सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 2 क

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शिक्षा संस्कार और सत्यार्थ प्रकाश

महर्षि दयानंद जी महाराज ने आर्यों के गौरवपूर्ण अतीत को ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के प्रत्येक पृष्ठ पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया है । उनका यह प्रयास उज्ज्वल भारत के उज्ज्वल भविष्य की स्वर्णिम योजना का एक खाका माना जाना चाहिए। उन्होंने अतीत को वर्तमान के मंच पर प्रस्तुत कर भविष्य की ओर सबका ध्यान आकृष्ट करने हेतु हम सबका आवाहन किया है।
हमें इतिहास के संदर्भ में यह भी समझना चाहिए कि इतिहास किसी राजनीतिक व्यक्तित्व या शासक के द्वारा केवल मारकाट मचाने या अपने साम्राज्य विस्तार की लिप्सा को शांत करने हेतु किए गए बड़े-बड़े युद्धों के विवरण का नाम नहीं है। इतिहास इससे बहुत कुछ आगे बढ़कर है। किसी देश के शासक वर्ग या निवासियों के द्वारा अपनाई गई किसी राजनीतिक कार्यशैली और कार्य व्यवहार से ही किसी राष्ट्र का निर्माण नहीं होता है। हमारा मानना है कि किसी भी देश के सांस्कृतिक इतिहास को समेटने से ही उसका वास्तविक और पूर्ण इतिहास लिखा जाना संभव है। स्वामी दयानंद जी महाराज ने अपने अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में भारत के स्वर्णिम अतीत पर जिस प्रकार स्वर्णिम शब्दों के माध्यम से प्रकाश डाला है, यदि उसको आधार बनाकर भारत का इतिहास लिखा जाए तो अपने स्वर्णिम इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों के आधार पर ही भारत आज के विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता प्राप्त कर सकता है।

ऋषि महात्माओं का योगदान

भारत के स्वर्णिम अतीत में अनेक ऋषि, महात्मा, योगीजन खड़े हैं। जिन्होंने भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के निर्माण में अपना अप्रतिम योगदान दिया। उनके इसी प्रकार के अप्रतिम योगदान के चलते भारत और विश्व में दीर्घ काल तक शांति का परिवेश बना रहा। उनकी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्था के चलते यह संभव हो पाया। इसी कारण हम यह मानते हैं कि भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के इतिहास के लेखन के समय भारत की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्था को भी इतिहास का एक अंग बनाया जाना चाहिए।
महर्षि दयानंद जी महाराज ने सत्यार्थ प्रकाश के माध्यम से भारत की प्राचीन सामाजिक ,आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्था का बहुत ही उत्तम स्वरूप प्रस्तुत किया है। जिसे हमें केवल इस दृष्टिकोण से नहीं पढ़ना चाहिए कि ‘सत्यार्थ प्रकाश’ हमारा आध्यात्मिक गुरु हो सकता है। इसके विपरीत हमें ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का अध्ययन इस दृष्टिकोण से भी करना चाहिए कि प्राचीन भारत अपने इस वैभव और गौरव के साथ जीता था और उसे हम आज के संदर्भ में किस प्रकार यथार्थ के धरातल पर उतार सकते हैं ? महर्षि दयानंद जी का भी यही मंतव्य था । इसलिए उन्होंने भारत की प्राचीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक व्यवस्था को बहुत उत्तमता से इस ग्रंथ में प्रस्तुत किया है। भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक व्यवस्था के इस उत्तम प्रस्तुतीकरण से भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को गंभीरता से समझा जा सकता है।
महर्षि दयानंद जी महाराज किसी भी परिवार ,समाज और राष्ट्र के निर्माण में आचार्य, माता और पिता की भूमिका को बहुत अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। प्राचीन भारत में सुव्यवस्थित विश्व निर्माण योजना को साकार रूप देने के लिए इन तीनों का समाज में विशेष और सम्मान पूर्ण स्थान था। माता पिता और आचार्य जितने उत्तम होंगे उतनी ही उत्तम संतान से उत्तम परिवार, समाज और राष्ट्र का निर्माण होता है। किसी भी राष्ट्र के निर्माण के मूल में इन तीनों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। जिसे भुलाया नहीं जा सकता। यदि यह तीनों निकृष्ट श्रेणी के होंगे तो उत्तम परिवार, समाज और राष्ट्र का निर्माण असंभव है। आज के पश्चिमी जगत की नकल करने वाली माता बहनें इस पर विशेष ध्यान दें। क्योंकि भारतवर्ष में माताएं अपना संयम – नियम तोड़ रही हैं। पिता और आचार्य भी अपने पद से भ्रष्ट दायित्व से विमुख हैं। उसी का परिणाम है कि भारत इस समय उत्तम परिवार ,समाज और राष्ट्र के निर्माण के अपने संकल्प से दूर जा चुका है।
माता – पिता और आचार्य की महत्ता को स्वीकार करते हुए स्वामी जी महाराज सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय समुल्लास के प्रारंभ में ही लिखते हैं कि :-

मातृमान् पितृमानाचार्यवान् पुरुषो वेद।

“यह शतपथ ब्राह्मण का वचन है। वस्तुतः जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात् एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य होवे तभी मनुष्य ज्ञानवान् होता है। वह कुल धन्य ! वह सन्तान बड़ा भाग्यवान् ! जिसके माता और पिता धार्मिक विद्वान् हों। जितना माता से सन्तानों को उपदेश और उपकार पहुंचता है ,उतना किसी से नहीं। जैसे माता सन्तानों पर प्रेम, उनका हित करना चाहती है, उतना अन्य कोई नहीं करता । इसीलिए (मातृमान्) अर्थात् ‘प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्य स मातृमान्’ धन्य वह माता है कि जो गर्भाधान से लेकर जब तक पूरी विद्या न हो तब तक सुशीलता का उपदेश करे। माता और पिता को अति उचित है कि गर्भाधान के पूर्व, मध्य और पश्चात् मादक द्रव्य, मद्य, दुर्गन्ध, रूक्ष, बुद्धिनाशक पदार्थों को छोड़ के जो शान्ति, आरोग्य, बल, बुद्धि, पराक्रम और सुशीलता से सभ्यता को प्राप्त करें वैसे घृत, दुग्ध, मिष्ट, अन्नपान आदि श्रेष्ठ पदार्थों का सेवन करें कि जिससे रजस् वीर्य्य भी दोषों से रहित होकर अत्युत्तम गुणयुक्त हो।”

माता का हमारे निर्माण में योगदान

माता का हमारे निर्माण में विशेष योगदान है। इसलिए प्राचीन काल से ही माता के प्रति विशेष श्रद्धा भावना भारत के समाज में रही है। भारतीय समाज के इस संस्कार ने माता को परिवार रूपी विश्वविद्यालय की प्राचार्या या कुलपति के रूप में स्वीकृति प्रदान की। माता परिवार रूपी विश्वविद्यालय की पदेन प्राचार्या या कुलपति नियुक्त हो जाती थी। परिवार समाज और राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व माता के कंधों पर होता था। इस दायित्व पूर्ण सम्मान को केवल और केवल भारत ने समझा है। इसके अतिरिक्त किसी अन्य देश ने नहीं। इतना बड़ा सम्मान संसार के किसी अन्य देश में माता को प्राप्त नहीं हुआ।
भारत के ऋषियों ने पहले दिन से माता के महत्वपूर्ण स्थान को समझ कर उसे यह स्थान दिया। भारत की संस्कृति ने माता को योग्या ( वंदनीया ) माना, जबकि अन्य देशों की संस्कृतियों ने उसे भोग्या माना । भारत में भी जब सांस्कृतिक पतन की स्थिति आई तो कुछ लोगों ने नारी को पैरों की जूती कहा। उससे वेद पढ़ने का अधिकार छीन लिया। जिससे बौद्धिक रूप से नारी पतित होने की अवस्था में पहुंच गई।
महर्षि दयानंद जी महाराज ने नारी की पतितावस्था के विरुद्ध क्रांति का बिगुल फूंका और लोगों को उसके समुचित स्थान और सम्मान का बोध कराया। उत्तम पारिवारिक और सामाजिक अवस्था की स्थापना के लिए महर्षि दयानंद जी महाराज ने लोगों को अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश के माध्यम से बताया कि जैसा ऋतुगमन का विधि अर्थात् रजोदर्शन के पांचवें दिवस से लेके सोलहवें दिवस तक ऋतुदान देने का समय है, उन दिनों में से प्रथम के चार दिन त्याज्य हैं, रहे १२ दिन, उनमें एकादशी और त्रयोदशी को छोड़ के बाकी १० रात्रियों में गर्भाधान करना उत्तम है। और रजोदर्शन के दिन से लेके १६वीं रात्रि को पश्चात् न समागम करना। पुनः जब तक ऋतुदान का समय पूर्वोक्त न आवे तब तक और गर्भस्थिति के पश्चात् एक वर्ष तक संयुक्त न हों। जब दोनों के शरीर में आरोग्य, परस्पर प्रसन्नता, किसी प्रकार का शोक न हो। जैसा चरक और सुश्रुत में भोजन छादन का विधान और मनुस्मृति में स्त्री पुरुष की प्रसन्नता की रीति लिखी है, उसी प्रकार करें और वर्तें। गर्भाधान के पश्चात् स्त्री को बहुत सावधानी से भोजन छादन करना चाहिए। पश्चात् एक वर्ष पर्यन्त स्त्री पुरुष का संग न करे। बुद्धि, बल, रूप, आरोग्य, पराक्रम, शान्ति आदि गुणकारक द्रव्यों ही का सेवन स्त्री करते रहै कि जब तक सन्तान का जन्म न हो।”

डॉ राकेश कुमार आर्य

मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

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