अपने विज्ञापनों पर फिजूलखर्ची

सूचना के अधिकार का सबसे ज्यादा उपयोग करनेवाले श्री सुभाष अग्रवाल ने अब एक और धमाका कर दिया है। कभी-कभी मुझे लगता है कि यह अकेला आदमी कितना कमाल कर रहा है। कभी-कभी वह संसद से भी ज्यादा भारी दिखाई पड़ने लगता है। वह ऐसे सवाल सरकार से पूछ लेता है कि सरकार के पसीने छूटने लगते हैं। अभी-अभी सुभाषजी ने सरकारों से पूछा है कि आप सरकारी विज्ञापनों पर कितना खर्च करते हैं तो पता चला कि 2004 में भाजपा सरकार ने 150 करोड़ रु. खर्च किए थे, अपने ‘शाइनिंग इंडिया’ अभियान पर! कांग्रेस ने भाजपा को भी मात कर दिया। उसने अपने कार्यकाल में 485 करोड़ खर्च कर दिए, ‘भारत-निर्माण’ के विज्ञापनों पर! इन विज्ञापनों में क्या होता है? नेताओं के बड़े-बड़े फोटो, नारे और उनकी उक्तियां। ये विज्ञापन इतने उबाऊ और घिसे-पिटे होते हैं कि पाठक लोग इन्हें पढ़ते तक नहीं हैं।

इनका असर कितना होता है, इसका पता इसी से चलता है कि इन पर जनता का पैसा पानी की तरह बहाने वाली सरकारें भी गुड़क जाती हैं। कांग्रेस और भाजपा सरकारों ने चुनावों के दौरान अपनी दुकानें जमाने के लिए ये विज्ञापन की तोपें लगाई थीं लेकिन उनका माल बिकता, इसके बजाय उन दुकानों का दिवाला ही पिट गया। याने ये विज्ञापन निरर्थक सिद्ध हुए। ज्यादातर लोगों ने तो उन्हें देखा ही नहीं, जिन्होंने देखा, उन पर कोई असर नहीं हुआ। जनता की गाढ़े पसीने की कमाई को हर बार नेता लोग बेरहमी से बत्ती लगा देते हैं।

यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के सामने भी गया था। उसने भी सरकार से कहा था कि वह इन विज्ञापनों के लिए एक सुनिश्चित नीति निर्देश जारी करे। नेताओं के फोटो छापने बंद करे। जरुरी हो तो राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और मुख्यमंत्री के फोटो छापे जा सकते हैं। इन लोगों की फोटुओं को रोज़-रोज़ देखकर लोग तंग आ जाते हैं। ऊबने लगते हैं। इन बार-बार छपने वाले फोटुओं के कारण नेताओं का ग्राफ गिरने लगता है। उनकी लोकप्रियता घटने लगती है लेकिन चाटुकार अफसरों और छुटभय्या नेताओं को कौन समझाए? वे अपने आकाओं की खुशामद में सरकारी खजाने में सेंध लगाते रहते हैं। इस फिजूलखर्ची की आलोचना अखबार और टीवी चैनल क्यों करने लगे? नेताओं के आत्म-प्रेम के कारण उनकी तो जेबें सेत-मेंत में ही गर्म हो जाती हैं। हमारे राजनीतिक दल यह मानकर चलते हैं कि उनका सारा आंतरिक काम-काज गोपनीय रहना चाहिए। आम जनता को वह पता क्यों चले? सरकारी फिजूलखर्ची को सुभाष अग्रवाल जैसे लोक पकड़वा देते हैं लेकिन राजनीतिक दलों की फिजूल आमदनी और फिजूलखर्ची अभी भी गुमनाम रहती है। सत्तारुढ़ दल भ्रष्टाचार के सबसे बड़े अड्डे बन जाते हैं। इन्हें सूचना के अधिकार के तहत लाना सबसे ज्यादा जरुरी है। इस मामले में सारे दल एक-जैसे हैं।

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betnano
betyap giriş
hititbet giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betnano
betnano
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
casibom giriş
casibom giriş
casibom giriş
jojobet
jojobet
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
holiganbet giriş
holiganbet resmi giriş
betpark giriş
betkom giriş
betkom resmi giriş
jojobet
jojobet
betkom giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
xslot giriş