वेदादि आर्ष ग्रंथों में केवल ओंकार की ही उपासना का विधान है

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*वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण ग्रंथ, महाभारत गीता, योगदर्शन, मनुस्मृति में एक “ओंकार का ही स्मरण और जप” करने का उपदेश दिया गया है।*


वेदाध्ययन में मन्त्रों के आदि तथा अन्त में ओ३म् शब्द का प्रयोग किया जाता है।
यजुर्वेद में कहा है-
*ओ३म् क्रतो स्मर ।।-(यजु० ४०/१५)*
“हे कर्मशील ! ‘ओ३म् का स्मरण कर।”
यजुर्वेद के दूसरे ही अध्याय में यह आज्ञा है-
*ओ३म् प्रतिष्ठ ।।-(यजु० २/१३)*
” ‘ओ३म्’ में विश्वास-आस्था रख !”
*ओ३म् खं ब्रह्म*-(यजु० ४०/१७)
अर्थात् “मैं आकाश की तरह सर्वत्र व्यापक और महान् हूं मेरा नाम ओम् है।”
आत्मा में विराजमान इस परमात्मा को धीर पुरुष परा विद्या से साक्षात्कार किया करते हैं;क्योंकि यह ओ३म् इन्द्रियातीत है।
वह नित्य,विभु,सर्वव्यापक,सूक्ष्म,अव्य तथा सब प्राणियों का कारण है।
वह गोत्र,वंश,आंख,कान,हाथ,पांव से रहित है।
वह संसार की बीज शक्ति है।वह अशरीर है।वह नाड़ी आदि बन्धनों से जकड़ा नहीं है।वह मलरहित है।
पाप उसको बांध नहीं सकते।कोई स्थान उससे रिक्त नहीं।
उसका कोई उत्पादक नहीं है।
वह सवयं अपना स्वामी है।उसने अपनी सनातन प्रजाओं के लिए पदार्थों का ठीक ठीक रीति से विधान बनाया है। यजु: ४०/८
इन सभी मन्त्रों में ओ३म् नाम के स्मरण करने की ही स्पष्ट आज्ञा है।
***
*प्रश्नोपनिषद् में*:-पिप्पलाद ऋषि सत्यकाम को कहते हैं-
हे सत्यकाम ! ओंकार जो सचमुच पर और अपर ब्रह्म है (अर्थात्) उसकी प्राप्ति का साधन है जो उपासक उस सर्वव्यापक परमेश्वर का ओ३म् शब्द द्वारा ध्यान करता है,वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।जो कृपासिन्धु,परमात्मा,अजर अमर अविनाशी सर्वश्रेष्ठ है,उस सर्वज्ञ अन्तर्यामी परमात्मा को सर्वसाधारण ओंकार के द्वारा प्राप्त होते हैं।
*कठोपनिषद -* सभी वेद जिस परमपद का बारंबार प्रतिपादन करते हैं सभी तप जिस पद का लक्ष्य करते हैं , जिसकी इच्छा से ब्रह्मचर्य का पालन होता है – उस परमपद को संक्षेप में “ओ३म्” कहा जा रहा है ।
अर्थात् यह अक्षर ही ब्रह्म तथा परब्रह्म है ।
(क्षर अर्थात् नाशवान तथा अक्षर या शाश्वत सनातन ) ओंकार ही परब्रह्म प्राप्ति का श्रेष्ठ आलंबन है। इसके अवलंबन से महान ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है ।
*माण्डूक्योपनिषद्*:-ओंकार धनुष है,आत्मा तीर है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहलाता है।इसको अप्रमत्त(पूरा सावधान) पुरुष ही बींध सकता है,जब वह तीर के समान तन्मय हो जाता है।
*श्वेताश्वतर उपनिषद्*:-
अपने देह को अरनी(नीचे की लकड़ी) बनाकर ओ३म् को ऊपर की अरनी बनाओ और ध्यान रुपी रगड़ के अभ्यास से अपने इष्टदेव परमात्मा के दर्शन कर लो।जैसे छिपी हुई अग्नि के रगड़ से दर्शन होते हैं वैसे ही “ओ३म्” द्वारा इस देह में आत्मा का दर्शन किया जा सकता है।
*छान्दोग्योपनिषद्*:-छान्दोग्योपनिषद् का भी जो सामवेद के महाब्राह्मण का एक भाग है,यही कथन है कि-
“वह साधक जब उसे ब्रह्मलोक को जाना होता है,जिसे उसने उपासना द्वारा जाना है, ओ३म् पर ध्यान जमाता हुआ वहां जाता है” अतः प्रत्येक व्यक्ति को उचित है कि उस अविनाशी स्तुत्य “ओ३म्” नामक ब्रह्म की उपासना करे।
*तैत्तिरीयोपनिषद्*:-ओ३म् ब्रह्म का नाम है। ओ३म् ही सार वस्तु है।यज्ञ में इसी को सुनते सुनाते हैं। सामवेदी ओ३म् को ही पाते हैं। ऋग्वेदी भी इसी ओ३म् की ही स्तुति करते हैं। यजुर्वेदी अध्वर्यु भी अपने प्रत्येक वचन में ओंकार का ही बखान करते हैं।ब्रह्मा नामक ऋत्विक् ओंकार द्वारा ही आज्ञा देता है।अग्निहोत्र के लिए ओंकार के द्वारा ही आज्ञा दी जाती है।ब्रह्मवादी ओ३म् के द्वारा ही ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
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*महर्षि पतञ्जलि योगदर्शन-* 1/27 में कहते हैं – तस्य वाचकःप्रणवः । ध्यान दीजिए, तस्य नाम प्रणवः नहीं कह रहे हैं । “ओ३म्” को ही प्रणव कहा गया है ।इसके विधि पूर्वक जप से सभी अभीष्ट सिद्धिया प्राप्त होती हैं तथा चारों पुरुषार्थ संपन्न किया जाता है ।
*योगी याज्ञवल्क्य*:-
जो ब्रह्म दिखाई नहीं देता और जो मन के द्वारा अनुभव नहीं होता,जिसका अस्तित्व सिद्ध है,केवल मनन द्वारा ही पहचाना जाता है।उसी का ओंकार नाम है।उसी के नाम पर आहुति देने से वह प्रसन्न होता है।
***
*महाभारत में -* महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि
जिज्ञासु वेद पढ़ते हुए और ओ३म् का जप करते हुए योग में मग्न और योग समाधि में भी ओ३म् का ध्यान करें। इस जप और योग के द्वारा ही परमात्मा का ज्ञान होता है।
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*गीता*:-
हे अर्जुन ! जो मनुष्य इस एकाक्षर ब्रह्म ‘ओ३म्’ को कहते हुए और उसके द्वारा अन्त समय ब्रह्म को याद करते हुए इस शरीर को त्याग देते हैं,वह परमगति को प्राप्त होते हैं। -(८/१३)
यह ओंकार जानने के योग्य और परम पवित्र है इसी प्रकार इस ब्रह्मज्ञान के लिए ऋग्वेद,यजुर्वेद और सामवेद जानने के योग्य हैं।-(९/१७)
ओ३म् तत् सत् इन तीनों पदों से ब्रह्म का निरुपण होता है,अतः ब्रह्मवादियों के यज्ञ,दान,तप आदि समस्त शुभ कर्मों का आरम्भ ओ३म् से होता है।-(१७/२३/२४)
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*यजुर्वेद का शतपथ ब्राह्मण*:-
सर्वव्यापक सर्वज्ञ सर्वान्तर्यामी सर्वरक्षक ‘ओ३म्’ ब्रह्म सबसे महान् है।यह सबसे बड़ा है।सबसे प्राचीन तथा सनातन है.वही सबका प्राणदाता है।ओंकार शब्द ही वेदस्वरुप है।इसी ओ३म् के द्वारा समस्त ज्ञेय (जानने योग्य) पदार्थ जाने जा सकते हैं।
*सामवेद का ताण्डय् महाब्राह्मण*:-जो कोई यथार्थ रुप से ओंकार को नहीं जानता वह वेद के आश्रित नहीं रहता अर्थात् धर्म के अधीन न रहकर संसार में अधर्म तथा उपद्रव फैलाने वाला हो जाता है,परन्तु जो ओंकार को इस प्रकार से जानता है वह वेद के आश्रित रहकर संसार का उपकार करता है।
इसी ब्राह्मण में अलंकार रुप से ओ३म् की महिमा का वर्णन करते हुए यह दर्शाया है कि किस प्रकार ओ३म् के आश्रय में आने और उसके द्वारा ब्रह्म को जानने से दैनिक देवासुर संग्राम में मनुष्य को विजय तथा सफलता प्राप्त होती है।
*अथर्ववेद का गोपथ ब्राह्मण* :- गोपथ ब्राह्मण में ओ३म् की महिमा विशेष ध्यान देने योग्य है। यथा श्लोक (गो० 1/22) जिसके अर्थ इस प्रकार हैं-
जो ब्रह्मोपासक इस अक्षर ‘ओम्’ की जिस किसी कामना पूर्ति की इच्छा से तीन रात्रि उपवास रखकर तेज-प्रधान पूर्व दिशा की ओर मुख करके, कुशासन पर बैठकर सहस्र बार जाप करता है उसके सब मनोरथ (शुभ कामनाएं) सिद्ध होते हैं।
इस कथन में जप करने के विधान का उपदेश भी किया गया है।
आजकल प्रायः सभी जिज्ञासु जप करने की विधि जानना चाहते हैं,उनके लिए यह सुगम विधि है।
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*मनुस्मृति (अध्याय १२, श्लोक- १२२,१२३)-* जो सबको शिक्षा देने हारा, सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्वप्रकाशस्वरूप, समाधिस्थ, वृध्दि से जानने योग्य है, उसको परम पुरूष अर्थात परमात्मा जानना चाहिए। और स्वप्रकाश होने से “अग्नि” , विज्ञानस्वरूप होने से “मनु”, और सबका पालन करने से “प्रजापति”, और परमैश्वर्यवान होने से “इंद्र”, सबका जीवनमूल होने से “प्राण” और निरंतर व्यापक होने से परमेश्वर का नाम “ब्रह्मा” है।
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*अन्य मत मतान्तरों में ओ३म्*
अन्य मत मतान्तरों में भी ओ३म् की महिमा और ओ३म् का परिवर्तित नाम विद्यमान हैं।मुसलमानो़ में आमीन, यहूदियों का एमन, सिक्खों का एक ओंकार, अंग्रेजों का Omnipresent,Omnipotent,Omniscient ।
*सम्पूर्ण विश्व में ही नहीं,सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ओ३म् शब्द की महिमा है।विपत्ति में,मृत्यु में,ध्यान के अन्तिम क्षणों में बस ओ३म् ही शेष रह जाता है,शेष सब मन्त्र, ज्ञान-विज्ञान धूमिल हो जाता है।पौराणिकों की मूर्तियों व मन्दिरों के ऊपर ओ३म्, आरती में ओ३म्, नवजात शिशु के मुख में ओ३म्, सब स्थानों में ओ३म् ही ओ३म् है।*

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