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अलविदा : लेखिका-करुणा श्री, प्रकाशक-दीपज्योति ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन्स, मूल्य-250/-रू. समीक्षक-सुमतिकुमार जैन, प्र. सं.-जगमग दीपज्योति (मा.) पत्रिका, महावीर मार्ग, अलवर  (राज.) 301001
कथा तथा उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द ने एक जगह लिखा है-”उपन्यास मानव चरित्र का चित्र है, मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्त्व है।ÓÓ उन्होंने यह भी लिखा है कि ”यथार्थवाद यदि हमारी आंखें खोल देता है तो आदर्शवाद उठाकर किसी मनोरम स्थान में पहुंचा देता है, आदर्श को सजीव बनाने के लिये यथार्थ का उपयोग लेना चाहिए। सफल उन्यास की यही विशेषता है।ÓÓ इसी प्रकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में लिखा है-”लोक या किसी जन-समाज के बीच काल की गति के अनुसार जो गूढ़ और चिन्त्य परिस्थितियां खड़ी होती हैं उनको गोचर रूप में सामने लाना और कभी-कभी निस्तार का मार्ग भी प्रत्यक्ष करना उपन्यास का काम है। इन्हीं विशेषताओं का प्रत्यक्ष चित्रण हिन्दी साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर, मानव मूल्यों की शिल्पी एवं साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन करने वाली बहुचर्चित सुश्री करुणाश्री ने अपने नवीन उपन्यास ‘अलविदाÓ में किया है। आदर्श और यथार्थ का सामंजस्य इस उपन्यास की विशेषता है। उन्होंने इस कृति में सृजन सन्दर्भों को समर्पित परिस्थितियों और चतुर्दिक वातावरण में घटित विभिन्न घटनाओं से प्राप्त अनुभवों को वर्णित किया है। परिवेश से उद्भुत घटनाएं उल्लेखित करते हुए उनकी विचारधाओं का प्रतिफलन भी दर्शित किया है।
जीवन के विभिन्न पड़ावों से अनुभूत स्पंदनों को चित्रित करते हुए बदलते जीवन मूल्यों से उद्घाटित मानवीय संवेदना, मानव स्वभाव व मानसिक स्थितियों को गहराई से विश्लेषित एवं विवेचित किया है। रिश्तों की महिनता और पवित्रता तथा उसके सम्बन्धों की प्रगाढ़ता और उनकी संवेदना को करुणाजी ने बखूबी प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, रिसावों को रोकने का संकेत देकर दिशा प्रदान की है। यह नवीन उपन्यास युवा पीढ़ी की जिन्दगी में जान फूंकने वाला है परिस्थितियों से जूझते हुए भी मानव चाहे तो सबकुछ प्राप्त कर सकता है। लेखिका का मानना है कि एक तीर ही काफी है अगर वह सकारात्मक सोच पर लग जाए।
अलविदा उपन्यास जीवन की यथार्थता, सत्यता तो उद्घाटित करता ही है साथ ही जीवन मूल्यों व संभावनाओं का निरुपण भी करता है अर्थात् जीवन में घटित सन्दर्भों की अनुभूति का घनीभूत रूप इस कृति में उजागर करता है। समय के साथ उभरी प्रवृत्तियों और बदलती जीवनशैली से प्रभावित मानसिकता और क्रियाकलापों की प्रवृत्ति का खुलासा भी किया गया है। उपन्यास के मुख्य पात्रों के जरिए लेखिका ने समय की आवश्यकता और परिस्थितिजन्य कार्य के सन्दर्भों को सहज रूप से उकेर कर बताया है कि किस प्रकार उपन्यास की मुख्य पात्रा ने अपनी जीवनशैली को बदल कर ऊँचाई के शिखर छुए हैं, इसका भी सफल लेखा जोखा किया है। यह एक ऐसी औपन्यासिक कृति है जो जिन्दगी के शाश्वत रूप का वर्णन करती है। वे यह भी उल्लेख करती हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जिसका जन्म हुआ है चाहे वह गरीब हो या अमीर, राजा हो या रंक, उसे एक न एक दिन काल का ग्रास बनना ही पड़ता है। जाने वाला व्यक्ति यह नहीं देखता मेरे बाद मेरे परिवार का क्या होगा, अनाथ होता हुआ परिवार आगे कैसे जीवनयापन करेगा।
उपन्यास की मुख्य पात्रा गीता ने इस सत्य को समझकर अपने जीवन की शैली को बदलकर चिन्तन-मनन से अपने भविष्य को संवारने में लगा दिया। उसने न केवल अपना जीवन संजोया, संवारा अपितु उस पर आश्रिता अपनी बहन का भविष्य भी एक ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया जहां उसका जीवन भव्यता-दिव्यता प्राप्त कर सका। समय के बदलते परिवेश एवं परिदृश्यों ने यह स्पष्ट कर दिया कि विषम परिस्थितियों के उपरान्त भी दृढ़ संकल्पता, कुछ करने की ठान लेने से जीवन में निश्चित ही बदलाव आ सकता है। सुश्री करुणाश्री ने सम्बन्धों की प्रगाढ़ता और उनकी संवेदना को बखूबी प्रस्तुत कर पात्रों की मानसिकता और उनके परिवेश चित्रण का प्रभावी संयोजन कर रिश्तों की घनिष्ठता और स्थिरता को भी कायम रखा है जिसमें आत्मीयतापूर्ण मधुर सम्बन्धों का रस भरा है। इस उपन्यास कोआधुनिक शिल्प का एक अभूतपूर्व नमूना कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं, यह एक मर्मान्तक कृति है जो प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति पर स्थायी प्रभाव छोड़ती है।
उपन्यास की अभिव्यंजना शैली सुन्दर है जो सरल भाषा रूपी तृणाव्रत भूमि पर यत्र-तत्र सुशोभित फूलों की क्यारियों की गंध देती है। नि:सन्देह यह उपन्यास अपनी सरल-सहज भाषा के कारण सर्वजन के लिए बोधगम्य एवं एकता और सौहार्द्र का सन्देश देने वाला बना है। यह कृति जहां आगे बढ़ने का हौसला देती है तो चेतना को फिर से ऊर्जावान बनाने की प्रेरणा देती है। निराश, हताश, दु:खित व पीड़ित जीवन को सूरज सम रोशनी प्रदान करती है और जीने का महान लक्ष्य बनाती है। जीवन जीने का सही सकारात्मक रूप दर्शाती है तो साधारण सोच से ऊपर उठकर असाधारण सोच का मालिक बनाती है। यह उपन्यास निश्चित ही साहित्य जगत में अपना विशिष्ट स्थान प्राप्त करेगा और इसकी रचयिता करुणाश्री जी को साहित्याकाश में उच्चतम शिखर पर ले जाने वाला सिद्ध होगा। मैं सुश्री करुणाजी के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए उनके माध्यम से ऐसी ही अन्य कालजयी कृतियों की कामना करता हूं।

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