vijender-singh-aryaराही तू आनंद लोक का, जहां पुण्य से मिलै प्रवेश
गतांक से आगे….
सुहृद पिछनै विपत में,
भय के समय में वीर।
सत्पुरूष पिछनै शील से,
धन-संकट में धीर ।। 720 ।।

अर्थात विपत्ति के आने पर व्यक्ति मित्र है अथवा शत्रु, इसकी पहचान होती है। भय के उत्पन्न होने पर व्यक्ति कायर है, अथवा वीर इस बात का पता चलता है। व्यक्ति दुष्ट है अथवा सत्पुरूष इसकी पहचान शील से अर्थात उत्तम स्वभाव से पता चलता है जबकि अर्थ संकट आने पर मनुष्य के धैर्य की पहचान होती है। वह ऐसे समय में अपने स्वाभिमान और मर्यादा की रक्षा किस प्रकार करता है?

असुया नष्ट करै भक्ति को,
रूप बुढ़ापा खाय।
क्रोध नष्ट करै सम्पदा,
और शील बिगड़ता जाए ।। 721 ।।

असुया अर्थात-किसी के गुणों में भी दोष निकालना।
शील अर्थात-उत्तम स्वभाव

श्री मिलै किसी पुण्य से,
चतुरता से बढ़ती जाए।
रक्षक इसकी दक्षता
संयम स्थिर बनाय ।। 722 ।।

श्री धन-संपत्ति, दक्षता-निपुणता, संयम मद व दुव्र्यसनों से दूर रहना, वाणी और व्यवहार को संतुलित रखना, समय-समय पर विवेकपूर्ण निर्णय लेने से धन-संपत्ति स्थिर हो जाती है।

शम दम प्रजा कुलीनता,
मितभाषी और दान।
पराक्रम और कृतज्ञता,
से व्यक्ति बनै महान ।। 723 ।।

कुलीनता से अभिप्राय धन संपन्नता से नही, अपितु अपने कुल की मर्यादा अथवा प्रतिष्ठा की रक्षा करने से है। उपरोक्त आठ गुण यदि किसी व्यक्ति में दृष्टिगोचर होते हैं तो, समझो वह कोई ऊंची आत्मा है।

यज्ञ दान तप ज्ञान तो,
स्वभावत: संत में खास।
सत्य सरलता उदारता,
सीखत है अभ्यास ।। 724 ।।

ज्ञान अर्थात अध्ययन सरलता अर्थात कुटिलता रहित होना उदारता अर्थात चित्त का कठोरता रहित होना, कोमल होना।

चलना है रहना नही,
रखना याद हमेश,
पाप-पुण्य का हिसाब हो,
उस सांई के देश ।। 725 ।।

गफलत में सोवै मति,
ये है बिराना देश।
राही तू आनंद लोक का,
जहां पुण्य से मिलै प्रवेश ।। 726 ।।

भाव यह है कि हे मनुष्य! तू गहरी नींद में मत सो, अर्थात भ्रम में मत रह, यह संसार तेरा देश नही है, तेरा गंतव्य नही है। तेरा देश अथवा गंतव्य तो आनंदधाम है। तू वहीं से पृथ्वी पर कर्म क्रीड़ा करने आया है और तुझे आनंद धाम ही जाना है। किंतु याद रख कि आनंदलोक में केवल वही प्रवेश पा सकते हैं जिनके पास पुण्य की मुद्रा होती है। सारांश यह है कि आनंद लोक के राही अधिक से अधिक पुण्य कमा, इसमें कोताही मत कर, क्योंकि तुझेे अपने देश अर्थात आनंदलोक जाना है।

पाप कर्म करता पुरूष,
स्वयं कलंकित होय।
शुभ कर्मों के कारनै,
इतिहास में अंकित होय ।। 727 ।।

शठ निष्ठुर दन्दशूक तो,
करते रहें नित पाप।
महती विपत्ति में घिरै,
एक दिन अपने आप ।। 728 ।।
क्रमश:

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
jojobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
vaycasino giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
onwin giriş
onwin giriş
onwin giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
superbetin giriş
betsat giriş
betsat giriş
betsat giriş
betsat giriş
Kolaybet Giriş
onwin
onwin
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
onwin
onwin
holiganbet
sahabet
bets10
casinolevant
ngsbahis giriş
artemisbet güncel
grandpashabet giriş
bettilt giriş
jojobet giriş
bettilt giriş
onwin
onwin
onwin
sahabet
onwin
sahabet