एक दूसरे के लिए “सरकार” हैं मोदी और भागवत !

पुण्य प्रसून बाजपेयी 

संघ परिवार से जो गलती वाजपेयी सरकार के दौर में हुई, वह गलती मोदी सरकार के दौर में नहीं होगी। जिन आर्थिक नीतियो को लेकर वाजपेयी सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया, उनसे कई कदम आगे मोदी सरकार बढ़ रही है लेकिन उसे कठघरे में खड़ा नहीं किया जायेगा। लेकिन मोदी सरकार का विरोध होगा। नीतियां राष्ट्रीय स्तर पर नहीं राज्य दर राज्य के तौर पर लागू होंगी। यानी सरकार और संघ परिवार के विरोधाभास को नियंत्रण करना ही आरएसएस का काम होगा। तो क्या मोदी सरकार के लिये संघ परिवार खुद को बदल रहा है। यह सवाल संघ के भीतर ही नहीं बीजेपी के भीतर के उन कार्यकर्ताओ का भी है, जिन्हें अभी तक लगता रहा कि आगे बढने का नियम सभी के लिये एक सरीखा होता है। एक तरफ संघ की विचारधारा दूसरी तरफ बीजेपी की राजनीतिक जीत और दोनों के बीच खड़े प्रधानमंत्री मोदी। और सवाल सिर्फ इतना कि राजनीतिक जीत जहां थमी वहां बीजेपी के भीतर के उबाल को थामेगा कौन। और जहां आर्थिक नीतियों ने संघ के संगठनों का जनाधार खत्म करना शुरु किया, वहां संघ की फिलासफी यानी “रबर को इतना मत खींचो की वह टूट जाये”, यह समझेगा कौन। मोदी सरकार को लेकर यह हालात कैसे चैक एंड बैंलेंस कर रहे हैं, इसके लिये दिल्ली चुनाव के फैसले का इंतजार कर रहे बीजेपी के ही कद्दावर और धुरंधर नेताओं को टटोल कर भी समझा जा सकता है और भारतीय मजदूर संघ से लेकर किसान संघ और बीजेपी को सांगठनिक तौर पर संभालने वाले खांटी स्वयंसेवकों से बातचीत कर भी समझा जा सकता है, जिनकी एक सांस में संघ तो दूसरी सांस में बीजेपी समायी हुई है। असल में हर किसी का अंतर्विरोध ही हालात संभाले हुये है या कहें मोदी सरकार के लिये तुरुप का पत्ता बना हुआ है। लेकिन जादुई छड़ी प्रधानमंत्री मोदी के पास रहेगी या सरसंघचालक मोहन भागवत के पास यह समझना कम दिलचस्प नहीं। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी को भागवत भी चाहिये और भगवती भी। दिल्ली के लिये संघ परिवार भी चाहिये और संघ परिवार पर निशाना साधने वाले शांति भूषण भी चाहिये। वहीं भागवत को संघ की विचारधारा पर चलते हुये सत्ता के लिये मोदी भी चाहिये और विरोध करने वाले संगठनों का साथ भी। जिसमें संघ की विचारधारा के अनुसार ही भारत हिन्दू राष्ट्र की तरफ कदम बढाये उसके बाद चाहे सत्ता संघर्ष के लिये संघ को राजनीतिक तौर पर सक्रिय होने की जरुरत नहीं पड़ेगी। ध्यान दें तो मौजूदा वक्त में मोदी सरकार के किसी भी मंत्री से ज्यादा तवोज्जो उसी के मंत्रालय पर पीएम मोदी के बोलने को दिया जाता है। जिसका असर यह भी हो चला है कि पीएम कुछ भी कही भी बोले उसका एक महत्व माना जाता है और मंत्री अपने ही मंत्रालय के बारे में कितने बड़े फैसले ही क्यों ना ले ले वह पीएम के एक बयान के सामने महत्वहीन हो जाता है। गुरु गोलवरकर के बाद कुछ यही परिस्थितियां संघ परिवार के भीतर भी बन चुकी हैं। संघ के मुखिया ही हर दिन देश के किसी ना किसी हिस्से में कुछ कहते है, जिन पर सभी की नजर होती है । लेकिन संघ के संगठनों के मुखिया कही भी कुछ कहते है तो उस पर किसी का ध्यान नहीं जाता।

असर इसी का है कि जगदीश भगवती मोदी की पीठ ठोंकते है और भागवत से डराते हैं। शांति भूषण किरण बेदी के जरीये मोदी के मास्टरस्ट्रोक की पीठ ठोंकते है लेकिन मुस्लिम मुद्दे पर संघ से मोदी को डराते हैं। ऐसे में तलवार की धार पर सरकार चल रही है या संघ परिवार यह सत्ता के खेल में वाकई दिलचस्प है। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों को लागू कराने के तरीके संघ के स्वयंसेवकों की तर्ज पर है और सरसंघचालक की टिप्पणियां नीतिगत फैसले के तर्ज पर हैं। इसीलिये बीते आठ महिनों को लेकर जो भी बहस सरकार के मद्देनजर हो रही है, उसमें प्रधानमंत्री का हर एलान तो शानदार है लेकिन उसे लागू नौकरशाही को करना है और नौकरशाही स्वयंसेवकों की टीम नहीं होती इसे कोई समझ नहीं पा रहा है। नौकरशाही में सुधार सिर्फ वक्त पर आने और जाने से हो जायेगा यह भी संभव नहीं है। सिर्फ बैंक के हालात को ही परख लें तो तो मौजूदा वक्त में औसतन हर बैंक कर्मचारी को हर दिन दो सौ ग्राहक का सामना करना पड़ता है। हर ग्राहक को तीन मिनट देने का मतलब है दस घंटे । वहीं स्वयंसेवक की तादाद सामूहिक तौर पर काम करती है। यानी जिनके बीच स्वयंसेवक काम करने जाता है उन्हें ही, स्वयंसेवक बना लेता है। ऐसे में जनधन योजना हो या फिर सरकार की कोई भी योजना जो समूचे देश के लिये हो उसे परखे तो समझ में येगा कि नौकरशाही के जरीये सरकार काम कराना चाहती है या नौकरशाही स्वयंसेवक होकर काम करने लगे। जनधन योजना से बैंकिंग कर्मचारी

परेशान है कि बैंक संभाले या खाते खोलें। यह हालात आने वाले वक्त में सरकार के लिये घातक साबित हो सकते है। वहीं दूसरी तरफ संघ के मुखिया सरकार की तर्ज पर चल पड़े हैं। मसलन भारतीय मजदूर संघ को इजाजत है कि वह मोदी सरकार की मजदूर विरोधी नीतियो का विरोध करे। क्योंकि सरसंघचालक इस सच को समझते हैं कि देश भर में अगर 60 हजार शाखायें लगती हैं तो उनकी सफलता की बड़ी वजह भारतीय मजदूर संघ से जुड़े एक करोड़ कामगार भी हैं। जो ना सिर्फ शाखाओं में शरीक होते है बल्कि बरसात में संघ की शाखा के आयोजन से लेकर संघ के किसी भी कार्यक्रम के लिये में बिना पैसा लिये बीएमएस का दफ्तर या हाल उपलब्ध करा देते हैं। जो बीएमएस कॉपरेटिव से जुडा होता है। वही किसान संघ हो या आदिवासी कल्याण संघ, दोनों की मौजूदगी ग्रामीण भारत में संग परिवार को विस्तार देती है। और इस तरह चालीस से ज्यादा संगठनों का रास्ता केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों पर कई गुना ज्यादा भारी है। लेकिन मुश्किल यह है कि स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को विस्तार देने में लगे हैं। और मोदी सरकार की नीतियों का ऐलान संघ के सपनों के भारत की तर्ज पर हो रहा है जिसमें नौकरशाही फिट बैठती ही नहीं है। गंगा सफाई के लिये टेक्नालाजी और इंजीनियरिंग की टीम चाहिये या श्रद्दा के फूल। जो गंगा माता कहकर गांगा को गंदा ना कहने पर जोर दें। बिजली खपत कम करने के लिये एलईडी बल्ब सस्ते में उपलब्ध कराने से काम होगा या सोशल इंडेक्स लागू करने से। दुनिया के किसी भी देश में एलईडी बल्ब के जरीये बिजली खपत कम ना हुई है और ना ही एलईडी बल्ब का फार्मूला किसी भी विकसित देश तक के रिहाइशी इलाकों में सफल है।

भारत सरीखे तीसरी दुनिया के देश में तो असंभव है मुश्किल यह है कि प्रधानमंत्री की नीयत खराब नहीं है बल्कि नरेन्द्र मोदी देश को स्वयंसेवकों की टोली के जरीये ही देश के बिगड़े हालात पर नियंत्रण करना चाह रहे हैं। और स्वयंसेवकों को पीएम का फार्मूला इसलिये रास नहीं आ सकता क्योंकि समूचा विकास ही उस पूंजी पर टिकाया जा रहा है जिस पूंजी के आसरे विकास हो भी सकता है इसकी कोई ट्रेनिंग किसी स्वयंसेवक को नहीं है। ट्रेनिंग ही नहीं बल्कि जिस वातावरण में संघ परिवार की मौजूदगी है या संघ परिवार जिन क्षेत्रो में काम कर रहा है, वहां विकास का सवाल तो अब भी सपने की तरह है। वहां तो न्यूनतम की लड़ाई है। पीने का साफ पानी तो दूर दो जून की रोटी का जुगाड़ तक मुशिकल है। स्कूल, स्वास्थ्य सेवा या पक्का मकान का तो सपना भी नहीं देका जा सकता। वैसे भी लुटियन्स की दिल्ली छोड़ दीजिये या फिर देश के उन सौ शहरों को जिन्हे स्मार्ट शहर बनाने का सपना प्रधानमंत्री ने पाला है। इसके इतर देश में हर तीसरा व्यक्ति गरीबी की रेखा से नीचे है। सिर्फ पांच फिसदी लोगों के पास 78 फिसदी संसाधन है। बाकी 95 फिसदी 22 फिसदी संसाधन पर जी रहा है। उसमें भी 80 फीसदी के पास देश का महज 5 फिसदी संसाधन है। यानी संघ परिवार जिन हालातों में काम कर रहा है और मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां जिस तबके के लिये एलान की जा रही है, वह ना सिर्फ संघ की विचारधारा से दूर है बल्कि देश के हालातो से भी दूर है। यहां मुश्किल राजनीति शून्यता की भी है और संघ के

राजनीतिक सक्रियता के बावजूद देश में सामाजिक असमानता बढाने वाली नीतियों पर खामोश रहने की भी है। तो फिर रास्ता अंधेरी गली तरफ जा रहा है या फिर देश को एक खतरनाक हालात की तरफ ले जाया जा रहा है। यह सवाल इसलिये महत्वपूर्ण हो चला है संघ अब वाजपेयी सरकार की तर्ज पर मोदी सरकार को परख नहीं रहा और वाजपेयी सरकार के बाद भी कोई राजनीतिक पार्टी या नेता देश में है इसे मोदी सरकार के वक्त देश में

दिखायी भी दे नहीं रहा है। याद कीजिये वाजपेयी सरकार के दौर में रज्जू भैया ने संघ के तमाम संगठनों पर नकेल कसी थी। लेकिन जब आर्थिक नीतियों को लेकर विरोध शुरु हुआ तो 2004 के चुनाव में संघ परिवार राजनीतिक तौर पर निष्क्रिय हो गया। अरबों खर्च करने के बाद भी शाइनिंग इंडिया अंधेरे में समा गया क्योंकि देश अंधेरे में था। लेकिन 2015 में अगर हालात को परखें तो मोहन भागवत ने संघ के तमाम संगठनों को छूट दे रखी है कि वह अपनी बात कहते रहे।

मोदी सरकार की नीतियों पर विरोध जताते रहे। क्योंकि संघ को राजनीतिक तौर सक्रिय रखना दिल्ली की जरुरत है और दिल्ली के जरीये संघ को विस्तार मिले यह संघ की रणनीतिक जरुरत है। मोदी आस बनकर चमक रहे है क्योंकि कारपोरेट की पूंजी पर संघ की विचारधारा का लेप था। और राजनीतिक अंधेरगर्दी के खिलाफ देश में अनुगूंज है। नया संकट यह भी है कि 2004 में जिन राजनीतिक दलों या नेताओं को लेकर आस थी 2015 में उसी आस की कोई साख बच नहीं रही। कांग्रेस हो या वामपंथी या फिर क्षत्रप नये युवा भारत से इनका कोई सरोकार है नहीं और पुराने भारत से संपर्क कट चुका है। शायद इसीलिये मौजूदा वक्त में सबसे बडा सवाल यही है कि अगर बीजेपी के चुनावी जीत का सिलसिला थमता है या फिर मोदी सरकार के आईने में संघ परिवार की विचारधारा कुंद पडती है तो मोदी सरकार और संघ परिवार के बीच सेफ पैसेज देने का सिलसिला क्या गुल खिलायेगा। क्योंकि अंदरुनी सच यही है कि सेफ पैसेज की बिसात पर प्यादे बने नेता हों या स्वयंसेवक वक्त का इंतजार वह भी कर रहे हैं और अंधेरे से उजाले में आने का इंतजार देश का बहुसंख्यक तबका भी कर रहा है।

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