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भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास

पानीपत का तृतीय युद्ध

भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भाग …. (अध्याय – 16)

पा नीपत भारतीय इतिहास का एक प्रमुख स्थल है। जिसने कई बार भारतीय इतिहास को परिवर्तन की दिशा देने का काम किया है। यह अलग बात है कि परिवर्तन सदा हमारे अनुकूल ना रहा हो, लेकिन परिवर्तन तो परिवर्तन है। पानीपत का तीसरे युद्ध भी इतिहास में विशेष महत्व रखता है। यह युद्ध अफगानिस्तान के तत्कालीन शासके अहमदशाह अब्दाली और मराठों के बीच हुआ था।

इस युद्ध में मराठा साम्राज्य की ओर से सदाशिवराव भाउ युद्ध कर रहे थे। वास्तव में अफगानिस्तान के अहमदशाह अब्दाली, जिसे अहमद शाह दुर्रानी भी कहा जाता है, ने भारत की संप्रभुता पर यह हमला किया था। जिसे रोकना उस समय की भारत वर्ष की सबसे बड़ी शक्ति मराठा साम्राज्य का सबसे बड़ा दायित्व था। अहमद शाह अब्दाली दुस्साहस करते हुए हिंदुस्तान के हृदय अर्थात दिल्ली की ओर बढ़ता आ रहा था। यह युद्ध सदाशिवराव भाऊ और अहमद शाह अब्दाली के मध्य 14 जनवरी, 1761 को वर्तमान हरियाणा में स्थित पानीपत के मैदान में हुआ। भारत की संप्रभुता पर किए गए इस हमले का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह था कि इस युद्ध में दोआब के अफगान रोहिला और अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अहमदशाह अब्दाली का साथ दिया था। इसके उपरांत भी इन ‘जयचंदों’ को इतिहास में घृणा की दृष्टि से नहीं देखा जाता। उनके इस देशद्रोही कृत्य को बड़े सहज भाव से उल्लेखित कर दिया जाता है कि जैसे उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। पानीपत के युद्ध में ही नहीं, अपितु अन्य भी कई युद्धों में हम केवल अपने ‘जयचंदों’ के कारण ही हारे हैं। अतः ऐसे देशद्रोही जयचंदों के विरुद्ध इतिहास में उपेक्षा का व्यवहार किया जाना अपेक्षित है। तनिक ध्यान दें-

छल छन्द जयचंद की दुष्ट परंपरा हाय।
कर हृदय छलनी दिया भारत माँ डकराय ।।

मराठों ने अपनी देशभक्ति, वीरता और साहस का परिचय देते हुए 1680 से लेकर 1770 तक मुगल साम्राज्य का अंत कर दिया था। इस प्रकार 90 वर्ष के इस स्वतंत्रता आंदोलन के काल में एक विदेशी सत्ता का अंत मराठों ने कर दिया। जैसे ही मराठों ने मुगल सत्ता का समापन भारतवर्ष के मानचित्र से किया वैसे ही 1775 में अंग्रेजों ने मराठों से इस साम्राज्य को हड़पने का प्रयास प्रारंभ किया और वह सन 1818 तक इस साम्राज्य को हड़पने में सफल हो गए। इस प्रकार जिस स्वतंत्रता को मराठों ने मुगलों से 90 वर्ष के संघर्ष से प्राप्त किया था, उसी स्वतंत्रता को अंग्रेजों ने मराठों से अगले 43 वर्ष में छीन लिया। तब फिर भारत का ‘पुनरुज्जीवी पराक्रम’ जागृत हुआ और 1818 के 39 वर्ष बाद भारत में 18 57 की क्रांति हो गई। यह भी इतिहास का एक रोचक व मनोरंजक तथ्य है कि 1857 के आगे जो स्वतंत्रता आंदोलन क्रांतिकारियों के माध्यम से लड़ा गया, उससे फिर 90 वर्ष में ही हमने अपनी खोयी हुई स्वतंत्रता को 1947 में जाकर प्राप्त कर लिया।

1737 तक दिल्ली को मुगलों से किसी हिंदू शक्ति के द्वारा अपने नियंत्रण में लेना असंभव समझा जाता था, परंतु 1707 में जब मुगल बादशाह औरंगजेब का देहांत हुआ तो उसके सही 30 वर्ष पश्चात अर्थात 1737 में मराठों ने दिल्ली पर अपना केसरिया ध्वज फहरा दिया। इस प्रकार दिल्ली ‘हिंदवी स्वराज्य’ के इन महा योद्धा मराठों के अधीन हो गई। इतिहास की यह बहुत बड़ी घटना थी। जिस दिल्ली को प्राप्त करने के लिए हमारे योद्धा दीर्घकाल से संघर्ष करते आ रहे थे, उस पर 1737 में अपना केसरिया ध्वज फहरा देना इस बात का प्रतीक था कि हिंदू शौर्य अपनी इस दिल्ली को पाने के लिए कितना आतुर था? यद्यपि दिल्ली में नाममात्र की मुगल बादशाहत इसके पश्चात भी चलती रही।

जब दिल्ली पर मराठों का केसरिया ध्वज फहराया तो उसके सही 2 वर्ष पश्चात विदेशी आक्रांता नादिरशाह ने दिल्ली पर 1739 ई. में आक्रमण कर दिया। इसके पश्चात मुगलों की और भी अधिक दयनीय स्थिति हो गई, उनका दिल्ली में राज्य बहुत थोड़े से क्षेत्र में सिमट कर रह गया।

1755 के पश्चात इमाद उल मुल्क नामक वजीर की तानाशाही पूरी दिल्ली में असफल हो गई। 1757 ई. में रघुनाथ राव ने दिल्ली पर अपनी ओर से सफल आक्रमण किया और दिल्ली को पुनः अपने अधिकार में ले लिया। रघुनाथ राव ने अपने इस आक्रमण के फलस्वरूप अहमद शाह अब्दाली को दिल्ली से स्वदेश जाने के लिए विवश कर दिया। अब मराठों ने अटक और पेशावर पर भी अपने थाने लगा दिए। मराठों की घेराबंदी को देखकर अब अहमदशाह दुर्रानी को मराठों से भय उत्पन्न हो गया और अहमद शाह दुर्रानी को ही नहीं, अपितु संपूर्ण उत्तर भारत की शक्तियों को मराठों से खतरा उत्पन्न हो गया।

जिसमें अवध के नवाब शुजाउद्दौला और रोहिल्ला सरदार नजीबुददोला भी सम्मिलित थे। मराठों की बढ़ती शक्ति को देखकर राजस्थान के राजपूत राजा भी प्रसन्न नहीं थे। राजस्थान के सभी राजपूत राजा जैसे जयपुर के राजा माधोसिंह भी मराठों से क्रोधित हो गए। फलस्वरूप मराठों की विरोधी इन सभी शक्तियों ने मिलकर यह निर्णय लिया कि मराठों को शक्तिहीन करने के लिए किसी बाहरी शक्ति की सहायता ली जाए। अतः इन सबने अहमदशाह दुर्रानी को भारत आने का निमंत्रण दिया। अहमद शाह अब्दाली दुर्रानी साम्राज्य का संस्थापक था। वह 1747 में अपने राज्य का सुल्तान बना था। जब उस तक यह सूचना पहुँची तो उसने भारत पर आक्रमण करने की योजना पर विचार करना आरंभ किया। उस समय सदाशिवराव भाऊ पानीपत के युद्ध के नायक थे। वह उदगीर में थे जहाँ पर उन्होंने 1759 में निजाम की सेनाओं को हराया हुआ था। इस सेना को हराने के उपरांत उनके अंहकार में काफी वृद्धि हुई और वह मराठा साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली सेनापतियों में गिने जाने लगे। बालाजी बाजीराव ने अहमदशाह से लड़ने के लिए भी सदाशिवराव भाऊ को ही चुना, जबकि उन्हें उत्तर में लड़ने का कोई ज्ञान नहीं था। उस समय भारत में सबसे अधिक ज्ञान प्राप्त रघुनाथ राव और महादजी सिंधिया थे। परंतु इन दोनों पर विश्वास ना करना संभवतः बालाजी बाजीराव की सबसे बड़ी भूल थी या फिर समय मराठों के साथ नहीं था। सदाशिवराव भाऊ अपनी समस्त सेना को लेकर उदगीर से सीधे दिल्ली की ओर रवाना हो गए। जहाँ वे लोग 1760 में पहुँचे।

मराठे दिल्ली में पहुँचे और उन्होंने कुंजपुरा पर हमला कर दिया। इस युद्ध में अफगान आक्रामक अब्दाली की सेना की संख्या लगभग 15000 थी। जिसने उसको नष्ट कर दिया। कुंजपुरा में अफगान सेना को पूरी तरह परास्त कर दिया गया। मराठा सेना अफगान सेना से उसका खाने पीने तक का सामान छीन लिया। मराठा सेना ने अपनी वीरता और शौर्य का परिचय देते हुए लालकिले की चांदी की चादर को भी पिघला कर उससे भी धन अर्जित कर लिया। उस समय मराठों के पास उत्तर भारत में रह पाने का एक मात्र साधन दिल्ली था, परंतु बाद में अब्दाली को रोकने के लिए यमुना नदी के पहले उन्होंने एक सेना तैयार की। अहमदशाह ने नदी पार कर ली। अक्टूबर के महीने में वह दिल्ली से आगे आकर पानीपत में पहुँच गया। जहाँ उसने दिल्ली और पुणे मराठों का संपर्क काट दिया। मराठों ने अब्दाली का काबुल से संपर्क काट दिया।

इस प्रकार से अब आमने सामने की लड़ाई आरम्भ हो गई। यह स्पष्ट था कि युद्ध के समय जिस सेना हथियारों की आपूर्ति निर्बाध चलती रहेगी वह युद्ध जीत जाएगी। लगभग डेढ़ महीने की मोर्चा बंदी के बाद 14 जनवरी, 1761 को बुधवार के दिन सुबह 8 बजे दोनों सेनाएँ आमने-सामने युद्ध के लिए आ गई। मराठों को रसद की आमद हो नहीं रही थी और उनकी सेना में भुखमरी फैलती जा रही थी। इस प्रकार की विषम परिस्थिति ने मराठों को बहुत ही कष्ट में डाल दिया था।

उस समय भारत के ‘जयचंदों’ ने भी अपना काम किया जिनके कारण अहमदशाह को अवध और रूहेलखंड से रसद की आपूर्ति हो रही थी।

अपनों के आघात से शूरवीर गिर जाएँ।
अपनों के ही साथ से भवसागर तर जाएँ।।

इस युद्ध में विश्वासराव को दोपहर लगभग एक बजे से ढाई बजे के बीच एक गोली शरीर पर लगी और वह गोली इतिहास को परिवर्तित करने वाली सिद्ध हुई। वास्तव में वह गोली विश्वासराव को न लगकर भारत के भाल को लगी थी। सदाशिवराव भाऊ अपने हाथी से उतर कर विश्वास राव को देखने के लिए मैदान में पहुँचे। जहाँ पर उन्होंने उसको मृत पाया। अन्य मराठा सरदारों ने देखा कि सदाशिवराव भाऊ अपने हाथी पर नहीं है। उन्होंने यह भी देखा कि सदाशिवराव भाऊ हाथी से उतर कर अपनी तलवार लेकर युद्ध लड़ने के लिए चले गए हैं।

सदाशिव राव भाऊ ने अंतिम दिन तक वहीं लड़ाई लड़ी। सदाशिव राव भाऊ को अपने हाथी पर न देखकर उनकी सेना में बहुत उत्तेजना फैल गई और उनकी सैना में हड़कंप मच गया। यदि सेना का सेनानायक ही ना हो तो सेना में इस प्रकार हड़कंप मच जाना स्वाभाविक भी होता है। इसी हड़कंप की स्थिति में कई सैनिक मारे गए, जबकि कुछ मैदान छोड़ कर भाग गए, परंतु सदाशिवराव भाऊ अंतिम दिन तक उस युद्ध में लड़ते रहे। इस युद्ध में सारी मराठा सेना समाप्त हो गई। जबकि कई सैनिक मैदान छोड़कर ही भाग गए। अब्दाली ने इस अवसर का लाभ उठाने का प्रयास किया। उसने अपने शेष सैनिकों को युद्ध के लिए मैदान में भेज दिया। इन सैनिकों ने मराठों की बची हुई सेना का अंत कर दिया। अब मराठा पूर्णतया मित्रविहीन हो चुके थे। मल्हार राव होलकर, महादजी सिंधिया और नाना फड़णवीस इस युद्ध से भाग निकले। उनके अतिरिक्त और कई महान सरदार जैसे विश्वासराव, पेशवा सदाशिवराव भाऊ, जानकोजी सिंधिया यह सभी इस युद्ध में मारे गए। इब्राहिम खान गदी जो कि मराठा तोपखाने की कमान संभाले हुए थे, ने भी इसी युद्ध में वीरगति प्राप्त की। इससे मराठा सेना को बहुत भारी क्षति हुई। एक से एक बढ़कर देशभक्त और महान सेनानायक इस युद्ध में खेत रहे।

सदाशिव राव भाऊ का गला काटकर अफगान सैनिक ले गए और कई दिनों बाद विश्वासराव का शरीर मिला। इसके साथ ही उन 40000 तीर्थयात्रियों का जो कि मराठा सेना के साथ उत्तर भारत यात्रा करने के लिए गये थे, को पकड़वाकर अहमदशाह अब्दाली ने उनका नरसंहार करा दिया। इससे युद्ध का परिवेश बहुत ही भयावह हो चुका था। इन तीर्थयात्रियों को पानी पिला-पिला कर उनका वध किया गया जिसमें एक लाख से अधिक लोग इस युद्ध में मारे गए थे।

मराठा सेना की इस प्रकार हुई क्षति की सूचना जब पुणे में पहुँची तो बालाजी बाजीराव अत्यंत क्रोधित हुआ और वह एक विशाल सेना लेकर अहमदशाह अब्दाली का सर्वनाश करने के लिए चल पड़ा। अहमदशाह दुर्रानी को जब यह सूचना मिली कि बालाजी बाजीराव एक विशाल सेना लेकर उसकी सेना का सामना करने के लिए पानीपत की ओर आ रहा है, तो उसने 10 फरवरी, 1761 को एक पत्र बालाजी बाजीराव के लिए लिखा कि “मैं जीत गया हूँ, परंतु मैं यह युद्ध नहीं लड़ना चाहता था। सदाशिवराव भाऊ जी के द्वारा मुझे इस युद्ध को लड़ने के लिए प्रेरित किया गया। मैं अपने इस पत्र के माध्यम से आपको यह विश्वास दिलाता हूँ कि मैं दिल्ली का राज्य सिंहासन प्राप्त नहीं करूँगा। आप ही दिल्ली पर शासन करें, मैं अपने देश लौट रहा हूँ।”

जब यह पत्र बालाजी बाजीराव ने पढ़ा तो वह इस पत्र की भाषा से संतुष्ट हो गया और दिल्ली की ओर बढ़ती हुई अपनी सेना को अचानक रुकने का आदेश देकर वह सेना सहित पुणे लौट गया। इसके पश्चात कुछ कालोपरांत 23 जून, 1761 को बालाजी बाजीराव की मृत्यु हो गई। इतिहासकारों ने बालाजी बाजीराव की मृत्यु का कारण अवसाद को माना है, क्योंकि वह पानीपत के युद्ध में हुई मराठा सेना की पराजय और क्षति को लेकर बहुत ही दुखी रहने लगा था। उसे इस बात का भी बहुत गहरा शोक था कि इस युद्ध में उसके अनेकों महान सेनानायक समाप्त हो गए थे। पानीपत का युद्ध मराठा साम्राज्य के लिये बहुत अपमानित करने वाला था। इस युद्ध में मराठा साम्राज्य के कई सरदारों का समाप्त हो जाना साम्राज्य को सैनिक रूप में भी क्षति पहुँचाने वाला रहा, जो सम्मान मराठा साम्राज्य ने अभी तक प्राप्त किया था, वह भी इस अपमानजनक पराजय के पश्चात कलंकित हुआ। इस युद्ध में सदाशिवराव भाऊ इब्राहिम खान गदी, विश्वासराव, जानकोजी सिंधिया, बालाजी बाजीराव की भी मृत्यु हो गई। जिनकी, क्षतिपूर्ति करना अब मराठा साम्राज्य के लिए असंभव हो गया था, क्योंकि इतने महान सेनानायकों का एक साथ होना बड़े सौभाग्य की बात होती है और यदि यह सब अचानक निपट जाए या मृत्यु को प्राप्त हो जाएँ तो सहज ही कल्पना की जा सकती है कि उसका परिणाम साम्राज्य को किस प्रकार भुगतना पड़ेगा? इस युद्ध के उपरांत अहमदशाह दुर्रानी ने मराठों की वीरता को लेकर उनकी बड़ी प्रशंसा की और मराठों को सच्चा देशभक्त भी बताया। इसके पीछे संभवतः यही कारण रहा होगा कि यदि भारत के लोग मुझे अपने ही लोगों के विरुद्ध नहीं बुलाते तो मैं कभी भी मराठा शक्ति को विजित नहीं कर सकता था।
क्रमशः

– डॉ राकेश कुमार आर्य

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