*भारत बने धर्म-सापेक्ष*

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*डॉ. वेदप्रताप वैदिक*

भारत को धर्म-निरपेक्ष नहीं, धर्म-सापेक्ष राष्ट्र बनाएं, यह बात मैं कई दशकों से कहता रहा हूं लेकिन इसी बात को बलपूर्वक कहकर जैन मुनि विद्यासागरजी महाराज ने इस धारणा में चार चांद लगा दिए हैं। विद्यासागरजी दिगंबर जैन मुनि हैं। उनकी मातृभाषा कन्नड़ है, लेकिन हिंदी और संस्कृत में उन्होंने विलक्षण दर्शन ग्रंथों की रचना की है। उनके प्रति सभी जैन-संप्रदाय तो भक्तिभाव रखते ही हैं, लाखों हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिख आदि भी उन्हें पूजनीय मानते हैं। भारत को धर्म-सापेक्ष बनाएं, यह बात उन्होंने म.प्र. के कुंडलपुर में आयोजित पंचकल्याणक समारोह में कही। वहां लाखों भक्तों के अलावा देश के जाने-माने नेता भी उपस्थित थे। भारत को धर्म-सापेक्ष बनाने का अर्थ उसे वेटिकन-जैसा राज्य बनाना नहीं है। उसे किसी रिलीजन या संप्रदाय या मत या पंथ का अनुयायी बना देना नहीं है बल्कि ऐसा राष्ट्र बनाना है, जिसका प्रत्येक नागरिक और सरकार भी धार्मिक है। भारत के संविधान में कहीं भी धर्म-निरपेक्ष शब्द नहीं आया है। उसकी प्रस्तावना में भारत को ‘पंथ-निरपेक्ष’ कहा गया है। लेकिन हमारे देश के नेता धर्म-निरपेक्ष शब्द का ही प्रायः इस्तेमाल करते रहते हैं। इसका असली कारण अंग्रेजी भाषा की गुलामी ही है, क्योंकि अंग्रेजी में धर्म को ‘रिलीजन’ ही कहते हैं। ‘सेक्युलर’ शब्द यूरोप में चलता है। आप सेक्यूलर हैं याने धर्म-निरपेक्ष हैं। मैं तो कहता हूं कि जो लोग सचमुच सेक्यूलर हैं याने किसी भी पंथ, संप्रदाय या भगवान को भी नहीं मानते, वे भी परम धार्मिक हो सकते हैं। धर्म का अर्थ है— धारण करने योग्य। मनुष्य का, पशु का, पक्षी का, राजा का, प्रजा का, मालिक का, नौकर का— सबका अपना धर्म होता है। सब अपने-अपने कर्तव्य का पालन करें, यही धर्म है। मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरूद्वारे और साइनेगाॅग में जाना धर्म नहीं है। वह पंथ-भक्ति है। धर्म क्या है? इसकी परिभाषा मनुस्मृति में कितनी अच्छी है। मनु महाराज ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं— धीरज, क्षमा, मन-नियंत्रण, चोरी या लालच से बचना, शरीर-मन-बुद्धि को शुद्ध रखना, इंद्रिय-संयम, बुद्धिप्रधान रहना, सत्याचरण और क्रोध-नियंत्रण! क्या कोई मजहब, पंथ या संप्रदाय धर्म के इन दस लक्षणें को अनुचित बता सकता है? दुनिया के हर संप्रदाय या रिलीजन का भक्त इस धर्म का अनुसरण कर सकता है। इसे ही वेदों में मानव-धर्म कहा है। ऋग्वेद कहता है— मनुर्भव भव! याने मनुष्य बनो। कोई भी मनुष्य किसी भी मजहब या पंथ का अनुयायी हो या किसी का भी न हो, वह भी इन दस लक्षणों को धारण कर सकता है। इनको धारना ही धर्म है। इनका जो उल्लंघन करे और अपने आप को वह किसी भी रिलीजन या संप्रदाय का परम भक्त कहे तो वह किसी भी हालत में धार्मिक व्यक्ति नहीं कहला सकता। रिलीजनों और संप्रदायों ने दुनिया में जितनी खून की नदियां बहाई हैं, उतनी बादशाहों, राजाओं और राजनीति ने भी नहीं बहाई हैं। सच्ची नैतिकता ही धर्म है। जिसमें नैतिकता नहीं, वह विचार और कर्म अधर्म ही है। ऐसे अधर्म को हम छोड़ें और भारत ही नहीं, दुनिया के सारे राष्ट्र धर्म-सापेक्ष बनें तो यह पृथ्वी ही स्वर्ग बन जाएगी।

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