिलता था। उस समय भारत वर्ष में शिक्षा ग्रहण करते समय विद्यार्थियों के प्रति किसी प्रकार का लाड प्यार उचित नहीं माना जाता था। उस समय लाड़न के स्थान पर ताड़न को अधिमान दिया जाता था।
इसका समर्थन करते हुए महर्षि दयानंद कहते हैं कि इसमें व्याकरण महाभाष्य का प्रमाण है-

सामृतैः पाणिभिर्घ्नन्ति गुरवो न विषोक्षितैः।
लालनाश्रयिणो दोषास्ताडनाश्रयिणो गुणाः।।

अर्थ-जो माता, पिता और आचार्य, सन्तान और शिष्यों का ताड़न करते हैं वे जानो अपने सन्तान और शिष्यों को अपने हाथ से अमृत पिला रहे हैं और जो सन्तानों वा शिष्यों का लाड़न करते हैं वे अपने सन्तानों और शिष्यों को विष पिला के नष्ट भ्रष्ट कर देते हैं। क्योंकि लाड़न से सन्तान और शिष्य दोषयुक्त तथा ताड़ना से गुणयुक्त होते हैं।”

आजकल हम समाज में देख रहे हैं कि बच्चे हठीले होते जा रहे हैं। इसका कारण केवल एक है कि स्कूल में उनकी ताड़ना को पूर्णतया प्रतिबंधित कर दिया गया है। मैदानी क्षेत्रों में यदि नदी के वर्षा जल को बांध से बांधा नहीं जाएगा तो वह बहुत अधिक तहस-नहस मचाता है। कई बार अधिक पानी तट बंध को तोड़कर भी गांव के गांवों को बहाकर ले जाता है । यही स्थिति बालकपन की ऊर्जा की होती है। यदि उसे ताड़ना के माध्यम से बांधा नहीं गया तो वह किसी भी क्षेत्र में टूटकर तहस नहस मचा सकती है। शिक्षा ऊर्जा को समन्वित कर एक सही दिशा देने का उचित माध्यम है। इसलिए शिक्षा के काल में ताड़ना रूपी बांध बनाना बहुत आवश्यक है। बिजली अर्थात ऊर्जा का विकास या निर्माण बांध बनाने से ही संभव है। इसी प्रकार ताड़ना के बाद से ही ऊंचे संस्कार प्राप्त बालक के जीवन में ही ऊर्जा का समुचित विकास होता है। जिससे वह तेजस्वी बनता है। तेजस्वी बालक तेजस्वी नागरिकों का और तेजस्वी नागरिक तेजस्वी राष्ट्र का निर्माण करते हैं।

सत्यार्थ प्रकाश का समष्टि रूप

सत्यार्थ प्रकाश व्यष्टि से समष्टि के सुव्यवस्थित स्वरूप का प्रतिपादक ग्रंथ है । अपनी इस योजना पर विचार करते हुए महर्षि स्पष्ट करते हैं कि “सदा सत्यभाषण और सत्यप्रतिज्ञायुक्त सब को होना चाहिये। किसी को अभिमान करना योग्य नहीं, क्योंकि ‘अभिमानः श्रियं हन्ति’ यह विदुरनीति का वचन है। जो अभिमान अर्थात् अहंकार है वह सब शोभा और लक्ष्मी का नाश कर देता है, इस वास्ते अभिमान करना न चाहिये। छल, कपट वा कृतघ्नता से अपना हीे हृदय दुःखित होता है तो दूसरे की क्या कथा कहनी चाहिये। छल और कपट उसको कहते हैं जो भीतर और बाहर और दूसरे को मोह में डाल और दूसरे की हानि पर ध्यान न देकर स्वप्रयोजन सिद्ध करना।
‘कृतघ्नता’ उस को कहते हैं कि किसी के किए हुए उपकार को न मानना। क्रोधादि दोष और कटुवचन को छोड़ शान्त और मधुर वचन ही बोले और बहुत बकवाद न करे। जितना बोलना चाहिये उससे न्यून वा अधिक न बोले। बड़ों को मान्य दे, उन के सामने उठ कर जा के उच्चासन पर बैठावे, प्रथम ‘नमस्ते’ करे। उनके सामने उत्तमासन पर न बैठे। सभा में वैसे स्थान में बैठे जैसी अपनी योग्यता हो और दूसरा कोई न उठावे। विरोध किसी से न करे। सम्पन्न होकर गुणों का ग्रहण और दोषों का त्याग रक्खें। सज्जनों का संग और दुष्टों का त्याग, अपने माता, पिता और आचार्य की तन, मन और धनादि उत्तम-उत्तम पदार्थों से प्रीतिपूर्वक सेवा करें।”
इस छोटे से उद्धरण में स्वामी जी महाराज ने भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बहुत ही सुंदर सी तस्वीर प्रस्तुत की है। यदि ऐसी स्थिति समाज की आज भी बन जाए तो आनंद आ जाएगा। भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व्यष्टि से समझती की ओर चलता है और समझती रूप को सुंदर सुव्यवस्थित बनाकर सबके लिए आनंद की वर्षा का स्रोत बन जाता है। आनंद के इस स्त्रोत को पाना वैसे तो संपूर्ण मानव समाज का उद्देश्य है, पर जिस भारत ने इस आनंद के स्रोत को सब के लिए प्रवाहित किया उसे तो अपने इस स्रोत पर गर्व और गौरव करने का भी अधिकार है।
डा० ए०एम० अल्तेकर के अनुसार- “प्राचीन भारत में सम्भवतः 400 ई० पूर्व शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी। उस समय तक बालक का परिवार ही उसकी शिक्षा का केन्द्र था।”
इस प्रकार के आरोप भारत के विषय में लगाए गए हैं। जबकि भारत सृष्टि के आरंभ से ही शिक्षा के प्रति समर्पित रहा है।
सच ये है कि प्राचीन भारत में शिक्षा सबके लिए अनिवार्य थी। तब एक गांव में एक आचार्य – एक गुरुकुल , एक गांव एक विद्यालय अथवा एक गुरुकुल, एक गांव एक वैद्य की उत्कृष्ट सामाजिक व्यवस्था थी । जिसमें वैद्य लोग नि:स्वार्थ भाव से लोगों का रोगोपचार करते थे। जिसे वह अपना सबसे पवित्र धर्म मानते थे। इसी प्रकार गुरु भी शिक्षा को बेचता नहीं था। लोग भी गुरु जी या आचार्य जी का अपनी ओर से स्वयं ही ध्यान रखते थे। गुरुकुल में और गुरु के आश्रम में लोग स्वेच्छा से भरपूर दान दिया करते थे। जिससे उनके पास किसी प्रकार की दरिद्रता फटकने नहीं पाती थी। वे निश्चिंत भाव से स्वयं को सम्मानित समझते हुए विद्या दान दिया करते थे। उस समय अशिक्षित माता पिता की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। प्रत्येक माता-पिता से भी यह अपेक्षा थी कि वे अपने बच्चों को अवश्य ही गुरुकुल भेजेंगे। सर्वत्र शांति और सुव्यवस्था का बोलबाला था। तभी तो महर्षि दयानंद जी ने भी लिखा है कि :–

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये वको यथा ।।

अर्थात वे माता और पिता अपने सन्तानों के पूर्ण वैरी हैं जिन्होंने उन को विद्या की प्राप्ति न कराई, वे विद्वानों की सभा में वैसे तिरस्कृत और कुशोभित होते हैं जैसे हंसों के बीच में बगुला। यही माता, पिता का कर्त्तव्य कर्म परमधर्म और कीर्ति का काम है जो अपने सन्तानों को तन, मन, धन से विद्या, धर्म, सभ्यता और उत्तम शिक्षायुक्त करना।”
प्राचीन भारत की सामाजिक व्यवस्था को अपनी शोध का विषय बनाकर उसके आधार पर भारतीय इतिहास को समग्रता का पुंज बनाना समय की आवश्यकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

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