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इतिहास के पन्नों से

बहादुर शाह जफर और 1857 क्रांति

बहादुर शाह ज़फर (1775-1862) भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह, और उर्दू के जानेे-माने शायर थे। उन्होंने 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व तो किया मगर काफी हील हुज्जत के बाद ,क्योंकि तब तक उनको बुढ़ापा आ चुका था ,उनका उत्साह पुराना हो चुका था। युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) यंगून ( रंगून)भेज दिया , कुछ वर्ष बाद यही उनकी मृत्यु हुई ।
जब मेजर हडसन मुगल सम्राट को गिरफ्तार करने के लिए हुमायूं के मकबरे में जा पहुंचा, जहां पर बहादुर शाह ज़फर अपने दो बेटों के साथ छुपे हुए थे, तो उसने (मेजर हडसन) को स्वयं उर्दू का थोड़ा ज्ञान रखता था , उसने कहा –
“दमदमे में दम नहीं है ख़ैर मांगो जान की
.. ऐ ज़फर ठंडी हुई अब तेग हिंदुस्तान की..”

इस पर ज़फ़र ने उत्तर दिया-

“ग़ज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की..
तख़्त ऐ लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की.”

7 नवंबर 1862 को बहादुरशाह जफर का जब रंगून में देहांत हुआ तो उन्होंने उस समय लिखा थाबी कि :–

कितना है बदनसीब ज़फर दफन के लिए
दो गज जमीन भी न मिली कूए यार में।

इन पंक्तियों में उनकी देशभक्ति के साथ ही अपनी माटी के लिए उनकी दिली मुहब्बत भी झलकती है।
उसी प्रकार दिल्ली के लालकिले को छोड़ते समय भी बहादुरशाह जफर ने बड़े मार्मिक शब्दों में कहा था :–
दरो दीवार को बड़ी हसरत से नजर करते हैं।
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं।।

कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य।

भारत की आजादी के क्रांतिकारी आंदोलन में बचपन में जिनका नाम भूप सिंह राठी जो इंदर सिंह राठी प्रधानमंत्री माला गढ़ नवाब का पोता और हम्मीर सिंह राठी का पुत्र था, इस विजय सिंह पथिक का भी विशेष योगदान रहा । उनका जन्म 18 82 में बुलंदशहर के गुठावली नामक गांव में हुआ था । उन्होंने जिस प्रकार का आंदोलन चलाया था । उसका लाभ आगे चलकर गांधी जी और उनके साथियों ने उठाया । परंतु इस क्रांतिकारी व्यक्तित्व को उपेक्षा के कूड़ेदान में फेंक दिया गया ।
विजय सिंह पथिक की प्रेरणा पर राजस्थान सेवा संघ के कार्यकर्ता साधु सीताराम दास, रामनारायण चौधरी ,हरिभाई किंकर, माणिक्य लाल वर्मा ,नयन राम शर्मा ने बेगा सर प्रथा, भारी लगान अनेक लागत और छोटे जागीरदारों द्वारा किए अत्याचारों से जनता को छुटकारा दिलाने के लिए आंदोलन व सत्याग्रह प्रारंभ किए और जेल की यातनाएं सही।
आधुनिक विश्व में यदि विजय सिंह पथिक को सत्याग्रह का जन्मदाता कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी । भारत में सबसे पहले श्री पथिक ने बिजौलिया सत्याग्रह का सूत्रपात किया था ।
बिजोलिया सत्याग्रह की यह घटना 1916 की है।
बाद में गांधीजी ने इसी सत्याग्रह शब्द को पकड़ा और अपने राजनीतिक जीवन में कई बार सत्याग्रह किया । जब उनसे किसी पत्रकार ने पूछा कि सत्याग्रह का अर्थ क्या है ? तब उन्होंने कहा था कि यदि इसका अर्थ जानना चाहते हो तो विजय सिंह पथिक से जाकर पूछो ।
बाद में जोरावर सिंह , प्रताप सिंह बारहठ , पंडित अभिन्न हरी , शंभू दयाल सक्सेना, बेनी माधव शर्मा , रामेश्वर दयाल सक्सेना , अर्जुन सिंह वर्मा , हीरालाल जैन , भेरूलाल , काला बादल , जोरावर मल जैन , कुंदनलाल चोपड़ा , श्याम नारायण सक्सेना , तनसुख लाल मित्तल , सेठ मोतीलाल जैन , शिव प्रताप श्रीवास्तव , गोपाल लाल , संत नित्यानंद मेहता, गोपाल लाल कोटिया और मांगीलाल भव्य आदि अनेक नेता और कार्यकर्ता स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हाडोती के जनमानस पर अपना अच्छा प्रभाव डालने में सफल हुए।
छात्र नेताओं में नाथूलाल जैन, सुशील कुमार त्यागी, सीताशरण देवलिया , रमेश , अनिल , इंद्र दत्त स्वाधीन , पंडित बृज सुंदर शर्मा ,रामचंद्र सक्सेना आदि अनेक नवयुवक छात्र राष्ट्र सेवा के क्षेत्र में उतरे। जिन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से श्री विजयसिंह पथिक और केसरीसिंह बारहट के अनुपम त्याग और बलिदान से प्रेरणा मिलती रही।
इस क्रांति में दोनों पक्षों के 100000 से अधिक व्यक्ति मृतक हुए थे। यह वास्तव में सैनिक विद्रोह नहीं कहा जा सकता बल्कि भारतीय जनमानस की स्वतंत्रता प्राप्ति की प्रबल इच्छा इसमें दृष्टिगोचर होती है। इस क्रांति को पूर्णतया सफल बनाने के लिए क्रांति की योजना पर कार्य करते हुए नाना साहब ने वाराणसी, इलाहाबाद ,बक्सर, गया ,जनकपुर ,जगन्नाथपुरी, नासिक, आबू ,उज्जैन, मथुरा आदि की यात्रा की थी। और भारतीय जनमानस को क्रांति के लिए प्रेरित किया था। मानव साहब ने दिल्ली में बहादुर शाह जफर और उनकी बेगम जीनत महल से भी भेंट करके गुप्त वार्ता की थी वहीं से वे अंबाला मेरठ होते हुए अप्रैल 457 को लखनऊ और वापसी में कालपी होते बिठूर पहुंचे थे। इसी क्रांति को लेकर तात्या टोपे की योजना का विस्तृत विवरण पहली बार उनके ही वंशज पराग टोपे ने अंग्रेजी में प्रकाशित अपनी पुस्तक” तात्याज ऑपरेशन रेड लोटस” में प्रस्तुत किया है।
यह प्रश्न अलग है कि 18 57 की सशस्त्र क्रांति अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में पूर्णतया सफल नहीं रही परंतु इतना ही सत्य है कि भारतीय जनमानस में राष्ट्रवाद की भावना को पुनर्जागरण करने में और पुनर्स्थापित करने में किस क्रांति का महत्वपूर्ण योगदान है।
इतिहास में अमर हो गए 18 57 के सभी बलिदानी। इसलिए 10 मई 18 57 की तारीख भारत के इतिहास में अमिट रहेगी। भारतीयों में शताब्दियों से जो राष्ट्रवाद सुसुप्त अवस्था में पहुंच चुका था ।उसका पुनर्जागरण 10 मई 1857 को हुआ जिसमें एक भाव से एक उद्देश्य की प्राप्ति हेतु अपने पूर्ण आवेश और आवेग से स्त्री पुरुष आभार वृद्ध इस क्रांति को सफल बनाने में अपनी-अपनी आहुतियां डाल रहे थे। और 18 57 के यह सभी क्रांतिकारी भारत के स्वतंत्रता की नींव रखने में सफल हो गए थे ।इसको इस दृष्टिकोण से भी देखना और पढ़ना चाहिए। विदेशी आक्रांता उनके प्रति चाहे वह अंग्रेज हो अथवा अन्य मुसलमान आक्रांता हूं सभी के प्रति विद्रोह और संघर्ष की भावना भारत के लोगों में सुलग रही थी। यद्यपि अंग्रेजो के खिलाफ हिंदू मुस्लिम दोनों ने ही मिलकर भारत की स्वतंत्रता का प्रयास किया था जो प्रशंसनीय है।
अंग्रेजों ने हिंदू और मुसलमानों को अलग अलग करने के लिए और भारतीय राष्ट्रवाद को हिंदू राष्ट्रवाद और मुस्लिम राष्ट्रवाद में बांटने की भी भरपूर कोशिश की थी। वस्तुतः स्वदेशी के प्रति एवं स्वदेशी शासन के प्रति लोगों में जागृति आ चुकी थी अपने मूल्यों अपनी भाषा और अपनी संस्कृति पर विदेशी मूल्य भाषा संस्कृति आक्रमण करें यह भारतीय लोगों को पसंद नहीं थी।

साहित्यकारों का योगदान

साहित्यकारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र , गणेश शंकर विद्यार्थी , श्यामलाल गुप्त मुंशी प्रेमचंद , विष्णु दामोदर सावरकर, डॉ रामविलास शर्मा, प्रमोद भार्गव, मराठी लेखक माधव साठे, मोहम्मद जाकिर हुसैन, केसी यादव, सुरेश मिश्रा, डॉ उदय प्रकाश अरोड़ा एस.एन.आर. रिजवी, अमृतलाल नागर ,मोतीलाल भार्गव, विष्णु भट्ट गौडसे, वृंदावन लाल वर्मा, प्रताप नारायण श्रीवास्तव, महाश्वेता देवी आदि अनेक ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने निज भाषा ,निज देश,और निज राजा की हिमायत की है तथा गुलामी को अनुचित बताया है। साहित्य साधना से राष्ट्र के प्रति कर्तव्य का बोध समाज को कराया।
विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि विष्णु दामोदर सावरकर की 1857 का स्वतंत्रता समर, कार्ल मार्क्स की भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, डॉ रामविलास शर्मा की सन 57 की राज्यक्रांति और मार्क्सवाद ,पीसी जोशी की विद्रोह 1857, प्रमोद भार्गव की पुस्तक 1857 का लोक संग्राम और रानी लक्ष्मीबाई, मराठी लेखक माधव साठे ने नाना साहब पेशवा 18 57 की क्रांति में मेरठ की घटनाओं का वर्णन , विलियम टेलर ने पटना में 18 57 की बगावत ,मोहम्मद जाकिर हुसैन की 18 57 बिहार की पत्रकारिता, केसी यादव की 1857 पंजाब हरियाणा हिमाचल की भूमिका, सुरेश मिश्र की 18 57 मध्यांचल के विस्तृत सूरमा, डॉक्टर उदय प्रकाश अरोड़ा आरएनआरएसवी द्वारा संपादित 1857 रुहेलखंड प्रमुख पुस्तकें हैं।
तिलक नारा दे रहे थे कि स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है तो भारतेंदु हरिश्चंद्र -” निज भाषा उन्नति अहै सब भाषा को मूल”- समझा रहे थे।
गणेश शंकर विद्यार्थी 1826 में शुरू हुए ‘उदंत मार्तंड’ साप्ताहिक हिंदी अखबार का प्रकाशन किया करते थे और संपादन में निकले प्रताप राष्ट्रीय कवि माखनलाल चतुर्वेदी के संपादन में निकले कर्मवीर काला काकर से राजा राम पाल सिंह के द्वारा निकाले गए ‘हिंदुस्तान’ ने राष्ट्र वादियों में स्वतंत्रता का बिगुल फूंका । बंगदूत , अमृत बाजार पत्रिका , केसरी, हिंदू , पायनियर , मराठा , इंडियन मिरर और हरिजन आदि पत्र ब्रिटिश हुकूमत की गलत नीतियों की खुलकर आलोचना करते थे । 1857 में ही निकले ‘पयाम ए आजादी’ ने आजादी की पहली जंग को धार दी । पहाड़ में बद्री दत्त पांडे अल्मोड़ा अखबार से क्रांति का उद्घोष कर रहे थे तो गणेश शंकर विद्यार्थी , महावीर प्रसाद द्विवेदी , बनारसीदास चतुर्वेदी साहित्यकारों को स्वाधीनता संघर्ष से जोड़ रहे थे।
राष्ट्रकवि दिनकर जैसे कवियों ने अपनी राष्ट्रवादी रचनाओं से स्वाधीनता सैनानियों का पथ प्रशस्त किया । माखनलाल चतुर्वेदी की इन पंक्तियों को भला कौन भूल सकता है –
‘ मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर तुम देना फेंक ,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जाएं वीर अनेक ।।
भारतेंदु द्वारा लिखे गए नाटक अंधेर नगरी और ‘भारत दुर्दशा’ के प्रदर्शन में अंग्रेजी राज्य की लूट को जनता में उजागर किया। श्यामलाल गुप्त पार्षद कानपुर के एक छोटे से नगर नरवल में बैठकर –
” विजयी विश्व तिरंगा प्यारा ,
झंडा ऊंचा रहे हमारा ।
का ख्वाब देख रहे थे । बेतिया से गोपाल सिंह नेपाली की आवाज गूंज रही थी :– मेरा धन है स्वाधीन कलम । राज्यों की एक नई टोली आजादी की सुबह की टोह निकल पड़ी थी । स्वतंत्रता , स्वराज , समानता का सपना हमारे लेखकों , कवियों के मन में था । उसे पंडित नरेंद्र शर्मा , केदारनाथ अग्रवाल , नागार्जुन , माधव शुक्ल , गया प्रसाद शुक्ल , स्नेही सियारामशरण गुप्त , सोहनलाल द्विवेदी अपनी रचनाओं में रूपांकित कर रहे थे । नवीन की रचनाएं आज के प्रवाह को गति देने वाली थीं तो सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता – खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी , – सैनिकों में जोश भरने वाली थी । झांसी की रानी का चित्र ऐतिहासिक उपन्यासकार वृंदावनलाल वर्मा ने अपने उपन्यास में किया । चंद्रगुप्त स्कंदगुप्त में देश प्रेम की अनुगूंज हैं तो इनके गुलामी की कारा को तोड़ने का आह्वान मिलता है।
1917 की रूस की बोल्शेविक क्रांति ने हिंदुस्तानी लेखकों में गतिशीलता का जज्बा पैदा किया और प्रेमचंद इसी दौर की उपज हैं । उन्होंने कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से जहां भारत के सामंतवाद और ब्रिटिश नौकरशाही की आलोचना की , वहीं गुलामी में ब्रिटिश शोषण के अनेक रूपों को भी उजागर किया । यशपाल व भगवतीचरण वर्मा के कथा साहित्य में भी स्वाधीनता की आंच दिखती है। मुंशी प्रेमचंद जी का ‘सोजे वतन’ जो अंग्रेजी शासन में जब्त हुआ था । इसी प्रकार ‘चांद पत्रिका’ का फांसी अंक भी जब्ती का शिकार हुआ । हिंदी में लिखे गए साहित्य को हम युद्ध साहित्य तो नहीं कह सकते , पर देश के नागरिकों में स्वाधीनता राष्ट्र के प्रति प्रेम जगाने के लिए हिंदी के कवियों ने अनुपम योगदान दिया है । निराला लिख रहे थे — ‘भारती जय विजय करे’ तो जगदंबा प्रसाद हितेषी कह रहे थे –

‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले ।
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशा होगा।।

बालकृष्ण शर्मा नवीन कवियों से क्रांति का आवाहन कर रहे थे ।स्वतंत्रता सेनानियों साहित्यकारों , पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की संगठित पहल का ही परिणाम था जो भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त कर पाया ।
सजायाफ्ता क्रांतिकारी मन्मथ नाथ गुप्त ने बरेली जेल के भीतर रहकर ही काकोरी शहीदों पर अपनी पहली पुस्तक की रचना की । जिसे वहां बंदी रहे बंगाल के क्रांतिकारी गणेश घोष के छूटने पर उनके हाथ बाहर भिजवाया । लेकिन वह पुस्तक छपते ही जब्त हो गई । पेशावर कांड के विख्यात क्रांतिकारी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने अपनी पत्नी भागीरथी देवी पर इसी जेल में रहते हुए एक अद्भुत संस्मरणों से भरी साहित्य नामक पुस्तक की रचना की जो अब अप्राप्य है।

काला पानी की दारुण कथा

शचिंद्र नाथ सान्याल ने अंडमान से लौटकर ‘बंदी जीवन’ की रचना की । जो उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण चर्चित कृति है । ‘अंडमान की अधूरी गाथा’ क्रांतिकारी रामचरण लाल शर्मा ने लिखी । जिसमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद के रोंगटे खड़े करने वाले अत्याचार हैं प्रसिद्ध क्रांतिकारी उत्तम आलोकनाथ चक्रवर्ती ने ‘जेलों में 30 वर्ष’ नामक पुस्तक की रचना की । उनका इतने दिन जेल में रहना रिकॉर्ड है । क्रांतिकारी नलिनी दास ने भी ‘अंडमान की गाथा’ को विस्तार से लिखा । जिसमें वहां के नारकीय जीवन के अतिरिक्त उनके व अन्य क्रांतिकारियों के संघर्ष और बलिदान का आंखें खोल देने वाला ब्यौवरा है । अंडमान में रहे अनेक क्रांतिकारी यदि अपनी जीवन गाथा दर्ज नहीं करते तो हम यह जान ही नहीं पाते कि राम रखा ,इंदु भूषण , मोहित मित्र , भानसिंह , हेमचंद्र भट्टाचार्य मोहन किशोर , नमोदास , भूषण नंदी , उल्लासकर दत्त, नानी गोपाल , महावीर सिंह पंडित परमानंद , यासिर अली और पंजाब के क्रांतिकारी देशभक्तों ने देश की स्वतंत्रता के लिए उस टापू पर कितने दारुण दुख झेले ? – उल्लासकर को तो तकलीफों और उत्पीड़न ने पागल कर दिया । हमें सबसे ज्यादा हैरान करता है बंगाल के क्रांतिकारियों का लिखा वह साहित्य जिसकी रचना कालापानी कहे जाने वाले उस टापू पर रहते हुए की गई थी । अरविंद के भाई थे वरिंद्र जो खुद भी बड़े क्रांतिकारी हुए । वरिंद्र दल के एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी थे ।उपेंद्र बनर्जी जो कालापानी से लौटकर सफल पत्रकार बने , उनकी गणना महत्वपूर्ण साहित्यकारों में की जाती है। उन्होंने ‘अंडमान की कहानी’ लिपिबद्ध की जो सचमुच दिल दहला देने वाली है । इसमें महात्मा नंदगोपाल को कोल्हू में तेल पेरने के अतिरिक्त अन्य बहुत सारी यातनाएं दर्ज हैं । नंद गोपाल इलाहाबाद से छपने वाले ‘उर्दू स्वराज्य’ के संपादक थे । उपेंद्र ने उन्हें सत्याग्रह में गांधी जी का सहयोगी कहा था। उपेंद्र की आत्मकथा अद्भुत है । बंगला का आत्मकथा साहित्य वैसे भी बहुत समृद्ध है , लेकिन उपेंद्र को जाने बिना उसका क्रांतिकारी संघर्ष से परिचित होना नहीं कहा जा सकता जो बंगाल की धरती पर निरंतर और देर तक लड़ा गया।
यदि कालापानी का जिक्र करते हैं तो स्वातन्त्र्य वीर सावरकर को भी नहीं भूल सकते। जिन्होंने 1857 की क्रांति के 50 वर्ष पश्चात पूर्ण होने के अवसर पर 1907 में इस क्रांति को भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम घोषित करते हुए ब्रिटेन में रहते हुए ही पुस्तक लिखी थी । यह भी उतना ही सत्य है कि हम इस छोटे से लेख में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के कारण और उसमें भाग लेने वाले प्रत्येक शहीद का वीर का उल्लेख कर सके , इसलिए सभी सुधि पाठकों से क्षमा चाहता हूं कि अभी भी बहुत सारा इस पर लिखा जा सकता है ।
नेति -नेति।
अंत में इतना ही कहूंगा :-

उनकी तुरबत पर एक दिया भी नहीं ,
जिनके खून से जले थे चिराग ए वतन ।
आज दमकते हैं उनके मकबरे ,
जो चुराते थे शहीदों का कफन।।

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन : उगता भारत

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