दिल्ली का चुनाव बदलेगा देश की राजनीति

दिल्ली का चुनाव नगर निगम के चुनाव से थोड़ा बड़ा है और प्रांतीय चुनावों से काफी छोटा है। फिर भी सारे देश का ध्यान इस स्थानीय चुनाव पर लगा हुआ है। इस चुनाव में कांग्रेस की तो गिनती ही नहीं है, जो दशकों तक इस राज्य की राजनीति पर हावी रही है। कांटे की लड़ाई अगर है तो भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी में है। दोनों पार्टियों ने अपनी पूरी ताकत इस चुनाव में झोंक दी है। एक बिल्कुल नई और स्थानीय पार्टी है और दूसरी पुरानी और अखिल भारतीय पार्टी है, लेकिन ऐसा लग रहा है, जैसे कि दोनों बराबर की पार्टियां हैं।

यदि चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों और मीडिया पर आप भरोसा करें तो दिल्ली में भाजपा हार रही है और ‘आप’ जीत रही है। भाजपा के कुछ नेताओं को विश्वास है कि भाजपा को लोकसभा-चुनावों की तरह प्रचंड विजय चाहे न मिले तो भी दिल्ली में सरकार वही बनाएगी। उनके भरोसा का आधार तो वे ही जानें। दिल्ली-चुनाव के परिणाम जो भी निकलें, आज विचार करने का विषय यह है कि इस स्थानीय चुनाव का राष्ट्रीय राजनीति पर क्या असर पड़ेगा और ऊंट जिस करवट भी बैठे, वह करवट राष्ट्रीय राजनीति को कैसे प्रभावित करेगी। क्या इससे किसी नई राजनीति की राह निकलेगी?

दिल्ली के चुनाव की गहमागहमी से अनेक संकेत उभर रहे हैं। सबसे पहला तो यह कि भाजपा का आत्म-विश्वास हिल गया है। जो पार्टी 30 साल में पहली बार स्पष्ट बहुमत से सारे देश में जीती हो, जिसने हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में मैदान मार लिया हो और जिसका नेता नरेंद्र मोदी-जैसा दृढ़व्रती हो, उस पार्टी को बाहर से एक महिला को लाना पड़े-यह किस बात का प्रमाण है? क्या इसका नहीं कि भाजपा के अनेक स्थानीय नेता, जो केंद्रीय मंत्रिमंडल के भी सदस्य रह चुके हैं और अभी हैं, वोट खींचने की कला में अयोग्य मान लिए गए? इससे भी बड़ी बात यह मान ली गई कि दिल्ली का चुनाव अब नरेंद्र मोदी के नाम पर नहीं लड़ा जा सकता। इसका मतलब क्या हुआ?

क्या यह नहीं कि भाजपा ने ही मोदी की साख पर बट्‌टा लगा दिया! मोदी के बदले किरण बेदी को आगे करने के बारे में कुछ भाजपा नेताओं ने यह सफाई दी कि वे दिल्ली के चुनाव को मोदी बनाम केजरीवाल नहीं करना चाहते थे। अब जब उन्होंने इसे बेदी बनाम केजरीवाल कर दिया तो क्या हुआ? इससे न तो माहौल बदला और न राजनीति बल्कि फिर केजरीवाल बनाम मोदी की रणनीति पर ही लौटना पड़ा।

भाजपा ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार ऐसा चुना, जो केजरीवाल के मुकाबले तीसरे या चौथे नंबर का रहा है। अण्णा के आंदोलन में पहला अरविंद, दूसरा मनीष, तीसरा प्रशांत, चौथी किरण रही। अब आपने देखा कि पहले के मुकाबले चौथा फीका पड़ रहा है तो आप फिर मोदी को सामने ले आए। यह चुनाव अब फिर मोदी-बनाम केजरीवाल हो गया है। मोदी के मुकाबले केजरीवाल क्या है, इसका पता तो लोकसभा-चुनाव में वाराणसी ने ही दे दिया था। यों भी मोदी अभी भी वोटखेंचू नेता हैं। महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा में क्या किसी प्रांतीय नेता को आगे किया गया था? वहां भी मोदी के नाम पर भाजपा जीती थी।

तो दिल्ली में भी वह क्यों नहीं जीतती? उसकी जीत सुनिश्चित थी, लेकिन अब यदि भाजपा हारेगी तो उसका ठीकरा वह किरण बेदी के सिर पर नहीं फोड़ सकती। वह फूटेगा मोदी के माथे पर ही। चुनाव के इस आखिरी हफ्ते में दिल्ली में किसने दिन-रात एक किए हैं? मोदी और अमित शाह ने। उनकी सभाओं में ही भीड़ उमड़ी और उन्होंने ही दिल्ली के लोगों, कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार किया है।

यदि भाजपा जीत गई तो उसका सेहरा मोदी और शाह के सिर ही बंधेगा। किरण बेदी तो बस मद्धिम-सी किरण बनकर रह जाएंगी। जीत की स्थिति में भाजपा के सामने यह गंभीर प्रश्न उठ खड़ा होगा कि क्या उसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया जाए, जिसका भाजपा की जीत से कुछ लेना-देना नहीं है। इसमें शक नहीं कि भाजपा सबसे अधिक अनुशासित पार्टी है। उसकी दिल्ली शाखा के किसी बड़े नेता ने बगावत का झंडा खड़ा नहीं किया, लेकिन यदि जीत की स्थिति में उनकी नहीं सुनी गई तो अगले पांच साल दिल्ली में भाजपा को निरंतरता बनाए रखने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।

यदि दिल्ली में भाजपा जीतेगी भी तो उसकी जीत वैसी नहीं होगी, जैसी कि किरण बेदी के आने के पहले मानी जा रही थी। भाजपा को 50-60 सीटें मिलेगी, यह बात अब कोई गलती से भी नहीं कह रहा है। यदि जीत हुई तो ऐसी संकरी होगी कि पार्टी में जरा-भी असंतोष बढ़ा कि सरकार गिरने की नौबत आ जाएगी। यदि भाजपा ने जैसे-तैसे दिल्ली में सरकार बना ली तो मोदी सरकार पर भारत की जनता का विश्वास अभी भी अगले कुछ महीनों तक टिका रहेगा। पार्टी में भी मोदी-शाह राज पर ज्यादा उंगलियां नहीं उठेंगी, लेकिन यदि भाजपा दिल्ली में हार गई तो इसका सीधा प्रभाव मोदी और शाह की हैसियत पर पड़ेगा। यह है छोटे-से केंद्र-शासित राज्य का चुनाव, लेकिन मोदी और शाह ने इसमें अपनी इज्जत दांव पर लगा दी है। अनेक सांसदों और मंत्रियों को भी झोंक दिया है। दिल्ली की हार इन दोनों नेताओं की अखिल भारतीय हैसियत पर प्रश्न-चिह्न लगा देगी।

अब भाजपा, जैसी पिछले आठ-दस माह से चल रही है, वैसी नहीं चलेगी। उसकी चाल बदल जाएंगी। उसका लोकतांत्रीकरण बढ़ेगा। उसके बुजुर्ग और अनुभवी नेताओं की पूछ-परख भी बढ़ जाएगी। इससे भाजपा का लाभ ही होगा। अभी आम जनता का मोदी सरकार से जो मोह-भंग शुरू हुआ है, वह थमेगा। दिल्ली की ठोकर से भाजपा नेताओं की नींद खुलेगी।

यदि आम आदमी पार्टी दिल्ली में सत्तारूढ़ हो गई तो वह नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार पर अंकुश का काम करेगी। वह उसकी नाक में दम कर देगी। सरकारी स्तर पर तो केंद्र को उसके नखरे झेलने ही होंगे, प्रतिदिन जन-आंदोलनों की बारात भी सजती रहेगी। कोई आश्चर्य नहीं कि ‘आप’ ही देश के थके-मांदे विपक्ष का नेतृत्व करने लगे।

विपक्षी पार्टियों को शायद ‘तीसरा मोर्चा’ खड़ा करने की जरूरत ही न पड़े। ‘आप’ के नेतृत्व में वे सब मिलकर ‘दूसरा मोर्चा’ ही खड़ा कर लें। जाहिर है कि कांग्रेस चाहे संसद में सबसे बड़ा विपक्षी दल बनकर बैठी रहे, लेकिन जनता के बीच यही मोर्चा असली विपक्ष की तरह दनदनाने लगे। विपक्ष में इसकी प्रखरता मौजूदा विपक्ष से कहीं ज्यादा होगी। दिल्ली का यह चुनाव देश की राजनीति को नई दिशा दे सकता है। भारतीय लोकतंत्र के पौधे को यह नई ऊर्जा से सींच सकता है। मोदी सरकार का जितना प्रखर विरोध होगा, वह उतनी मुस्तैदी से काम करेगी। विपक्षी भूमिका होती भी यही है। इसीलिए तो उसकी दमदार मौजूदगी जरूरी है। तब केंद्र सरकार घर वापसी, गिरजों पर हमले, गोडसे-वंदन, चार बच्चों जैसे मुद्‌दों पर चुप नहीं बैठेगी। बोलेगी। पिछले आठ माह से चला आ रहा मधुमास (हनीमून) बहुत लंबा खिंच गया है। यदि विपक्ष की डोर कांग्रेस के हाथ में रही तो यह अभी दो साल लंबा भी खिंच सकता है, लेकिन ‘आप’ की दिल्ली-जीत इसे तुरंत छोटा कर देगी, जो भाजपा, देश और भारतीय लोकतंत्र- तीनों के लिए बहुत फायदेमंद होगी। यदि दिल्ली में “आप’’  हार भी गई तो संसद में चाहे जो विपक्ष हो, सड़क पर तो तगड़ा विपक्ष “आप” ही होगी।

वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

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