क्या शिवजी को भांग पीते हुए चित्रित करना सही है?

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#डॉ_विवेक_आर्य

हिन्दू समाज में शिवजी भगवान को कैलाशपति, नीलकंठ आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। नीचे एक चित्र दिया गया है। जिसमें पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिवजी भांग का सेवन करते हुए दिखाए गए है।

वेदों में शिव ईश्वर का एक नाम है जिसका अर्थ कल्याणकारी है एवं एक नाम रुद्र है जिसका अर्थ दुष्ट कर्मों को करने वालों को रुलाने वाला है। वेदों में एक ईश्वर के अनेक नाम गुणों के आधार पर बताये गए हैं। ऐसे में ईश्वर के शिव नामक नाम के आधार पर एक पात्र की कल्पना करना जो भांग जैसे नशे को ग्रहण करता है। यह अज्ञानता का प्रतीक मात्र है। सावन के महीने में कावड़ यात्रा पिछले कुछ वर्षों से विशेष रूप से प्रचलित हो गई है। कावड़ लाने वाले शिव की घुट्टी कहकर भांग आदि का सेवन करते है। इसे कुछ लोग भांग सेवन को धार्मिकता बताते है। जबकि यह केवल और केवल अन्धविश्वास है।
सत्यार्थ प्रकाश में भी स्वामी दयानंद स्पष्ट रूप से मादक पदार्थ के ग्रहण करने की मनाही करते है:-

1 . मनुस्मृति का सन्दर्भ देकर स्वामी दयानंद यहाँ पर किसी भी प्रकार के नशे से बुद्धि का नाश होना मानते हैं।

वर्जयेन्मधु मानसं च – मनु
जैसे अनेक प्रकार के मद्य, गांजा, भांग, अफीम आदि –
बुद्धिं लुम्पति यद् द्रव्यम मद्कारी तदुच्यते।।
जो-जो बुद्धि का नाश करने वाले पदार्थ हैं उनका सेवन कभी न करें।

( सत्यार्थ प्रकाश- दशम समुल्लास पृष्ठ 219-71 संस्करण, जनवरी 2009 प्रकाशक- आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली)

2. स्वामी दयानंद भांग आदि मादक पदार्थ के ग्रहण करने वाले को कुपात्र कहते हैं।

(प्रश्न)- कुपात्र और सुपात्र का लक्षण क्या हैं?

(उत्तर) जो छली, कपटी, स्वार्थी, विषयी, काम, क्रोध, लोभ, मोह से युक्त, परहानी करने वाले लम्पति, मिथ्यावादी, अविद्वान, कुसंगी, आलसी : जो कोई दाता हो उसके पास बारम्बार मांगना, धरना देना, न किये पश्चात भी हठता से मांगते ही जाना, संतोष न होना, जो न दे उसकी निंदा करना, शाप और गाली प्रदानादी देना। अनेक वार जो सेवा करे और एक वार न करे तो उसका शत्रु बन जाना, ऊपर से साधु का वेश बना लोगों को बहकाकर ठगना और अपने पास पदार्थ हो तो भी मेरे पास कुछ भी नहीं हैं कहना, सब को फुसला फुसलू कर स्वार्थ सिद्ध करना, रात दिन भीख मांगने ही में प्रवृत रहना, निमंत्रण दिए पर यथेष्ट भांग आदि मादक द्रव्य खा पीकर बहुत सा पराया पदार्थ खाना, पुन: उन्मत होकर प्रमादी होना, सत्य-मार्ग का विरोध और जूठ-मार्ग में अपने प्रयोजनार्थ चलना, वैसे ही अपने चेलों को केवल अपनी सेवा करने का उपदेश करना, अन्य योग्य पुरुषों की सेवा करने का नहीं, सद विद्या आदि प्रवृति के विरोधी, जगत के व्यवहार अर्थात स्त्री, पुरुष, माता, पिता, संतान, राजा, प्रजा इष्टमित्रों में अप्रीति कराना की ये सब असत्य हैं और जगत भी मिथ्या हैं। इत्यादि दुष्ट उपदेश करना आदि कुपात्रों के लक्षण है।

(सत्यार्थ प्रकाश- एकादश समुल्लास पृष्ठ 281-282 संस्करण, जनवरी 2009 प्रकाशक- आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली)

3. स्वामी दयानंद यहाँ पर स्पष्ट रूप से शैव नागा साधु के व्यवहार को गलत सिद्ध कर रहे हैं और किसी भी प्रकार के नशे को साधु के लिए वर्जित कर रहे है।

(खाखी) देख! हम रात दिन नंगे रहते, धूनी तापते, गांजा चरस के सैकड़ों दम लगाते, तीन-तीन लोटा भांग पीते, गांजे, भांग, धतूरा ली पत्ती की भाजी (शाक) बना खाते, संखिया और अफीम भी चट निगल जाते, नशा में गर्क रात दिन बेगम रहते, दुनिया को कुछ नहीं समझते, भीख मांगकर टिक्कड़ बना खाते, रात भर ऐसी खांसी उठती जो पास में सोवे उसको भी नींद कभी न आवे, इत्यादि सिद्धियाँ और साधूपन हम में हैं, फिर तू हमारी निंदा क्यूँ करता हैं?चेत बाबूड़े! जो हमको दिक्कत करेगा हम तुमको भस्म कर डालेंगे।
(पंडित) यह सब असाधु मुर्ख और गर्वगंडों के हैं, साधुयों के नहीं! सुनों !

‘साध्नोती पराणी धर्मकार्याणि स साधु:’
जो धर्म युक्त उत्तम काम करे, सदा परोपकार में प्रवृत हो, कोई दुर्गुण जिसमें न हो, विद्वान, सत्योपदेश से सब का उपकार करे उसको ‘साधु’ कहते हैं।

(सत्यार्थ प्रकाश- एकादश समुल्लास पृष्ठ 290-291 संस्करण, जनवरी 2009 प्रकाशक- आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली)
कुछ लोग भांग के नशे में ईश्वर भक्ति बताते है-

स्वामी दयानंद श्री कन्हैयालाल इन्जीनियर,रुड़की के इसी प्रश्न का उत्तर इस प्रकार से देते है-
स्वामी जी जिन दिनों रुड़की में थे तो लाला कन्हैयालाल साहब इन्जीनियर ने प्रश्न किया कि मद ( नशा ) की अवस्था में चित्त एकाग्र हो जाता है और जिस विषय की ओर चित्त आकृष्ट होता है उसी में डूबा रहता है । ”
इसलिए इस अवस्था में जैसा अच्छा ईश्वर का ध्यान हो सकता है वैसा अन्य अवस्था में नहीं । ”
स्वामी जी ने कहा कि मद का नियम ऐसा ही है जैसा कि आप वर्णन करते हैं कि जिस वस्तु का ध्यान चित्त में होता है मनुष्य उसी में डूबा रहता है परन्तु वस्तुओं की वास्तविकता का ठीक ध्यान अनुकूलता से हुआ करता है । जब हम एक वस्तु का ध्यान करते हैं और उसका सम्बन्ध दूसरी वस्तुओं के साथ करके देखते हैं और उस वस्तु और अन्य वस्तुओं में सम्पर्क स्थापित करके देखते हैं तब उस वस्तु का ठीक ध्यान चित्त में प्रकट होता है और अन्यथा उस वस्तु का ध्यान वास्तविकता के विरुद्ध प्रकट हुआ करता है और गुणी और गुण की अपेक्षा नहीं रहती ।

” इसलिए मद की अवस्था में ईश्वर का ध्यान झूठा और अवगुणों के साथ होता है ”
प्रश्नकर्त्ता को यह उत्तर बहुत अच्छा लगा और पूर्ण सन्तोष हो गया ।
ला . साहब स्वयं मद्य नहीं पीते थे प्रत्युत उस से घृणा करते थे परन्तु लोगों की वर्तमान शंका को स्वयं उपस्थित करके उत्तर माँगा था ।
( पं . लेखराम कृत जीवनी , पृष्ठ ३९५ )

पाठक स्वयं विचार कर सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करे।

आप वेदों वाले कल्याणकारी सत्य शिव को मानना चाहते है अथवा पुराणों के काल्पनिक शिव को मानना चाहते है?

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