क्‍या आप जानते हैं अपनी छाया को ?

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हमारे शरीर की अपनी छाया होती है और अपने आसपास बनी रहती है। प्रकाश होने पर भूतल पर तो छाया होती है ही, किंतु वह परछाई होती है और जो शरीर के चतुर्दिक ध्‍यानपूर्वक अवलोकित होती है, वह छाया है। इसको ‘प्रभामण्‍डल’ कहा जा सकता है। आज की भाषा में ओरा। इसका कदाचित पहला शास्‍त्रीय प्रयोग और फल कथन गर्गमुनि ने अपनी संहिता में किया है।

गर्गमुनि का समय शुंगकाल माना जा सकता है क्‍योंकि उनकी संहिता में उस काल की घटनाओं को युगपुराण के रूप में लिखा गया था और उनकी संहिता का बेहतर समीक्षात्‍मक पुनर्लेखन वराहमिहिर ने 6वीं सदी में किया था। न केवल बृहत्‍संहिता बल्कि उससे पहले ‘ज्‍योतिषसंहिता’ में किया जिसको बृहत्‍संहिता के बाद समाससंहिता का नाम दे दिया गया। आज न समाससंहिता बची है न ही गर्गरचित गर्गसंहिता। अच्‍छा हुआ जो 9वीं सदी में उत्‍पलभट ने अपनी टीका में इन ग्रंथों के कुछ श्‍लोकों को उद्धृत कर लिया।

गर्ग ने कहा कि प्रत्‍येक प्राणी की अपनी छाया हाेती है। ये छायाएं किसी भी देहधारी के शरीर में पांच महाभूतों से लेकर सूर्य, विष्‍णु, इन्‍द्र, यम और चंद्र का स्‍वरूप होती है। इसको सामान्‍य आंखों से देखा नहीं जाता, किंतु बहुत मनोयोग और ध्‍यान से इनके दर्शन का अभ्‍यास हो सकता है बिल्‍कुल वैसे ही जैसे श्रीकृष्‍ण ने अपने अप्रत्‍यक्ष स्‍वरूप को देखने के लिए अर्जुन काे दिव्‍यदृष्टि संपन्‍न हाेने का सुझाव दिया था।

वराहमिहिर ने 587 ईस्‍वी के आसपास जब प्राणियों के लक्षणों का वर्णन आरंभ किया तो इस महत्‍वपूर्ण विषय पर गंभीरता से विचार किया। उस समय यह भारतीय समाज में व्‍यवहार्य था और जातक की छाया के आधार पर उसके विचारित कार्यों के परिणाम को कहा जाता था। यही नहीं, छाया के आधार पर व्‍यक्तित्‍व को जानकर उसके संकल्‍पों, उसके साध्‍यों और गुण-धर्मों को कहा जाता था।

वराहमिहिर ने इसको सोदाहरण समझाया है। उसने परीक्षण से पाया कि जिस प्रकार स्‍फटिक आदि द्रव्‍यों के बने कलशों में दीपक को जलाया जाए तो बाहर की ओर जैसी आभा दिखाई देती है, वैसे ही किसी व्‍यक्ति की छाया काे बाहर भांपा जा सकता है –

छाया शुभाशुभ फलानि निवेदयन्‍ती लक्ष्‍या मनुष्‍य पशु पक्षिसु लक्षणज्ञै:।
तेजोगुणान् बहिरपि प्रविकाशयन्‍ती दीपप्रभा स्‍फटिक रत्‍न घट स्थितेव।। (68, 89) **

Complexion in man, animal and birds is detected by persons learnd in the matter and indicate both good and evil and is like a lamp within a crystal vessel throwing its light on the objects around.**

इस विवरण से वराहमिहिर ने निष्‍कर्ष निकाला था कि इन छायाओं को दस तरह का कई लोग बता रहे हैं- केचिद् वदन्ति दश ताश्‍च यथानुपूर्व्‍या। किंतु, पांच में दसों ही आ जाती है क्‍योंकि सूर्य, विष्‍णु, इंद्र, यम व चंद्र की छायाओं के लक्षण और फल भूमि की छाया के समान ही होते हैं। जाहिर है क‍ि वराह ने भी दस भेदों को ताे कहा मगर जब फल समान देखा तो ग्रंथ के विस्‍तार भय से पांच में ही समेटने का प्रयास किया –
तुल्‍यास्‍तु लक्षणफलैरिति तत्‍समासा:।

अब इनके लक्षण और परिणाम भी देखियेगा –
1. पार्थिव छाया – दांत, विनम्रता, अपारदर्शी जैसी, त्‍वचा, नख, रोम, केश, स्निग्‍धता व सुगंध हो तो भूमि की छाया जानकर पुष्टि, धनप्राप्ति, उन्‍नति व व्‍यापारादि धर्म में प्रवृत्ति निश्चित होगी।

2. वारि छाया – स्निग्‍ध व सफेद, स्‍वच्‍छ, नीली व नेत्रों को रुचिकर लगने वाली जल की छाया सौभाग्‍य, करुणा, सुख व उन्‍नति की सूचक है और यह छाया मां की तरह व्‍यक्ति का पालन करती है।

3. अनल छाया – क्रोधशीलता, तिरस्‍कार से रहित, कमल, आग व सुवर्ण के समान आभा, तेज, पराक्रम व प्रताप वाली अाग की छाया वाला व्‍यक्ति जयी होता है और इच्छित कार्यों में सफलता खुद ही बुनता है।

4. पवन छाया – वायु की छाया हो तो मलीनता, रूखापन, काला रंग और दुर्गंधित सी लगती है। यह वध, बंधन, रोग, लाभ में बाधा और धन वंचना जैसे परिणाम देती है।

5. अंबर छाया – आकाश की छाया स्‍फटिक के समान सफेद होती है और व्‍यक्तित्‍व को सहज रखती है। यह व्‍यक्ति के लिए भाग्‍यदायी, उदारता देती है और शुभ कार्यों के लिए एक संचित निधि की तरह मानी जाती है।
है न रोचकर बात… ।

यह विधि आजकल के ‘ओरा दर्शन’ से बिल्‍कुल भिन्‍न नहीं है। मगर, क्‍या आप इस बात को जानते हैं ? इस विधि के अवदान के लिए हमें कहीं अन्‍यत्र देखने की जरूरत नहीं हैं। ओरा या प्रभामण्‍डल से हमारा देश बहुत पहले परिचित था, मगर हम इस दिशा में भी सोचें और ज्‍यादा लगे तो बृहत्‍संहिता को उठा लें…।
(रिपोस्ट)
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** BRIHAT SAMHITA (SK jugnu, Parimal pablications, Delhi, 2013 AD, Two Part)
✍🏻श्रीकृष्ण जुगनु

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