भारतवर्ष में स्वराज्य के सबसे पहले उद्घोषक स्वामी दयानंद थे

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स्वराज्य शब्द के जन्म दाता ऋषि दयानन्द ||
आज लोग डींगे हांक रहे हैं स्वराज्य शब्द को लेकर, की इस स्वराज्य शब्द बाल गंगाधर तिलक जी की उपज है उन्होंने कहा था स्वराज्य प्राप्त करना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है |
इतना कह देने मात्र से बात नहीं बनती पंडित बाल गंगाधर तिलक जी को यह स्वराज्य शब्द मिला कहां से उसे पहले देखना पड़ेगा |
दादा भाई नैरोजी ऋषि दयानंद की लिखी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश को पढ़ते थे और इस पुस्तक को वह अपने सिरहाने के नीचे रखते थे | एक दिन पंडित बाल गंगाधर तिलक जी, दादा भाई नैरोजी के पास गये, और उन्हें सत्यार्थ प्रकाश पुस्तक को पढ़ते देख कर तिलक जी ने कहा दादा भाई से क्या आप आर्य समाजी बन गये हैं ?
दादा भाई ने ज़वाब में कहा अरे भाई आर्य समाजी मैं बना या नहीं वह तो बात और हैं, पर इस पुस्तक में स्वामी दयानन्द जी ने स्वराज्य शब्द प्राप्त करने की बातें लिखी है | यह सुनने के बाद ही पंडित बालगंगाधर जी ने इस शब्द को अपना मन्त्र बना लिया था | यह है सच्ची बातें, पर मैं कल सुदर्शन न्यूज़ चेनल में सुन रहता सुधांशु त्रिपाठी के बिचार उन्होंने बाल गंगाधर जी की बात तो बताई, परन्तु यह स्वराज्य शब्द का जन्मदाता का नाम उन्होंने नहीं बताया |

वह नहीं जानते हैं ऐसी बात तो मैं नहीं कहूँगा किन्तु ऋषि दयानन्द का नाम लेने में इन लोगों को एलर्जी है | कारण यह लोग आर,एस,एस, के ट्रेनिंग शुदा हैं | इन लोगों को यह पता नहीं की इस संगठन के जन्म दाता डॉ0 केशव वलिराम हेडगवार जी एक आर्य समाजी विद्वान् के पुत्र थे | पिता का संस्कार डॉ0 हेडगवार जी पर भी रहा है |
उनके निधन के बाद जब इस संगठन के प्रमुख गुरु गोलवरकर जी बने तो इसमें पूरी पौराणिकता को भर दिया, और आर्य समाज के विचार धारा से बिलकुल अलग कर दिया | और ऋषि दयानन्द का नाम लेना गुनाह समझने लगे, इसका मूल कारण है सिर्फ और सिर्फ दयानन्द जी ने मूर्ति पूजा को वेद विरुद्ध बताया |

मूर्ति पूजा करने से मानवों को मना किया की मूर्ति को परमात्मा न मानों मूर्ति में परमात्मा है परन्तु मूर्ति परमात्मा नहीं है | इस सत्यता को हिन्दू नामधारी हजम नहीं कर पाए, ऋषि दयानन्द जी का कहना है, किसी के स्वीकार करने अथवा न करने पर मैं सत्य कहना बंद तो नहीं कर सकता ? मेरा किसी से कोई विरोध नहीं है मेरा सत्य का प्रतिपादन ही एक मात्र उद्देश्य है, और यह प्रत्येक मानव कहलाने वालों के लिए सत्य का धारण और असत्य का परित्याग ही मानवता है |

इधर गुरु गोलवरकर जी ने तो कसम खाली की हमें स्वामी दयानन्द की बात को मानना ही नहीं हैं | यही एक मात्र कारण है ऋषि दयानन्द जी की चर्चा RSS में नहीं होती | जहाँ तक सन्यासी की बातें है तो मूर्तिपूजक इन्हें चाहिए और गौमांस खाने वाला भी चाहिए तो इन्हें स्वामी विवेकानन्द ही दिखाई पड़े, तो इन्होंने उन्हें ही पकड़ लिया |

यह है वह सत्यता जो मैं आप लोगों को बताया हूँ, रही बात प्रधानमंत्री जी भी उन्हीं परम्परा से निकले तो ऋषि दयानन्द का नाम भी वह किस लिए लेते ? एक सच्चाई मैं और बताना चाहूँगा की 15 अगस्त को मोदी जी ने भाषण में उन्होंने नारी सशक्तिकरण और नारी सम्मान की बात कही | मुझे तो हंसी आ रही है लिखते हुए भी, यह हिन्दू मानसिकता में नारी सम्मान की बात कहाँ थी और कब थी ?

इन हिन्दुओं ने नारी को पढने पर प्रतिबन्ध लगाया, इन्हें स्कूल जाने नहीं देते थे हिन्दू घराने के लोग | नारी शिक्षा की बात भी ऋषि दयानन्द जी की ही हैं, यह लोग एहसान फरामोश हैं सत्य को कभी स्वीकार करना ही नहीं चाहते | हिन्दू गुरु शंकराचार्य ने ही नारी को वेद पढने का अधिकार नहीं है कहा, अगर कोई महिला वेद पढ़े तो उनका जीभ काट लिया जाए, और सुनने पर शीशा पिघाल कर उनके कान में डालने की बात इन हिन्दुओं के गुरु का है |

आज अगर यह लोग नारी शिक्षा की बात करते हैं तो अनायास ही हँसी छूटने लगती है, नारी को वेद पढ़ाने की बात ऋषि दयानन्द जी ने वेद से निकाल कर दिया, स्त्रीरब्रह्मा बभुविथ,और मनु महाराज का भी हवाला ऋषि ने दिया है = यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता |

इस सच्चाई को हिन्दुओं ने स्वीकार करना भी तो उचित नहीं समझा, हिन्दू सत्य को जानने का भी प्रयास नहीं किया | ऋषि दयानन्द को नारी उद्धारक के नाम से जाना जाता है इतिहास में ऋषि दयानन्द जी का नाम आता है | न जाने इन हिन्दू कहलाने वाले कौनसा इतिहास पढ़ते हैं ? माननीय प्रधान मंत्री जी से अग्राह है एक बार आर्य समाज का इतिहास को भी पढ़कर देखें, आप इतने पुस्तकों को पढ़ते हैं तो इसे भी एक बार जरुर पढ़ें | धन्यवाद के साथ = महेन्द्रपाल आर्य | 17/8/22

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