Categories
इतिहास के पन्नों से

महर्षि और रानी लक्ष्मीबाई की भेंट

सन्‌ 1855 ई. में स्वामी जी फर्रूखाबाद पहुंचे। वहॉं से कानपुर गये और लगभग पॉंच महीनों तक कानपुर और इलाहाबाद के बीच लोगों को जाग्रत करने का कार्य करते रहे। यहॉं से वे मिर्जापुर गए और लगभग एक माह तक आशील जी के मन्दिर में रहे। वहॉं से काशी जाकर में कुछ समय तक रहे.स्वामीजी के काशी प्रवास के दौरान झांसी की रानी लक्ष्मीबाई उनके मिलने गई .रानी ने महर्षि से कहा कि ” मैं एक निस्संतान विधवा हूँ , अंग्रजों ने घोषित कर दिया है कि वह मेरे राज्य पर कब्ज़ा करने की तैयारी कर रहे हैं ,और इसके झाँसी पर हमला करने वाले हैं. अतः आप मुझे आशीर्वाद दीजिये कि मैं देश की रक्षा हेतु जब तक शरीर में प्राण हों फिरंगियों से युद्ध करते हुए शहीद हो जाऊँ .महर्षि ने रानी से कहा ,” यह भौतिक शरीर सदा रहने वाला नहीं है , वे लोग धन्य हैं जो ऐसे पवित्र कार्य के लिए अपना शरीर न्योछावर कर देते हैं , ऐसे लोग मरते नहीं बल्कि अमर हो जाते हैं , लोग उनको सदा आदर से स्मरण करते रहेंगे , तुम निर्भय होकर तलवार उठाओ विदेशियों का साहस से मुकाबला करो
अब कोटा नगर के अपने प्रकरण पर पुनः लौटते हैं । बर्टन का सिर काटकर कोटा शहर में घुमाया और तोप से उड़ा दिया । इसके बाद सारे कोटा नगर पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया। महाराव गढ़ में अपने कुछ राजपूत सरदारों के साथ असहाय अवस्था में बंद हो गए।विद्रोहियों का कब्जा कोटा नगर 20 अप्रैल 1858 तक 6 माह रहा। महाराज की सेना अंग्रेजी सेना विद्रोहियों के मध्य अनेक लड़ाइयां होती रही। इससे पहले मार्च के महीने में चंबल की तरफ से अंग्रेजी सेना आ चुकी थी और महाराज ने कुछ राजपूत सरदारों को बुला लिया था ।तब 27 अप्रैल 1858 को कोटा पर फिर अंग्रेजों का कब्जा हो गया। अंग्रेजों ने अत्याचार और बढ़ा दिए । लड़ाई में अनेक विद्रोही नेता मारे गए और स्वतंत्रता सेनानियों में भगदड़ मच गई । अधिकतर के सिर कटवा दिए गए। लाला जयदयाल और मेहराब बचकर निकल गए थे। उन्हें मालवा और मध्य भारत की तरफ से गिरफ्तार करके कोटा लाया गया और आजादी के इन दीवानों को अंग्रेजी सरकार ने कोटा में मेहराव पर दबाव डालकर पोलिटिकल एजेंट की उपस्थिति में नयापुरा में फांसी लगाई । जहां अदालत के सामने चौराहे पर शहीद स्मारक बना हुआ है। सच ही तो है :–

जिनकी लाशों पर चलकर यह आजादी आई ।
उनकी याद लोगों ने बहुत ही गहरे में दफनाई।।

विक्टोरिया ब्रिटेन की रानी को जब भारत की रानी बनाया गया।
20 जून 1937 को विक्टोरिया ने यूके की क्वीन का ताज पहना था लेकिन एंप्रेस ऑफ इंडिया या केसर ए हिंद का ताज विक्टोरिया ने पहना था 1 मई 1876 को और ठीक 8 महीने बाद दिल्ली में लगा था उसी का समारोह मनाने के लिए पहला दिल्ली दरबार।
1857 की क्रांति के बाद 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश सरकार ने भारत की सत्ता अपने हाथ में ले ली थी 1874 में ईस्ट इंडिया कंपनी को भंग करने के बाद ब्रिटेन के तत्कालीन पी. एम. डिजरायली ने तीन विक्टोरिया को यह किताब देने का प्रस्ताव रखा जो सरकार हुआ।
दिल्ली में अंग्रेजों के इस पहले दरबार जलसा_ ए_ केसरी को करने के पीछे मंशा थी कि भारत की जनता और राजाओं को अंग्रेजी राज्य की ताकत की झलक भव्य समारोह में दिखाई जाए। रानी को तो आना नहीं था लेकिन उनके नाम का ऐलान भारत की साम्राज्ञी (एंप्रेस ऑफ इंडिया) के तौर पर होना था। राजधानी कोलकाता में होने के बावजूद अंग्रेजों ने दरबार अगर दिल्ली में लगाया तो तो इसका मतलब है कि अंग्रेज मुगल गद्दी पर अपनी मोहर लगाना चाहते थे ।तभी दरबार किसको कहा जाता है ।सोने चांदी के स्पेशल मेडल डलवाए गए। सोने के मेडल्स राजा व बड़े ब्रिटिश अधिकारियों के लिए और चांदी के मेडल छोटे अधिकारियों व अन्य गणमान्य व्यक्तियों के लिए। मेडल पर एक तरफ विक्टोरिया की तस्वीर, नाम और 1 जनवरी 1877 गोदा था तो दूसरी तरफ उर्दू में केसर_ ए _हिंद तथा इंग्लिश में इंप्रेस_ ऑफ_ इंडिया और हिंदी में हिंद _का_ कैसर गुदा हुआ था। इसका तात्पर्य अंग्रेजों का यह भी था कि मुगल साम्राज्य का जो सिक्का अभी तक चलता था, जिस पर एक तरफ मुगल बादशाह का नाम गुदा होता था,होता था वह अब बंद कर दिया जाए।
1857 में अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी के 100 वर्ष पूरे होने के जश्न मनाने की पूरी तैयारी कर रहे थे।
इस दरबार को आयोजित करने का जिम्मा थॉमस हेनरी थॉनर्टन को सौंपा गया था। यह आयोजन जिस जगह पर हुआ था उसे आज बुराड़ी रोड पर कोरोनेशन पार्क के नाम से जानते हैं ।1903और 1911 के दरबार भी यही हुए कई अंग्रेजों की मूर्तियां आप यहां पर देख सकते हैं। 1911 में तो खुद किंग जॉर्ज पंचम क्वीन मैरी के साथ आए थे। पहले दरबार में कुल 68000 लोग मौजूद रहे जिसमें ब्रिटिश ताकत दिखाने के लिए 15000 की तो केवल फौजी थी।
वॉइस राय लिटल एवं गवर्नर ओं के अलावा 63 राजा नवाब इसमें शामिल थे। भोपाल की बेगम कोल्हापुर महारानी के अलावा कश्मीर हैदराबाद त्रावणकोर रामपुर दरभंगा आदि के शासक भी थे उनके हम लोगों के अलावा तमाम गणमान्य लोग भी थे सेवकों का लाव लश्कर था हर राजा की हैसियत और रेन के हिसाब से उन्हें तोपों की सलामी दी गई फिर रानी का संबोधन अंग्रेजी उर्दू में पढ़कर सब को सुनाया गया जिसमें रानी ने समानता शिक्षा रोजगार का समान मौका देने धार्मिक स्वतंत्रता में दखल न देने का वायदा किया राज्यों का बिल आधा करने का भी वायदा किया गया सब ने रानी की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना की राजाओं के गणमान्य नागरिकों को मेडल दिए गए उसको उपाधि दी गई रानी की एक बड़ी सी पेंटिंग लगाई गई थी कई राजाओं ने लिटन के साथ उस पेंटिंग का भी झुक कर अभिवादन किया था।
जब स्वामी दयानंद सरस्वती भी दिल्ली पहुंचे।
यही अनआधिकारिक रूप से कांग्रेस की नींव रखी गई। बाद में कांग्रेस का प्रमुख संगठन बनी संस्था पुणे सार्वजनिक सभा के गणेश वासुदेव जोशी ने एक मांग रखी कि भारतीयों को भी अंग्रेजों की तरह राजनीतिक और सामाजिक दर्जा दिया जाए, जिसे अनसुना कर दिया गया ।इसी दौरान स्वामी दयानंद सरस्वती दिल्ली आ चुके थे ।इस मौके पर वह राजाओं के बीच आर्य समाज के प्रचार में इस्तेमाल करना चाहते थे। कश्मीर के राजा रणबीर सिंह से व शुद्धि आंदोलन के सिलसिले में मिलना चाहते थे, लेकिन मिलने नहीं दिया गया। हां इंदौर के तुकाराम होलकर ने जरूर राजाओं के लिए स्वामी जी का प्रवचन कराने की कोशिश की ।पर वह तो अंग्रेजों की मेहमान नवाजी में मस्त थे। स्वामी जी ने फिर सर सैयद अहमद खान ,मुंशी कन्हैयालाल अलखधारी नवीन चंद्र राय आदि को लेकर एक सर्व धर्म सभा करने में कामयाबी पाई।
यहां यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि जिस समय दिल्ली दरबार लग रहा था उस समय आधा भारत भयंकर अकाल से पीड़ित था और उस काल में 5500000 लोगों की मौत हो चुकी थी समारोह के घर से काफी जाने बच सकती थी एक दौर आया जब सालों विक्टोरिया की दिल्ली में एकलौती मूर्ति दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट के एक कोने में पड़ी रही काशी की इस मूर्ति को इस समारोह की याद में बना कर चांदनी चौक में टाउन हॉल के पास लगाया गया था आजादी के बाद वहां स्वामी श्रद्धानंद की मूर्ति लगाकर इसे कोरोनेशन पार्क में भेज दिया गया और फिर दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट में भेज दिया।
महर्षि दयानंद के कारण अंग्रेज चित्तौड़गढ़ नहीं ले पाए थे।
भारतीय स्वतंत्र संग्राम में आर्य समाज का योगदान के विद्वान लेखक आचार्य सत्यप्रिया शास्त्री अपनी इस पुस्तक में प्रश्न संख्या 40 से 48 पर बड़ी महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए लिखते हैं कि जब स्वामी जी महाराज चित्तौड़गढ़ में थे और अंग्रेज गवर्नर जनरल भी चित्तौड़ आए हुए थे। यह घटना सन 1882 की है तो गवर्नर जनरल ने महाराजा सज्जन सिंह से कहा कि चित्तौड़ का किला आप सरकार को दे दें इस पर महाराणा तो चुप रहे परंतु जब स्वामी दयानंद जी को इस बात का पता लगा तो उन्होंने उदयपुर के सरदारों को जो वहां इकट्ठे हुए थे बुलाकर समझाया की बारी बारी जाकर में गवर्नर से मिले और कहे कि चित्तौड़ का किला केवल महाराणा का ही नहीं है इस पर राजपूतों का भी हक है और सब की सहमति के बिना महाराणा को कोई हक नहीं है कि इसके विषय में कोई बातचीत करें ।तब गवर्नर जनरल समझ गया कि हमारी मांग को नहीं माने तो उन्होंने कहा कि मैंने वैसे ही महाराजा साहब से जिक्र किया था हमने किला लेकर क्या करना है।
इस प्रकार चित्तौड़ को अंग्रेजो के कब्जे में जाने से महर्षि दयानंद की कूटनीति ने रोक लिया।
महर्षि दयानंद का चिंतन।

रेमजे मैकडोनाल्ड ने भारत का वास्तविक दर्शन पढ़ लिया था महरिशी दयानंद जी के पश्चात उनके मानने वालों ने जिन गुरुकुल ओं की स्थापना की उनका उठना बैठना खाना पीना सोना जागना सभी अपने देश तथा देशवासियों के लिए था उन्होंने शांति की खोज की परंतु क्रांति के साथ उन्होंने शांति को क्रांति का और क्रांति को शांति का प्रतीक बना दिया था उन्होंने शांति में मुक्ति का स्वतंत्रता का सनातन सत्य खोज लिया था इसलिए उनकी शांति भी 97 सी और स्वतंत्रता प्रेमी थी इसी 97 सी शांति और स्वतंत्रता प्रेमी भावना का विस्तार और विकास में भारत में होते देखना चाहते थे पर इसमें अंग्रेज बाधक वादक थे इसलिए उनका अंग्रेजों से बढ़ना अनिवार्य था जहां भरना अनिवार्य हो जाता था वहीं से शांति का शुभारंभ हो जाता था यह सारी देन थी भेज दयानंद के दिव्य चंदन की जिन के विषय में देवेंद्र बाबू मुखोपाध्याय जी ने निम्न प्रकार लिखा है।
“इस सन्यासी के हृदय में वह प्रबल इच्छा और उत्साह था कि सारे भारतवर्ष में एक शास्त्र प्रतिष्ठित हो । एक देवता अर्थात परमपिता परमात्मा एक ईश्वर पूजित हो ।एक जाति संगठित हो और एक भाषा (हिंदी जिसका मूल रूप संस्कृत है वह ,)प्रचलित हो यही नहीं उन्हें केवल सदिच्छा और उत्साह ही था। वरन् वह इस इच्छा और उत्साह को किसी अंत तक इस कार्य में परिणत करने में भी कृत कार्य हुए थे ।अतः स्वामी दयानंद केवल सन्यासी ही नहीं थे ,केवल वेद व्याख्या ही नहीं थे, केवल शास्त्रों का मर्म उद्घाटन करने में ही निपुण नहीं थे ,केवल तार्किक ही नहीं थे, केवल दिग्विजय पंडित ही नहीं थे, वरन वह भारतीय एकता और जातीयता राष्ट्रीयता के प्रतिष्ठता भी थे ।इसलिए भारत की आचार्य मडली में दयानंद का स्थान विशिष्ट एवं अद्वितीय है।
भाई परमानंद डॉक्टर माणिकलाल बैरिस्टर डॉक्टर चिरंजीव भारद्वाज, स्वामी भवानी दयाल ,स्वामी स्वतंत्रता नंद ,पंडित अमीचंद विद्यालंकार , गोपेंद्र नारायण ,स्वामी शंकराचार्य, जैसे राष्ट्रभक्त भक्तों को स्वामी जी के विचारों से प्रेरणा मिली।
जिन्होंने विदेशों में स्वतंत्रता की ज्योति को जलाए रखा।
विदेशों के अतिरिक्त देश के अंदर भी कोने कोने में आर्य समाजी सन्यासी वृंद और भजन उपदेश को ने वेद धर्म की धूम मचा कर लोगों को देश की स्वतंत्रता के राष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। देश में राष्ट्रधर्म की ज्योति जगाने वाले आर्य समाजी सन्यासियों में स्वामी विश्वेश्वरा नंद जी स्वामी नित्यानंद जी स्वामी दर्शनानंद जी स्वामी सत्यानंद जी जो पूर्व में जैनी गुरु थे स्वामी सर्वानंद जी स्वामी ओंकार सच्चिदानंद जी स्वामी अनुभवानंद जी स्वामी मुनीश्वर आनंद जी पंडित गणपति शर्मा स्वामी अच्युतानंद जी पंडित तुलसीराम स्वामी आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इस प्रकार आर्य समाज ने अध्यात्म वाद को पूर्ण राष्ट्रवाद की तरफ परिणत कर दिया था। महर्षि दयानंद की भूमिका महत्वपूर्ण प्राथमिक है।

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन : उगता भारत

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
Betist
Betist giriş
betplay giriş
Hitbet giriş
Bahsegel giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betpark
betpark
betpark
betpark
betplay giriş
betplay giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
bepark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
holiganbet giriş
betnano
meritking giriş
meritking giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
betplay giriş
betnano giriş
betplay giriş
betnano giriş
nitrobahis giriş
betplay giriş
roketbet giriş
betcup giriş
betcup giriş
betcup giriş
betcup giriş
betorder giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betorder giriş
betorder giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
rekorbet giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
vdcasino giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
pokerklas giriş
pokerklas giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpark giriş
vaycasino
vaycasino
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş