सांडर्स के खून से दी शेरे पंजाब लाला लाजपत राय को श्रद्धांजलि

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अमृत महोत्सव लेखमाला
सशस्त्र क्रांति के स्वर्णिम पृष्ठ — भाग-12

नरेन्द्र सहगल

यद्यपि प्रथम विश्व युद्ध के समय लड़खड़ाते ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सीने पर भारतीय सशस्त्र क्रांतिकारियों द्वारा लगने वाला प्रचंड प्रहार मात्र एक अंग्रेज भक्त की गद्दारी के कारण विफल हो गया परंतु इस विफलता से सरफरोशी देशभक्त क्रांतिकारियों के मन में अपने वतन के लिए मर मिटने की भावना में रत्ती भर भी कमी नहीं आई। जलियांवाला बाग में हुए भीषण नरसंहार के पश्चात तो सशस्त्र क्रांति की आग पूरे देश में भभक उठी। देश में सरदार भगत सिंह, उधम सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, राजगुरु, सुखदेव, अशफाकउल्ला खान और क्रांति शिरोमणि वीर सावरकर जैसे हजारों लोग अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति के लिए तैयार हो गए।

देश के कोने-कोने में प्रस्फुटित हो रहे स्वातंत्र्य ज्वालामुखी को शांत करने के लिए ब्रिटेन से ‘साइमन कमीशन’ के नाम से एक दल को भारत में भेजा गया। अंग्रेज सरकार ने घोषणा की कि यह कमीशन भारत को स्वराज्य देने की संभावनाएं तलाश करेगा। सर्वविदित है कि 1857 में राष्ट्र जागरण से घबराकर ए. ओ. ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना की थी ताकि देश में अंग्रेजों के विरुद्ध तैयार हो रहे जनमानस को शांत किया जाए और लड़कर आजादी प्राप्त करने के बजाय मांग कर आजादी लेने की प्रवृत्ति बना दी जाए। अर्थात भारतीयों के हाथों से हथियार छीन कर भीख का कटोरा पकड़ा दिया जाए। लगभग इसी षड्यंत्र के साथ साइमन कमीशन को भी भारत में भेजा गया।

देश की आजादी के लिए संघर्षरत सशस्त्र क्रांतिकारियों तथा लगभग सभी दलों एवं संस्थाओं ने एकजुट होकर इस कमीशन का प्रबल विरोध करने का ऐलान कर दिया। क्रांतिवीरों की अग्रणी संस्था ‘हिंदुस्तान प्रजातंत्र सेना’ ने निश्चय किया कि कमीशन के सदस्यों की गाड़ी को ही बम से उड़ा दिया जाए, परन्तु धन के अभाव के कारण यह योजना सफल नहीं हो सकी। साइमन कमीशन के सदस्य सारे देश में घूम रहे थे। देशभक्तों ने स्थान-स्थान पर इसका विरोध किया। कुछ स्थानों पर अंग्रेज भक्त लोगों ने उसका स्वागत भी किया।

20 अक्टूबर 1928 को इस कमीशन के लाहौर पहुंचने पर क्रांतिकारी दलों “नौजवान भारत सभा” और “हिंदुस्तान प्रजातंत्र सेना” एवं कांग्रेस के गरम दल ने कमीशन का जबरदस्त विरोध किया। शहर में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में एक विशाल जुलूस निकाला गया। जैसे ही यह कमीशन लाहौर के स्टेशन से बाहर निकला जुलूस में शामिल क्रांतिकारी गरज उठे – “साइमन कमीशन वापस जाओ”, “इंकलाब जिंदाबाद”, “वंदे मातरम”। युवकों के जोशीले नारों से आकाश गूँज उठा। चारों दिशाओं से कमीशन के विरोध में गगन भेदी आवाजें उठने लगीं। क्षण भर के लिए रुक गया कमीशन।

सरकारी पुलिसियों ने जुलूस को रोकने की कोशिश की। शेरे पंजाब लाला लाजपत राय ने एक कदम भी पीछे ना हटने का आदेश दे दिया। क्रांतिकारी सुखदेव, भगवतीचरण, यशपाल इत्यादि भी अपने साथियों के साथ लाला जी को सुरक्षा घेरे में लेकर चल रहे थे। कमीशन की गाड़ी को एक इंच भी आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिला। अंग्रेज पुलिस अफसरों ने अपनी साख बचाने के लिए खुले लाठीचार्ज का आदेश दे दिया। जुलूस फिर भी नहीं थमा। यह लाठीचार्ज इतनी निर्दयता से किया गया कि लोगों के शरीर खून से लथपथ होने लगे। फिर भी कमीशन को आगे बढ़ने का रास्ता नहीं दिया गया।

पुलिस अफसर मि. स्कॉट ओ सांडर्स ने स्वयं हाथों में लाठियां लेकर प्रदर्शनकारियों को मारना शुरू कर दिया। इस दुष्ट अंग्रेज अफसर ने लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसा कर उस बूढ़े नेता का शरीर छलनी कर दिया। यह देखकर एक क्रांतिकारी युवक हंसराज आगे आकर लालाजी पर बरस रही लाठियों को अपने शरीर पर सहन करने लगा। लाठीवर्षा से भी जब प्रदर्शनकारी नहीं रुके तो पुलिस सुप्रिन्टेंडेंट ने गोली चलाने का आदेश दे दिया। इससे हजारों प्रदर्शनकारियों के मरने की संभावना को देखते हुए लालाजी ने जुलूस को समाप्त करने का आदेश दे दिया।

प्रदर्शन को समाप्त करने के पक्ष में ना होते हुए भी क्रांतिकारियों ने प्रदर्शन के नेता की आज्ञा का पालन किया। लाला जी ने सूझबूझ का परिचय देते हुए स्वयं घायल होकर हजारों प्रदर्शनकारियों को मौत के मुंह से निकाल लिया। अन्यथा उस दिन लाहौर में सरकार के आदेश से पुलिस अफसरों ने दूसरा जलियांवाला बाग़ नरसंहार कर दिया होता। प्रदर्शन के समाप्त हो जाने के बाद भी पुलिस ने घरों में जाते हुए प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पुलिस के इस नृशंस कृत्य की चारों ओर निंदा हुई परंतु पुलिस अफसरो स्कॉट और सांडर्स तो अपनी कारगुजारी पर फूले नहीं समा रहे थे।

प्रदर्शन के बाद उसी दिन सायंकाल लाहौर में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया। इसमें सभी वक्ताओं ने सरकार द्वारा किए गए इस दमन की निंदा की। लालाजी ने भी घायल शेर की तरह दहाड़ कर ऊंची आवाज में अंग्रेजों को चुनौती दी – “जो सरकार निहत्थी प्रजा पर इस प्रकार के जुल्म करती है, उसे तो सभ्य सरकार भी नहीं कहा जा सकता। याद रहे इस प्रकार की सरकार कभी भी कायम नहीं रह सकती। मैं आज चुनौती देता हूं कि मुझ पर पड़ी प्रत्येक लाठी का प्रहार अंग्रेजी साम्राज्य के कफिन का कील साबित होगा।”

शेरे पंजाब लाला लाजपत राय का बूढ़ा शरीर लाठियों के प्रहांरों को अधिक दिनों तक सहन नहीं कर सका। 17 नवंबर 1928 को उनका शरीर शांत हो गया। उनकी अंतिम यात्रा में दो लाख से भी ज्यादा लोग थे। सबकी आंखों में आंसू थे, परंतु दिलों में इस जुल्म का बदला लेने की तड़प भी थी। क्योंकि एक प्रखर राष्ट्रवादी नेता को एक साधारण छुटभैये अंग्रेज अफसर ने जान से मार डाला था। सशस्त्र क्रांति के पुरोधा क्रांतिकारियों के लिए लाला जी की शहादत को भूल जाना बहुत कठिन था। उन्होंने अंग्रेज अफसर को मृत्युदंड देने की सौगंध खाई और तैयारियों में जुट गए।

दूसरे ही दिन लाहौर की एक अनजानी छोटी सी बस्ती में क्रांतिकारियों की बैठक आयोजित करके सरदार भगत सिंह ने लालाजी के खून का बदला लेने के लिए एक प्रस्ताव रखा, जिसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। दोनों अफसरों के उठने बैठने और आने जाने मार्ग की रेकी करने का काम जय गोपाल को दिया गया। उसने दो-तीन दिनों में ही सारी जानकारी क्रांतिकारियों की केंद्रीय समिति को सौंप दी। सांडर्स को गोली मारने का स्थान, समय और ढंग आदि पर गंभीरतापूर्वक विचार करके ‘एक्शन’ करने की तैयारी कर ली गई। यह कोरी तैयारी ही नहीं थी अपितु सांडर्स की मौत का वारंट था।

लाहौर के पुलिस स्टेशन के निकट डीएवी कॉलेज के हॉस्टल के साथ लगती सड़क पर क्रांतिकारी अपने जिम्मे लगे काम को करने के लिए चौकस हो गए। अंग्रेज अफसर के काल का दिन 17 दिसंबर 1928 था। राजगुरु कॉलेज के होटल की दीवार से सट कर खड़े हो गए। चंद्रशेखर आजाद निकटवर्ती झाड़ियों की ओट में बैठ गए। भगत सिंह और राजगुरु सड़क से हटकर चुपचाप खड़े हो गए। जय गोपाल भी अपनी निश्चित जगह पर डट गए।

सांडर्स ने पुलिस स्टेशन से निकलकर अपनी मोटरसाइकिल पर बैठकर जैसे ही फाटक को पार किया, जय गोपाल ने राजगुरु को इशारा कर दिया। राजगुरु ने तुरंत सांडर्स की गर्दन पर अपनी पिस्तौल से गोलियां दाग दी। वह लहूलुहान होकर धरती पर गिर गया। भगत सिंह ने आगे आकर अपनी पिस्तौल की सभी गोलियां सांडर्स के सीने में ठोक दीं। जब यह क्रांतिकारी अंग्रेज अफसर का काम तमाम करके डीएवी कॉलेज के हॉस्टल की ओर जाने लगे तो एक अंग्रेज भक्त सिपाही चंदन सिंह इन्हें पकड़ने के लिए आगे बढ़ा। उसे क्या पता था की चंद्रशेखर आजाद की पिस्टल में अभी गोलिया बाकी हैं। चंदन सिंह के ना रुकने पर आजाद ने उसके सीने में दो गोलियां दाग दीं। बेचारा चंदन सिंह वहीं लुड़क गया। उसकी तड़फती लाश को देखकर बाकी सिपाही भाग खड़े हुए।

लाहौर के पुलिस स्टेशन के निकट एक खुली सड़क पर दिनदहाड़े एक अंग्रेज अफसर का खून करके चारों क्रांतिकारी कहाँ चले गए इसका उत्तर सरकार को अपना सारा अमला लगा देने के बाद भी नहीं मिला। परंतु निरंकुश साम्राज्यवादियों को इतना तो पता चल ही गया कि राष्ट्र के स्वाभिमान की रक्षा के लिए भारतीय नौजवान किसी भी तरह के बलिदान के लिए सदैव सिद्ध रहते हैं।

अत्याचारी सांडर्स की हत्या के दो दिन बाद ही लाहौर की दीवारों पर लाल पर्चे चिपका दिए गए। इन पर्चों पर हिंदुस्तान प्रजातंत्र सेना का वक्तव्य था। — “जेपी सांडर्स की हत्या करके हमने लाला लाजपत राय की हत्या का बदला ले लिया। हमें दुख होता है कि सांडर्स जैसे एक मामूली से अफसर के कमीने हाथों ने देश की करोड़ों जनता द्वारा सम्मानित एक नेता पर हमला करके उसके प्राण ले लिए। राष्ट्र का यह अपमान हिंदुस्तान के युवकों को एक चुनौती थी। आज संसार ने देख लिया कि भारतीयों का खून जम नहीं गया है — हिंदुस्तान की जनता निष्प्राण नहीं हुई है। — अत्याचारी अंग्रेज शासकों सावधान। इस देश की पीड़ित जनता की भावनाओं को ठेस मत लगाओ। — अपनी शैतानी हरकतें बंद करो —- हमें हथियार ना रखने देने के लिए तुम्हारे सब कमीशन और चौकसी के बावजूद पिस्तौल और रिवाल्वर हमारे देशवासियों के हाथों में आते रहेंगे। —- विदेशी सरकार चाहे हमारा कितना भी दमन कर ले, परंतु हम अपने राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के लिए तथा विदेशी अत्याचारियों को सबक सिखाने के लिए सदैव तत्पर रहेंगे। —- आपके दमन के बावजूद हम क्रांति की पुकार को बुलंद रखेंगे और फांसी के फंदे पर भी मुस्कुराते रहेंगे – इंकलाब जिंदाबाद। —- हमें एक आदमी की हत्या करने का खेद है, परंतु यह आदमी निर्दयी, नीच और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का अंग था, जिसे समाप्त कर देना अति आवश्यक था। इस आदमी का वध हिंदुस्तान में ब्रिटिश शासन के दरिंदे के रूप में किया गया है। यह सरकार संसार की सबसे बड़ी अत्याचारी सरकार है। मनुष्य का रक्त बहाने के लिए हमें खेद है —- हमारा उद्देश्य ऐसी क्रांति से है जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत कर देगी। – इंकलाब जिंदाबाद

हस्ताक्षर – बलराज (भगत सिंह)
सेनापति पंजाब हिं.स.प्र. सेना।”

हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सेना द्वारा जारी किए गए इस घोषणापत्र से जहां एक ओर अंग्रेजों के प्रति नफरत बढ़ गई, वहीं दूसरी ओर से सशस्त्र क्रांति के मार्ग पर चलने वाले नवयुवकों के प्रति हमदर्दी का माहौल बन गया। बहुत से लोग गुप्त रूप से इन क्रांतिकारियों की धन से सहायता करने को आगे आने लगे। लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसाने पर अंग्रेज पुलिस अफसर की हत्या पर देशप्रेमी भारतवासी प्रसन्नता व्यक्त करने लगे।

इस ऐतिहासिक घटना के बाद सरकार चौकन्नी हो गई। सांडर्स की मौत ब्रिटिश शासन पर एक गहरी चोट थी। परंतु इस अपमानजनक हादसे से कुछ सबक लेने के बजाय सरकार ने देशवासियों पर जुल्मों को पहले से ज्यादा तेज कर दिया। शायद अंग्रेज इस गलत फहमी का शिकार हो गए कि हिंदुस्तानियों को सख्ती से दबाया जा सकता है।

सरकार ने अंग्रेजभक्त पुलिस अफसर रामबहादुर दूताराम को विशेष अधिकार देकर इन ‘कथित हत्यारों’ को पकड़ने के लिए नियुक्त कर दिया। बहुत सर पटकने के बाद भी जब सरकार के हाथ कुछ ना लगा तो इस हिंदू पुलिस अफसर रामबहादुर ने अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करने के लिए नौजवान भारत सभा एवं हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र से संबंध रखने के बहाने 22 बेक़सूर और निहत्थे लोगों को पकड़कर पुलिस थाने में बंद कर दिया। इन पर तरह-तरह के आरोप लगाकर इन्हें भयानक यातनाएं दी जाने लगीं। इनमें कुछ युवक ऐसे भी थे जो सांडर्स हत्या का राज जानते थे। परन्तु भयानक यातनाएं सहने के बावजूद भी इनमें से एक ने भी अपना मुंह नहीं खोला। सरकार को थक हार कर इन युवकों को छोड़ना पड़ा।

हत्या का कोई भी सुराग ना मिलने की वजह से सरकार बौखला गई। अंग्रेज अफसरों ने ऐसे लोगों को क्रांतिकारी समझकर उन्हें यातनाएं देनी शुरू की जिन्होंने कभी मक्खी भी नहीं मारी थी। पूरे लाहौर शहर को पुलिस हवालात बना दिया गया। ऐसी परिस्थितियों में भगत सिंह और उसके साथियों का लाहौर में भूमिगत होकर रह पाना बहुत कठिन हो गया। वे कभी भी पुलिस के शिकंजे में जकड़े जा सकते थे। अतः सुरक्षित लाहौर से बाहर निकल जाने के लिए विभिन्न उपायों पर विचार विमर्श शुरू हो गया। सांडर्स के वध के जिम्मेदार क्रांतिकारी किसी भी तरह लाहौर से निकलकर अन्य प्रांतों में जाकर क्रांतिकारी मशाल जलाने के लिए उतावले हो रहे थे।

अतः एक दिन चंद्रशेखर आजाद और उसके साथ कुछ अन्य क्रांतिकारियों ने वेश बदलकर निकलने की योजना बनाई। आजाद ने अपने सर मुंडवा लिया और माथे पर लाल चंदन का लेप करके धोती कुर्ता पहनकर मथुरा के पण्डे का रूप धारण कर लिया। शेष साथियों ने भी साधुओं जैसे कपड़े पहन लिए। यह मंडली साधु यात्रियों के रूप में भजन गाती हुई लाहौर से सुरक्षित निकल गई।

अब भगत सिंह और राजगुरु को भी इसी तरह सरकार की आंखों में धूल झोंक कर लाहौर से बाहर निकलना था। उल्लेखनीय है कि लाहौर में भूमिगत रहते समय इन क्रांतिकारियों के पास जो थोड़ा बहुत धन था वह भी समाप्त हो गया था। भूख प्यास से व्याकुल इन क्रांतिकारियों की वीरव्रती मानसिकता में तनिक भी अंतर नहीं आया।

इन्हीं दिनों प्रसिद्ध क्रांतिकारी भगवती भाई की पत्नी दुर्गा देवी अपने 3 वर्ष के पुत्र के साथ लाहौर में रहती थी। भगवती भाई तो स्वयं फरार थे। इस दुर्गा भाभी ने भगत सिंह और राजगुरु को कलकत्ता तक सुरक्षित पहुंचाने में एक जोखिम भरा एवं अतुलनीय रोल अदा किया।

सरदार भगत सिंह ने अपने केश कटवा लिए। सूट-बूट, टाई और सर पर अंग्रेज अफसरों जैसा टोप पहनकर साहब बन गए। उधर दुर्गा भाभी ने भी खूब मेकअप करके, अंग्रेजी पहनावा पहनकर मेम का रूप बना लिया। इस मेम की गोद में तीन साल का बच्चा भी था। राजगुरु ने इस ‘अंग्रेज परिवार’ के नौकर का वेश बना लिया। यह पूरा परिवार लाहौर स्टेशन से प्रातः 5:30 बजे निकलने वाली गाड़ी कलकत्ता मेल के फर्स्ट क्लास के डिब्बे में बैठकर दूसरे दिन सुरक्षित कलकत्ता पहुँच गया। …………जारी

नरेन्द्र सहगल
पूर्व संघ प्रचारक, लेखक – पत्रकार

बंधुओं मेरा आपसे सविनय निवेदन है कि इस लेखमाला को सोशल मीडिया के प्रत्येक साधन द्वारा आगे से आगे फॉरवर्ड करके आप भी फांसी के तख्तों को चूमने वाले देशभक्त क्रांतिकारियों को अपनी श्रद्धांजलि देकर अपने राष्ट्रीय कर्तव्य को निभाएं।

भूले नहीं – चूकें नहीं।

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