भारत के सच्चे बलिदान दिवस पर सच्चे बलिदानियों को सच्ची श्रद्धांजलि

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भारत माता को गुलामी के बंधनों से काटने के लिए जिन अनेक वीर योद्धाओं ने अपना बलिदान दिया उनमें भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव का नाम सर्वोपरि है। इन जैसे क्रांतिकारियों के कारण अंग्रेजों को दिन में चैन और रात में नींद नहीं आती थी। उन्हें चौबीसों घंटे सतर्क होकर रहना पड़ता था। कब कहां क्या घटना हो जाए ?  कुछ नहीं कहा जा सकता था .पायनियर जैसे अखबार ने एक बार लिखा था कि देश में भारत में यदि क्रांति को रोके रखना है तो गांधी को वे सारी सुविधाएं दो जिससे वह घूम घूम कर देशभर में ब्रिटिश सरकार की भलाई का काम कर सकें।
अंग्रेजों की चाटुकारिता करते रहने वाले गांधी जी ने सही समय पर ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया जिससे राष्ट्रवाद को मजबूती मिलती। स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे को जहां उन्होंने भाई कहा था वही जानबूझकर गोलमेज सम्मेलन में भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी के मामले पर चुप्पी साध ली थी ।
   अब जब देश सच को समझ गया है तो किसी और बलिदान दिवस को भुलाकर केवल 23 मार्च पर सबका ध्यान केंद्रित हो गया है यही कारण है कि आज देश अपने वीरों को याद करते हुए उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि पुष्पांजलि अर्पित कर रहा है।
23 मार्च यानि, देश के लिए लड़ते हुए अपने प्राणों को हंसते-हंसते न्यौछावर करने वाले तीन वीर सपूतों का शहीद दिवस। यह दिवस न केवल देश के प्रति सम्मान और हिंदुस्तानी होने के गौरव का अनुभव कराता है, बल्कि वीर सपूतों के बलिदान को भीगे मन से श्रृद्धांजलि देता है।
  विदेशी शासकों से देश को आजाद कराने के लिए उन तीनों वीर बलिदानी होने और वह काम करने का प्रयास किया जिसे वह कर सकते थे। उन्होंने उद्घोष किया कि देश को आजाद कराने के लिए किसी से भीख मांगने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि क्रांति के मार्ग से ही देश को आजाद कराया जा सकता है। अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए जब असेंबली पर भगत सिंह ने बम फेंका था तो उन्होंने कहा था – ‘आदमी को मारा जा सकता है उसके विचार को नहीं। बड़े साम्राज्यों का पतन हो जाता है लेकिन विचार हमेशा जीवित रहते हैं और बहरे हो चुके लोगों को सुनाने के लिए ऊंची आवाज जरूरी है।’
    भगतसिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून-खराबा न हो पर अंग्रेज यह जरूर समझ जाएं कि उन्हें इस देश से भगाने के लिए यहां का युवा जाग चुका है और वह क्रांति के माध्यम से बलिदान की किसी भी सीमा तक जा सकता है।
निर्धारित योजना के अनुसार भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय असेम्बली में एक खाली स्थान पर बम फेंका था। इसके बाद उन्होंने स्वयं गिरफ्तारी देकर अपना संदेश दुनिया के सामने रखा। उनकी गिरफ्तारी के बाद उन पर एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जेपी साण्डर्स की हत्या में भी शामिल होने के कारण देशद्रोह और हत्या का मुकदमा चला।
     यह मुकदमा भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में लाहौर षड्यंत्र के नाम से जाना जाता है। करीब 2 साल जेल प्रवास के दौरान भी भगतसिंह क्रांतिकारी गतिविधियों से भी जुड़े रहे और लेखन व अध्ययन भी जारी रखा। फांसी पर जाने से पहले तक भी वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। 
   भगतसिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को हुआ था और 23 मार्च 1931 को शाम 7.23 पर भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी दे दी गई। 
शहीद सुखदेव : सुखदेव का जन्म 15 मई, 1907 को पंजाब को लायलपुर पाकिस्तान में हुआ। भगतसिंह और सुखदेव के परिवार लायलपुर में पास-पास ही रहने से इन दोनों वीरों में गहरी दोस्ती थी, साथ ही दोनों लाहौर नेशनल कॉलेज के छात्र थे। सांडर्स हत्याकांड में इन्होंने भगतसिंह तथा राजगुरु का साथ दिया था।
शहीद राजगुरु : 24 अगस्त, 1908 को पुणे जिले के खेड़ा में राजगुरु का जन्म हुआ। शिवाजी की छापामार शैली के प्रशंसक राजगुरु लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से भी प्रभावित थे। 
पुलिस की बर्बर पिटाई से लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए राजगुरु ने 19 दिसंबर, 1928 को भगत सिंह के साथ मिलकर लाहौर में अंग्रेज सहायक पुलिस अधीक्षक जेपी सांडर्स को गोली मार दी थी और खुद ही गिरफ्तार हो गए थे।
  आज हम मां भारती के इन सच्चे सपूतों को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं और उनके बलिदान दिवस के इस अवसर पर यह संकल्प भी लेते हैं कि उनको द्वारा जिस आशा और अपेक्षा के साथ देश को आजाद कराया गया था उनकी आशा और अपेक्षाओं पर खरा उतरते हुए हम उनके सपनों का भारत बनाने में किसी प्रकार का प्रमाद नहीं करेंगे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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