भारत के वैज्ञानिकों का अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम

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उमाशंकर मिश्र

एम्स क्लार्क मैक्सवेल ने विद्युत चुम्बकीय तरंगों के सिद्धांत को प्रतिपादित किया, जिसे प्रयोगों के माध्यम से सत्यापित करने की आवश्यकता थी। तब तक दुनिया में किसी ने भी माइक्रोवेव तरंगें उत्पन्न नहीं की थी। जगदीश चंद्र बोस ने दुनिया में पहली बार ऐसा किया।

एक आम धारणा है कि हमारा स्वतंत्रता संग्राम मुख्य रूप से राजनीतिक और आर्थिक था, जिसके आयामों में सिर्फ सामाजिक पहलू जुड़े थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि विज्ञान के क्षेत्र में भी स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था, जिसमें भारतीय वैज्ञानिकों ने अहम् भूमिका निभायी। आंग्ल पराधीनता के दौर में देश के भविष्य निर्माण का सपना देखना; और उसे साकार करने के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थानों की आधारशिला रखना अपने आप में भारतीय वैज्ञानिकों की अदम्य भावना और उनके बेजोड़ योगदान को दर्शाता है। स्वतंत्रता पूर्व; और फिर स्वतंत्र भारत में, देश को वैज्ञानिक महाशक्ति बनाने का स्वप्न देखने, और उसे साकार करने में जुटे वैज्ञानिकों के योगदान की कहानी इसकी बानगी कहीगी।
19वीं सदी के उत्तरार्ध में स्वतंत्रता के संघर्ष के साथ-साथ देश में ज्ञान-विज्ञान की लहर भी उठ रही थी। इस दौरान अनेक मूर्धन्य वैज्ञानिक पराधीन परिस्थितियों के बावजूद देश को वैज्ञानिक रूप से सशक्त बनाने का स्वप्न देख रहे थे। इनमें जगदीश चंद्र बसु, प्रफुल्ल चंद्र राय, श्रीनिवास रामानुजन और चंद्रशेखर वेंकटरामन जैसे महान वैज्ञानिकों का नाम प्रमुखता से शामिल है। इन वैज्ञानिकों ने पराधीनता के बावजूद अपनी लगन तथा निष्ठा से विज्ञान में उस ऊंचाई को छुआ, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। ये आधुनिक भारत की पहली पीढ़ी के वैज्ञानिक थे, जिनके कार्यों और आदर्शों से भारतीय विज्ञान को एक नई दिशा मिली।
स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में उन महान विभूतियों का स्मरण आवश्यक है, जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जीवन का बलिदान दिया, ताकि भारत की भावी पीढ़ियाँ सुखी और समृद्ध हो सकें। ऐसे वीर हृदय लोगों के योगदान का स्मरण करते हुए आजादी के 75वें वर्ष को पूरे देश में ‘स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव’ के रूप में मनाया जा रहा है। तमाम कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, ताकि विभिन्न स्वरूपों और माध्यमों के माध्यम से भारत की उन महान विभूतियों की अदम्य भावना की गाथा को उजागर किया जा सके, जिन्होंने स्वंतत्रता आंदोलन और उसके बाद देश के भविष्य की मजबूत बुनियाद रखने में अपनी सशक्त भूमिका निभायी है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के महत्व को पुराने जमाने से ही समझा गया है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के महत्व को अंग्रेज खूब समझते थे। वर्ष 1757 में प्लासी की लड़ाई के दस साल बाद, रॉबर्ट क्लाइव ने वर्ष 1767 में वर्तमान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सबसे पुराने संगठन ‘सर्वे ऑफ इंडिया’ की स्थापना की। अंग्रेजों ने यह अनुभव किया कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी आधारित अनुप्रयोगों के बिना विस्तृत भारत देश को नहीं समझा जा सकता। सबसे पहले ‘सर्वे ऑफ इंडिया’ की स्थापना उनकी इसी सोच का परिणाम थी। इस संगठन ने देश का भौगोलिक मानचित्र बनाने में अंग्रेजों की मदद की। ‘फूट डालो और शासन करो’ की अंग्रेजों की नीति से तो हम परिचित हैं। लेकिन, बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि अंग्रेज यह भी नहीं चाहते थे कि भारतीय जनमानस में आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के प्रति चेतना जागृत हो। अंग्रेज बखूबी यह समझते थे कि भारतीय आबादी को अद्यतन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से दूर रखकर ही वे भारत पर कुशलता से शासन करने में सक्षम होंगे। इस नीति का वे पालन करते रहे, जिसका शिकार भारतीय वैज्ञानिक मेधा को भी होना पड़ा, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।
वैज्ञानिक प्रगति के कारण ही इंग्लैंड उद्योग स्थापित करने और औद्योगिक क्रांति की ओर अग्रसर हुआ। औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप उत्पादित माल बेचने और कच्चे माल की तलाश के लिए इंग्लैंड ने साम्राज्यवाद की नीति अपनायी, और वह अपने उपनिवेश स्थापित करने लगा। इस तरह उपनिवेश देशों के संसाधनों का शोषण का सिलसिला शुरू हुआ। बात 1760 की है, जब ब्रिटेन में पहली औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हुई। यह क्रांति प्राकृतिक और आर्थिक दोनों तरह के संसाधनों पर आधारित थी। भारत में प्लासी की लड़ाई जीतने के बाद अंग्रेजों को बंगाल और बिहार के दीवानी अधिकार प्राप्त हो गए। इससे अंग्रेजों को धन और नियंत्रण शक्ति मिलने के साथ-साथ बाद में वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों पर स्वामित्व भी मिल गया। इससे उनकी पहली औद्योगिक क्रांति में अत्यधिक मदद मिली।

प्लासी की लड़ाई के ठीक 10 साल बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने सर्वे ऑफ इंडिया की स्थापना की। हमें इसके पीछे के कारणों की गहराई से जाँच करने की जरूरत है। यह स्पष्ट था कि उन्हें दो तरह से समर्थन की आवश्यकता थी। सबसे पहले, अपनी सेना की मदद के लिए उन्हें भौगोलिक क्षेत्र के ज्ञान की आवश्यकता थी। इसलिए, भारत का सर्वेक्षण आवश्यक था। आज भी ‘सर्वे ऑफ इंडिया’ यह महत्वपूर्ण कार्य करता है। सभी प्रकार के नक्शे तैयार किए गए, जो सेना के लिए महत्वपूर्ण था। कुछ समय बाद, अन्य व्यापक सर्वेक्षण शुरू हुए, और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना हुई। विभिन्न संस्थानों की स्थापना के पीछे एकमात्र आधार वैज्ञानिक अध्ययन था, क्योंकि अंग्रेज जानते थे कि प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक अध्ययन से ही उन संसाधनों का उपयोग औद्योगिक क्रांति की सफलता के लिए किया जा सकता है।
विज्ञान के माध्यम से अंग्रेज कई अन्य उन्नत प्रौद्योगिकियों को भारत लाए, लेकिन वे देश के विकास और भारतीयों की भलाई के लिए नहीं थीं। उदाहरण के लिए, उन्होंने भारत में पोस्ट और टेलीग्राफ की शुरुआत की, क्योंकि सेना को संचार के लिए इसकी आवश्यकता थी। रेलवे की शुरुआत 1853 में हुई थी, लेकिन रेलवे भी आम लोगों की सुविधा के लिए नहीं थी, बल्कि वह लूटे गए प्राकृतिक संसाधनों के परिवहन के लिए उपयोग की गई, जिससे प्राकृतिक संसाधनों को मुंबई पोर्ट के जरिये इंग्लैंड भेजा जा सके। वर्ष 1835 में, कोलकाता (कलकत्ता) के एक कॉलेज में ईस्ट इंडिया कंपनी ने आधुनिक चिकित्सा पद्धति एलोपैथी का अभ्यास शुरू किया। यह आधुनिक चिकित्सा भी ब्रिटिश सेना के लिए लायी गई थी। इस तरह अंग्रेजों द्वारा लायी गई आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का उद्देश्य उनकी शक्ति को मजबूत करना, और देश के समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम शोषण करना था।
देश के अन्य आंदोलकारियों के साथ-साथ हमारे वैज्ञानिक भी अपने दृढ़ संकल्प, स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम के साथ इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद संघर्ष कर रहे थे। स्वदेशी दृष्टिकोण से प्रेरित एक श्रेष्ठ भारतीय भूविज्ञानी प्रमथ नाथ बोस, ‘सर्वे ऑफ इंडिया’ में शामिल होने वाले पहले भारतीय वैज्ञानिकों में से एक थे। लेकिन, बेहतर अनुभव के बावजूद वे अधीक्षक के पद पर पदोन्नति से वंचित रहे, और वह पद उनसे बहुत कनिष्ठ एक अंग्रेज को दे दिया गया। प्रमथ नाथ बोस ने ‘सर्वे ऑफ इंडिया’ छोड़ने का निर्णय किया, और भूविज्ञानी के रूप में मयूरभंज राज्य से जुड़ गए। बोस को भारतीय विज्ञान के इतिहास में पहली बार बहुत कुछ करने का श्रेय दिया जाता है। वह एक ब्रिटिश विश्वविद्यालय से विज्ञान में पहले भारतीय स्नातक थे, जिन्होंने सबसे पहले असम में तेल की खोज की, भारत में सर्वप्रथम साबुन का कारखाना स्थापित किया, बंगाल प्रौद्योगिकी संस्थान की स्थापना की, जो बाद में प्रसिद्ध जादवपुर विश्वविद्यालय बन गया, और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्होंने जमशेदपुर में टाटा स्टील की स्थापना का नेतृत्व किया।
भारत में आज भी अंग्रेजी दवाइयों का प्रचलन अधिक है, और अंग्रेज चाहते भी यही थे कि एलोपैथी के मुकाबले अन्य चिकित्सा पद्धतियाँ पनपने न पाएं। इसके बावजूद, भारतीय चिकित्सक, शोधकर्ता एवं समाज सुधारक महेंद्रलाल सरकार ने अंग्रेजी दवाइयों के सामने होम्योपैथी को बढ़ावा दिया। वह मानते थे कि जो असर होम्योपैथी दवाइयों में हैं, वो किसी अंग्रेजी दवा में नहीं है। आज भी ऐसी कई बीमारियां हैं, जिनका उपचार होम्योपैथी दवाइयों से किया जा सकता है। उन्होंने वर्ष 1876 में फादर यूजेन लफॉ के साथ मिलकर इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साइंस (आईएसीएस) की नींव रखी, जो देश का सबसे पुराना विज्ञान से जुड़ा संस्थान है। वे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, रामकृष्ण परमहंस और त्रिपुरा के महाराजा जैसी हस्तियों के डॉक्टर थे। उन्हें कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान कई विषयों पर लेक्चर देने का मौका मिला। ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन की एक बैठक में होम्योपैथी को पश्चिमी उपचार से बेहतर बताया था, जिसके बाद उन्हें अंग्रेजों के भेदभाव एवं प्रताड़ना का शिकार बनना पड़ा।

वर्ष 1904 में, डॉ. महेंद्रलाल सरकार के निधन के बाद, डॉ. आशुतोष मुखोपाध्याय (डॉ. श्यामाप्रसाद मुखोपाध्याय के पिता); आईएसीएस के अध्यक्ष बने। उन्होंने ही चंद्रशेखर वेंकटरामन को इस संस्था में आमंत्रित किया था। यहाँ काम करते हुए रामन को नोबेल पुरस्कार मिला, जो सिर्फ भारतीयों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया के लिए एक सम्मान का पर्याय बन गया। इस संस्था ने राष्ट्रीय विज्ञान आंदोलन का मार्ग प्रशस्त किया। यहाँ वैज्ञानिकों की पहली पीढ़ी विकसित होती रही। आचार्य जगदीश चंद्र बोस ही नहीं, आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रॉय, और स्वामी विवेकानंद जैसी विभूतियाँ संस्थान में अक्सर आती रहती थीं।
यहाँ हमें मशहूर भारतीय वैज्ञानिक डॉ. जगदीश चंद्र बोस का उदाहरण भी याद रखना चाहिए। वर्ष 1904 में, लॉर्ड रेले को आर्गन गैस की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार मिला। वह लंदन की रॉयल सोसाइटी के अध्यक्ष थे। उन्होंने अपने मेधावी छात्र जगदीश चंद्र के लिए सिफारिश का एक पत्र भेजा था, और सुझाव दिया कि उन्हें भौतिकी पढ़ाने की अनुमति दी जानी चाहिए। बोस मूल रूप से एक भौतिक- विज्ञानी थे। जब उन्होंने नौकरी के लिए आवेदन किया, तो उन्हें कहा गया कि भारतीयों के विचार तर्कसंगत नहीं होते, इसीलिए, उनकों भौतिकी जैसा विषय पढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि यहाँ यह नहीं कहा गया कि जगदीश चंद्र के पास तर्कसंगत सोच नहीं थी, बल्कि सामान्य तौर पर भारतीय लोगों में तार्किक सोच की कमी का आरोप मढ़कर एक प्रतिभाशाली भारतीय की उपेक्षा की गई। बोस के लिए इस अपमान को सहन करना मुमकिन नहीं था, और उन्होंने इसका जमकर विरोध किया। उन्होंने भारतीयों को भौतिकी पढ़ायी, लेकिन ब्रिटिश वेतन नहीं लिया। तीन साल तक उन्होंने बिना वेतन के पढ़ाया, और यह नेक कार्य मातृभूमि के प्रति उनके प्रेम से प्रेरित था। तीन साल बाद बोस की जीत हुई, और अंग्रेजी सरकार ने उन्हें भौतिक-विज्ञान का प्राध्यापक स्वीकार किया। इस तरह, अन्याय और भेदभाव के खिलाफ बोस की लड़ाई; गाँधीजी के वर्ष 1917 के चंपारण सत्याग्रह से मिलती-जुलती थी।
विज्ञान में शोध और ज्ञान का सृजन करना होता है। इसे भारत में अंग्रेजों ने दबाने का हर संभव प्रयास किया। भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, वनस्पति सर्वेक्षण, जूलोजिकल सर्वेक्षण और पुरातत्व में काम कर रहे कई भारतीयों ने काम किया। उनके वैज्ञानिक शोध-पत्र इंग्लैंड की शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे। भारत के ज्ञान का उपयोग भी अंग्रेजों ने इंग्लैंड में विज्ञान की उन्नति के लिए किया। ब्रिटिश नहीं चाहते थे कि भारतीय वैज्ञानिक भारत में कोई शोध करें और सफल हों। इसका विरोध करने वाले पहले वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस थे। दस साल तक अध्यापन के बाद, वर्ष 1894 में उन्होंने अपने अनुसंधान कार्य की शुरुआत की। लेकिन, उन्हें अंग्रेजों से कोई मदद नहीं मिली। उन्होंने अपनी वैज्ञानिक प्रयोगशाला स्थापित की, और सारा खर्च वहन किया। उनके द्वारा किया गया शोध अद्वितीय था; जो यूरोपीय देशों के वैज्ञानिक हासिल नहीं कर सके, वह सफलता उन्हें मिली।
एम्स क्लार्क मैक्सवेल ने विद्युत चुम्बकीय तरंगों के सिद्धांत को प्रतिपादित किया, जिसे प्रयोगों के माध्यम से सत्यापित करने की आवश्यकता थी। तब तक दुनिया में किसी ने भी माइक्रोवेव तरंगें उत्पन्न नहीं की थी। जगदीश चंद्र बोस ने दुनिया में पहली बार ऐसा किया। इसके बाद वे लंदन गए, और वहाँ अपना शोध प्रस्तुत किया। हालाँकि, बाद में मार्कोनी को आविष्कार के लिए नोबेल पुरस्कार मिला। इन वैज्ञानिकों को जिस संघर्ष का सामना करना पड़ा, उसकी कल्पना हम आसानी से कर सकते हैं। जगदीश चंद्र बोस ने इस तथ्य को दोहराया कि जब तक हम ज्ञान उत्पादन में सफल नहीं होते, हम दुनिया में सम्मानित नहीं होंगे। आज उन्हें न केवल ‘माइक्रोवेव का जनक’ कहा जाता है, बल्कि उन्हें बायोफिजिक्स और प्लांट न्यूरोबायोलॉजी का जनक भी माना जाता है। यही नहीं, विज्ञान के एक अन्य उभरते क्षेत्र क्रोनोबायोलॉजी का जनक भी उन्हें माना जा सकता है।
भारत की वैज्ञानिक प्रगति में भौतिक-विज्ञानी, सर चंद्रशेखर वेंकटरमन (सी.वी. रामन) के शोध और आविष्कार महत्वपूर्ण हैं। उनके एक शोध- ‘रामन प्रभाव’ के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 1928 में किए गए उनके इस आविष्कार को याद करते हुए हर वर्ष 28 फरवरी को ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। सी.वी. रामन की गिनती देश के सार्वकालिक महानतम वैज्ञानिकों में की जाती है। प्रकाश की प्रकृति और उसके स्वरूप के आधार पर की गई उनकी खोज दुनिया की असाधारण वैज्ञानिक उपलब्धियों में गिनी जाती है। उल्लेखनीय है कि सर सी.वी. रामन ने 28 फरवरी 1928 को रामन प्रभाव की खोज की थी। उनकी इस खोज को 28 फरवरी 1930 को ही मान्यता मिली थी। भारत में वर्ष 1987 से हर साल इस दिन को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य रामन की वैज्ञानिक परंपरा को समृद्ध करके नई पीढ़ी को विज्ञान के प्रति प्रोत्साहित करना है, ताकि वैज्ञानिक गतिविधियों को बल मिल सके।
भारत के ही एक और महान वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय भारत में रसायन विज्ञान के जनक माने जाते हैं। उन्होंने रसायन प्रौद्योगिकी में देश के स्वावलंबन के प्रयास किए। आचार्य राय भारत में वैज्ञानिक तथा औद्योगिक पुनर्जागरण के स्तम्भ थे। आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय सही मायनों में भारतीय ऋषि परम्परा के प्रतीक थे। आचार्य प्रफुल्ल के मन में आजादी की लौ हमेशा जलती रहती थी। उन्होंने देश की आजादी को हमेशा विज्ञान से ऊपर रखा। उनका मानना था कि विज्ञान मानव जगत की सेवा के लिए है, और इसकी राह राजनीतिक स्वतंत्रता से होकर जाती है, अन्यथा विज्ञान का फायदा देशवासियों को न मिलकर उन पर राज करने वाले अंग्रेजों को मिलेगा।
खगोल विज्ञान में ‘साहा समीकरण’ वर्षों से प्रयोग में लाया जा रहा है। इस समीकरण को स्थापित करने वाले महान भारतीय वैज्ञानिक प्रोफेसर मेघनाद साहा अंतरराष्ट्रीय ख्याति के खगोलविद थे। उनकी इस ख्याति का आधार ‘साहा समीकरण’ है। यह समीकरण तारों में भौतिक एवं रासायनिक स्थिति की व्याख्या करता है। साहा नाभिकीय भौतिकी संस्थान, तथा इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साइंस जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना का श्रेय प्रोफेसर साहा को जाता है। वर्ष 1917 में क्वांटम फिजिक्स के प्राध्यापक के तौर पर उनकी नियुक्ति कोलकाता के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ साइंस में हुई थी। अपने सहपाठी सत्येन्द्रनाथ बोस के साथ मिलकर प्रोफेसर साहा ने आइंस्टीन और मिंकोवस्की के शोध-पत्रों का अनुवाद अंग्रेजी भाषा में किया। वर्ष 1919 में अमेरिका के एक खगोल भौतिकी जर्नल में साहा का शोध पत्र छपा। यह वही शोध पत्र था, जिसमें उन्होंने ‘आयनीकरण फार्मूला’ प्रतिपादित किया था। यह फॉर्मूला खगोलशास्त्रियों को सूर्य और अन्य तारों के आंतरिक तापमान और दबाव की जानकारी देने में सक्षम है। इस खोज को खगोल- विज्ञान की 12वीं बड़ी खोज कहा गया। यह समीकरण खगोल-भौतिकी के क्षेत्र में दूरगामी परिणाम लाने वाला सिद्ध हुआ और उनके इस सिद्धांत पर बाद में भी कई शोध किये गए।
महिला वैज्ञानिकों का योगदान भी किसी मामले में कम नहीं है। भारतीय वैज्ञानिक अन्ना मोदयिल मणि (अन्ना मणि) विज्ञान की दुनिया में किसी मणि से कम नहीं थीं। वर्ष 1930 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त वाले भारतीय वैज्ञानिक सी.वी. रामन के विषय में तो लोग बखूबी जानते हैं, लेकिन, अन्ना मणि को अधिक नहीं जानते, जिन्होंने रामन के साथ मिलकर काम किया। मूल रूप से भौतिकशास्त्री अन्ना मणि एक मौसम वैज्ञानिक थीं। वह भारत के मौसम विभाग के उप-निदेशक के पद पर रहीं, और उन्होंने मौसम विज्ञान उपकरणों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सौर विकिरण, ओजोन और पवन ऊर्जा माप के विषय में उनके अनुसंधान कार्य महत्वपूर्ण हैं। अन्ना मणि के मार्गदर्शन में ही, उस कार्यक्रम का निर्माण संभव हुआ, जिसके चलते भारत मौसम विज्ञान के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सका। यदि अन्ना मणि उच्च कोटि की भौतिकशास्त्री थीं, तो यही उपाधि रसायनशास्त्र के क्षेत्र में असीमा चैटर्जी को निर्विवाद रूप से दी जा सकती है। वर्ष 1917 में कलकत्ता के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मीं असीमा चैटर्जी ने विन्का एल्कोलाइड्स पर उल्लेखनीय काम किया, जिसका उपयोग मौजूदा दौर में कैंसर की दवाएं बनाने में होता है।

आंग्ल शासनकाल में भी देश के विभिन्न स्थानों पर भारतीयों द्वारा कई वैज्ञानिक प्रयास हो रहे थे, और भारत के विज्ञान मनीषियों द्वारा अनेक संस्थाएँ स्थापित की जा रही थीं। तमाम बाधाओं के बावजूद प्रसिद्ध वनस्पतिशास्त्री शंकर पुरुषोत्तम आगरकर ने पुणे में महाराष्ट्र एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ साइंसेज की स्थापना की। इसके लिए कहा जाता है कि उन्हें अपना निजी सामान और पत्नी के जेवर तक बेचने पड़े। पुणे में स्थापित उस संस्थान को अब आगरकर संस्थान के रूप में जाना जाता है।
इस तरह स्वतंत्रता से पहले और स्वतंत्रता के बाद भी वैज्ञानिकों का योगदान उल्लेखनीय रहा है, जिसके बिना देश के भविष्य की रूपरेखा बनाना और उस पर आगे बढ़ना संभव नहीं था। आज से 25 वर्षों के बाद देश जब अपनी स्वाधीनता का शताब्दी वर्ष मनाएगा, तो उम्मीद करनी चाहिए कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत विश्वगुरु बनकर उभरेगा।

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