वतन को फिर गिरवी न रख देना वतन वालो

the-proud-indian-flag-300x246जमीं बेच देंगे जमां बेच देंगे
ये मुर्दों के सिर के कफन बेच देंगे।
कलम के सिपाही अगर बिक गये तो
वतन के ये नेता वतन बेच देंगे।।
सचमुच पी.डी.पी. के हाथों में धरती के स्वर्ग कश्मीर को जिस प्रकार मोदी ने दे दिया है और वहां के मुख्यमंत्री मुफ्ती ने मुफ्त में मिली कश्मीर की हुकूमत को पाकर जो बयान दिये हैं, उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि कलम के सिपाही जागे रहें, देश की नई हुकूमत भी वही कर रही है, जो अब तक होता आया है।
मोदी के इस कार्य से भारत की जनता अपने आपको कुछ ठगा सा अनुभव करने लगी है। कारण क्या है? कारण बहुत स्पष्ट है कि भाजपानीत गठबंधन की पूर्व केन्द्र सरकार जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत पर शासन कर रही थी तो काठमांडू से भारतीय विमान का अपहरण मुस्लिम आतंकियों द्वारा किये जाने पर ऐसे अपहरणकर्ताओं को तत्कालीन विदेशमंत्री जसवंत सिंह द्वारा बिरयानी खिलाकर व मेहमान नवाजी करते हुए अफगानिस्तान जाकर छोडक़र आना भारतीय जनता को पसंद नही आया था। इसका बदला जनता ने सन 2004 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को हराकर लिया था, तथा कांग्रेस को केन्द्र में सत्तासीन किया। कांग्रेस के भी कुकर्मों से दु:खी होकर देश की जनता ने सोचा-
है बहुत अंधियारा अब सूरज निकलना चाहिए।
जिस तरह से भी हो यह मौसम बदलना चाहिए।।
पर मौसम बदला नही और लगता है सूरज भी नही निकला।
भारत की जनता उस घटनाक्रम को भी शायद नही भुला पाएगी, जब भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, जो अपने आपको लौहपुरूष कहलवाना पसंद करते थे, तथा भावी प्रधानमंत्री का स्वप्न देख रहे थे, पाक में जिन्ना की मजार पर मोम को पिघलाकर जिन्ना को सबसे बड़ा ‘सैकुलरिस्ट’ बता कर आये थे, इसके बाद इस नेता का क्या हाल हुआ सब जानते हैं? इस ‘लौहपुरूष’ के कार्य को देखकर तो यही कहा जा सकता है-
वो जख्म सहा है जो गैरों का नही था।
वो जख्म लगे हैं कि जो खंजर के नही थे।।
पिछले लोक सभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी को भारत की जनता ने कुछ उम्मीदों के साथ वोट दिया था, उनमें सबसे बड़ी उम्मीद यही थी कि मोदी अटल और आडवाणी की गलतियों को दोहराएंगे नही।
बदलो उधर को जिधर की हवा हो।।
अपनी ही आवाज को बेशक कान में रखना।
लेकिन शहर की खामोशी भी ध्यान में रखना।।
कल तारीख यकीनन खुद को दोहराएगी।
आज एक-एक मंजर को पहचान के रखना।।
बहुत स्पष्ट शब्दों में कहें तो भारतीय जनता पार्टी को वोट नही दिया था, बल्कि मोदी के अंदर पनप रही एक विशेष छवि को जनता ने बहुत ही अपेक्षाओं के साथ पूर्ण बहुमत से केन्द्र की सत्ता में बैठा दिया। पूर्ण बहुमत इसलिए दिया कि आप के हाथ बंधे होने का तथा गठबंधन धर्म निभाने का बहाना समाप्त हो जाए। बदले में जनता क्या चाहती थी? जनता ये नही चाहती थी कि आप कांग्रेस को हटा दें। अगर कांग्रेस की जगह कोई और पार्टी भी राष्ट्रहित को अनदेखा करके कार्य करती होती तो उसका भी यही हश्र होता जो कांग्रेस का हुआ। हमने कांग्रेस को बता दिया-
हम अमन चाहते हैं मगर जंग के खिलाफ।
गर जंग लाजिम है तो फिर जंग ही सही।।
दिल टूटने से थोड़ी तकलीफ तो हुई।
मगर तमाम उम्र का आराम हो गया।।
विश्व में आतंक फैल रहा है, उस आतंक को फैलाने वाले कौन हैं? ये जनता भली भांति जानती है। उस आतंक का सफाया भारत के राज्य कश्मीर से कैसे हो? जनता को उस आतंक का सफाया करने वाला नेता चाहिए। जनता को डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का तत्कालीन केन्द्र में सत्तासीन नेहरू सरकार से अलग होकर कश्मीर की चिंता करना अच्छा लगता है। जी हां, वही मुखर्जी जिनके बलिदान को भाजपा छाती से लगाकर सत्ता से बाहर रहकर गला फाड़-फाडक़र चिल्लाती है-‘जहां हुए बलिदान मुखर्जी-वह कश्मीर हमारा है।’ पर अब कश्मीर को थाली में रखकर पीडीपी को सौंपते हुए देखकर लोगों के भीतर बकौल शायर यही विचार उमड़-घुमड़ रहे हैं-
काबा किस मुंह से जाओगे गालिब।
शर्म मगर तुमको नही आती।।
लेकिन भाजपा के लोग सत्ता में आते ही एजेंडे को भूल जाते हैं। जब ये 1998-99 में सत्ता आये थे तो कहते थे कि-‘सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे।’ इन लोगों ने बाद में ‘यू-टर्न’ लेकर कहना शुरू कर दिया कि राम मंदिर तो हमारे एजेंडे में ही नही था। जनता ने तब भी अपने आपको ठगा सा अनुभव किया था, और समय आने पर जवाब भी दिया। परंतु भाजपा के लोग अब फिर वही भूल कर रहे हैं कि धारा 370 हमारे एजेंडे में ही नही थी। बेशक ये एजेंडे में नही थी, ये तत्कालीन दृष्टि से सत्य हो सकता है, परंतु जनभावनाओं एवं जन अपेक्षाओं में यह बात प्रत्येक राष्ट्रभक्त नागरिक के अंतर्मन में समायी हुई है।
वतन की आरजू पर पारस देखो कौन करता है।
सुना है आज मकतल में हमारा इम्तहां होगा।।
मकतल में हमारे इम्तहां में मोदी सरकार पहली बार फेल हुई है। कश्मीर से धारा 370 को समाप्त किया जाना तथा भारत में एक प्रधान, एक विधान, और एक निशान को लागू कराना भारत की जनता मोदी से अपेक्षा करती है। इन जनभावनाओं पर मोदी को खरा उतरना होगा, वरना फिर वह दिन दूर नही जब 2004 के लोकसभा चुनावों का इतिहास दोहराया जाएगा। इसलिए इतिहास तब अपने आपको दोहराता है, जब हम इतिहास से सबक नही लेते हैं।
जमाने की गालिब यही एक राह है।
इस दरिया के आगे एक समुद्र और भी है।
और वह बेसाहिल है ये भी ध्यान में रखना।।
सत्ता में बैठकर जनता की अपेक्षाओं, जनभावनाओं के विपरीत कार्य करके जनता को बहकाना ज्यादा देर तक स्थायी नही है। समय रहते मोदी को संभलना होगा। जनता को डीजल, पेट्रोल कम कीमत पर मिले, महंगाई पर अंकुश लगे, कोयला ब्लाक से अधिकआय अर्जित हो। परंतु जनता को राष्ट्र की अस्मिता भी अक्षुण्ण चाहिए। राष्ट्र की अस्मिता पर प्रश्न चिन्ह आता है तो वह सहन करने योग्य नही है। कश्मीर का प्रश्न भारत की अस्मिता से जुड़ा है, भारत की जनता को यह जानने का अधिकार है कि कश्मीर में पी.डी.पी. के साथ सरकार बनाने की भाजपा की क्या मजबूरी थी? जिसके बनते ही पाक परस्ती सुनने को मिली। क्या उस मुफ्ती को मोदी जी ने रोका? यदि नही तो क्यों नही रोका? उक्त बिन्दु की ओर दृष्टिपात है।
सांप और वो भी आस्तीनों के।
ये देखिये तो हमने कितनी खूबसूरती से पाले हैं,
कि कुछ तो फैला चुके हैं जहर अपना
और जो बच गये हैं वो डसने वाले हैं।।
करीब सात माह पूर्व भाजपा नीत केन्द्र सरकार ने पाक से सचिव स्तर की वार्ता रोक दी। अब पुन: शुरू करने जा रहे हैं। क्या पाक की हरकतों में कोई परिवर्तन आ गया है या हम स्वयं निर्णय नही ले पा रहे हैं, या कोई परदे के पीछे से डोर हिला रहा है। यदि ऐसा है तो भारत की संप्रभुता का प्रश्न पैदा होता है। जो भारत की संविधान की शपथ लेकर अक्षुण्ण बनाने का प्रण लिया जाता है, इस पर भी देश की जनता भाजपा नीति पर स्पष्टीकरण लेना चाहती है। कहीं ऐसा ना हो जाए-
न खुदा ही मिला न विसाले सनम।
ना इधर के रहे ना उधर के रहे।।
बजा कहे जिस आलम से बजा कहो।
जुबाने खलक को नक्कारा ए खुदा समझो।।
भाजपा के लोग यह गलती नही करेंगे कि जनता तो भोली-भाली होती है, क्योंकि जनता उचित समय पर उचित निर्णय ले लेती है। भाजपा के लोग अगले दस वर्ष तक सत्ता में रहने का ख्वाव देख रहे हैं, परंतु जनता को अब से ही निराशा सताने लगी है, फिर इनके दूसरे कार्यकाल की क्या गारंटी है? आतंकी घटनाओं पर-
संग्राम यहां भीषण होगा
याचना नही अब रण होगा
फिदा वतन पर जो हो आदमी दिलेर है वो
जो यह नही तो फखत हड्डियों का ढेर है वो।।
मोदी जी! आपसे देश की जनता पी.डी.पी. जैसे नागों के साथ चलने की अपेक्षा नही करती थी, आपसे यह अपेक्षा भी नही थी कि आप धारा 370, समान नागरिक संहिता, हिन्दुत्व और राममंदिर को भुला देंगे। यदि आपने भी ऐसा किया है तो कहना पड़ता है-
वतन को फिर गिरवी न रख देना वतन वालो।
शहीदों ने बड़ी मुश्किल से कर्ज चुकाया है।।
ईश्वर करे सद्बुद्घि लौट आये देश के रहनुमाओं की।

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